Bahu ki Chudai बहुरानी की प्रेम कहानी
07-26-2019, 02:01 PM,
#41
RE: Bahu ki Chudai बहुरानी की प्रेम कहानी
मेरी सेक्स कहानी के पहले भाग में आपने पढ़ा कि मैंने अपनी बहू के साथ एक शादी में जाना था. बहू ने इस मौके का फ़ायदा उठाने का पूरा इंतजाम कर लिया था. उसने मुझे अपने पास बैंगलोर लिया. वहाँ से हमने ट्रेन से दिल्ली जाना था. फिर राजधानी एक्सप्रेस के प्राइवेट केबिन में डेढ़ दिन यानि पूरे 36-37 घंटे वासना और चोदन का नंगा धमाल होना तय था. बहूरानी के इस लाजवाब कार्यक्रम का मैं कायल हो गया और आने वाले रोमांच और रोमांस के बारे में सोच सोच कर मेरा मन प्रफुल्लित हुए जा रहा था.
तय कार्यक्रम के अनुसार मैं छह दिसम्बर की सुबह बैंगलोर जा पहुंचा. स्टेशन पर मेरा बेटा अपनी गाड़ी से मुझे रिसीव करने आया हुआ था; स्टेशन से घर पहुँचने में कोई पैंतीस चालीस मिनट लगे. मैं गाड़ी से उतर गया और बेटा गाड़ी को पार्क करने लगा. मेरे हृदय में बहूरानी से मिलने की अभिलाषा तीव्र से तीव्र हो रही थी, मैंने अपने बेटे के आने की प्रतीक्षा नहीं की और मैं अपने बेटे के फ़्लैट की ओर बढ़ गया.
दरवाजे पर पहुंचा और घंटी बजाने पर दरवाजा बहूरानी ने ही खोला.“नमस्ते पापा जी!” बहूरानी ने हमेशा की तरह मेरे पैर आत्मीयता से स्पर्श कर के मेरा स्वागत किया.“आशीर्वाद है अदिति बेटा, खुश रहो!” मैंने भी उसके सिर पर स्नेह से हाथ रख कर उसे आशीष दी और मेरा हाथ अनचाहे ही फिसल कर उसकी पीठ पर जा पहुंचा और उसकी गर्दन के पिछले भाग को सहलाता हुआ नीचे उतर कर उसकी ब्रा के हुक पर ठहर गया. ये सब कुछ ही क्षणों में हो गया. बहूरानी की ब्रा के हुक को मैंने ऐसे ही थोड़ा सा दबा दिया तो मेरी मंशा जान कर बहूरानी का जिस्म सिहर उठा.
बहू रानी तुरन्त उठ के सीधी हुई और मुझे शिकायत भरी निगाहों से लेकिन होंठों पर मुस्कराहट लिए देखती रही, तभी उसके होंठों ने ज़रा सा गोल होकर जैसे हवाई चुम्बन दिया; प्रत्युत्तर में मैंने भी अपने होठों से जवाब दिया.
मैं अपनी बहूरानी के इस आत्मीय और संतुलित व्यवहार से हमेशा ही अचंभित, अवाक्, खुश रहा हूँ. मेरी बहूरानी मुझ से अब तक कम से कम तीस पैंतीस बार तो चुद ही चुकी होगी परन्तु उनके व्यवहार में हमारे इन सेक्स रिश्तों की झलक भी कभी दिखाई नहीं दी.दूसरों के सामने की तो बात ही क्या, जब कभी हम अकेले भी होते तो बहूरानी हमेशा अपने सर पर पल्लू डाल के नज़र नीची करके मुझसे सम्मान से बात करती; उसने कभी भी मुझे यह बात जताई नहीं कि वो मेरी अंकशायिनी भी है.
कोई व्रत उपवास ऐसा नहीं है जिसे अदिति न करती हो. सोमवार तो उसका व्रत हमेशा ही रहता है इसके अलावा एकादशी, प्रदोष और साल में एक बार आने वाले व्रत जैसे जन्माष्टमी, शिवरात्रि, नवदुर्गा इत्यादि न जाने कितने; सब पूरे विधि विधान से ही करती, निभाती है.अल्प शब्दों में कहा जाय तो सभी स्त्रियोचित गुणों से परिपूर्ण है मेरी बहूरानी अदिति… और किसी भी सभ्रान्त परिवार की संस्कारी है मेरी प्यारी बहू!
अब यह बात अलग है कि वो मुझसे चुदवाते समय स्त्रियोचित लाज शर्म संकोच त्याग कर देवी रति का रूप धर किसी चुदासी कामिनी की तरह मेरा लंड हंस हंस के मेरी आँखों में झांकते हुए चूसती चाटती है और फिर उसे अपनी चूत में लील के किसी निर्लज्ज कामिनी की तरह मुझे उसे बलपूर्वक चोदने को उकसाती है और अपनी चूत उछाल उछाल के कामुक बातें कहती हुई अपने स्त्रीत्व को पूर्ण रूप से भोग लेती है. मेरी बहू की कामवासना काफी प्रखर है और मेरे साथ तो वो जैसे कामुकता की मूर्ति बन जाती है.
एक बात यहाँ और, मैं उस दिन अपनी बहूरानी को कोई डेढ़ साल बाद मिल रहा था. इन डेढ़ सालों में उसके जिस्म में आश्चर्यजनक बदलाव मैंने नोट किया; वो पहले से और भी छरहरी हो गयी थी उसका सुतवां जिस्म और भी सांचे में ढल गया था. किशोरियों या टीन गर्ल्स जैसी कमनीयता या आभा, ग्लो, दीप्ति या नूर कुछ भी कह लो; उसके जिस्म के अंग अंग से छलक रहा था.
मैं तो बहूरानी के कमनीय बदन में जैसे खो सा गया था कि “पापा जी, कहाँ खो गए आप?” बहूरानी की आवाज ने जैसे मुझे नींद से जगाया.“अदिति बेटा, तू इतनी बदल कैसे गयी, पहचान में ही नहीं आ रही आज तो?”“अच्छा, ऐसा क्या दिख रहा है मुझमें जो पहले नहीं दिखाई दिया आपको?” बहूरानी जरा इठला कर बोली.
तभी मेरे बेटे के क़दमों की आहट सुनाई दी, वो मेरा बैग वगैरह ले के आ रहा था. बहूरानी ने अपने होंठों पर उंगली रख के मुझे चुप रहने का इशारा किया; मैंने भी वक़्त की नजाकत को समझा और पास की कुर्सी पर बैठ गया.“बहूरानी, एक गिलास पानी ले आ… और फिर चाय बना दे जल्दी से!” प्रत्यक्षतः मैंने कहा.“जी अभी लाई पापा जी!” अदिति ने मुझे मुस्कुरा कर देखा और रसोई की तरफ चल दी.
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07-26-2019, 02:01 PM,
#42
RE: Bahu ki Chudai बहुरानी की प्रेम कहानी
अदिति के जाते ही मेरा बेटा मेरे पास बैठ गया और कुछ पारिवारिक बातें होने लगीं. मैंने उससे उसकी नौकरी से सम्बन्धित बातें पूछी, उसने घर परिवार के बारे में पूछा. वैसे तो ये सब बातें फोन पर लगभग रोज होती ही रहती हैं लेकिन आमने सामने मिलने पर चाहे औपचारिकता वहश ही सही, दोहराई ही जाती हैं.अदिति के चचेरे भाई की शादी थी तो बेटे बहू का जाना ज्यादा अच्छा लगता. यही बात मैंने अपने बेटे के सामने फिर से दोहराई लेकिन उसने अपने जॉब, करियर की मजबूरी बता दी और प्रॉमिस किया कि आगे से वो ये सब पारिवारिक जिम्मेवारियाँ खुद संभालेगा.
इतने में ही अदिति भी चाय लेकर आ गई और हम तीनों ने हल्की फुल्की यहाँ वहाँ की बातें करते हुए चाय खत्म की. ये सब बातें करते करते मेरी नज़र बार बार बहूरानी के बदले बदले से जिस्म को निहार रही थी और शायद बहूरानी भी मेरे मन के कौतुहल, जिज्ञासा को अच्छे से समझ रहीं थीं. इसीलिए उसने मेरी तरफ नज़र भर के देखा और आँख झपका के गर्दन हिला के मुझे इशारा किया कि वो मेरे मन की बात समझ रही है.
“सुनो जी, आप बाज़ार से ताजा दही ला दो. पापा जी को नाश्ते में दही जरूर चाहिये होता है, और दही ताजा ही लाना, खट्टा मत ले आना!” बहूरानी ने यह कहते हुए मेरे बेटे को बाज़ार भेज दिया.जैसे ही वो घर से बाहर निकला, मैंने बहूरानी का हाथ पकड़ कर अपनी ओर खींचा तो वो मेरी गोद में आ गिरी. बहूरानी के कूल्हे मेरी जांघों पर थे, मेरी एक बाजू पर बहू का सर टिक गया.“हाँ, पापा जी… अब बताओ, क्या कह रहे थे आप? बहुत इशारे कर रहे थे?” बहूरानी ने मेरी गोदी में बैठ कर मेरे गले में अपनी बांहों का हार पहना कर पूछा. उसकी आंखों से प्यार ही प्यार झलक रहा था.
बहूरानी के होंठ मेरे होंठों से बस चंद इंच की दूरी पर थे, बहू ने होंठों पर कोई लिपस्टिक आदि नहीं लगाई थी, उसके होंठ प्राकृतिक रूप से ही गुलाबी हैं.मन कर रहा था कि अभी बहू के लबों को चूम लूं मैं… लेकिन मैंने सब्र किया… मन में मैंने सोचा कि अभी कुछ देर मैं इन लबों को चूम लेने की लालसा को मन ले लिए तड़पता रहूँगा, इस तड़प में मुझे और ज्यादा आनन्द मिलेगा.
बहूरानी की बात को अनसुना करके और अपने मन में बहू के चुम्बन की इच्छा को दबा कर मैंने उसकी कमर में हाथ डाल के उसे अपने अंक में समेट लिया, पहले तो मैंने बहू को अपनी छाती से चिपटा लिया… अजीब सी शान्ति मिली मुझे बहू को अपने गले से लगा कर…
फिर मैंने बहू के वक्ष पर अपना चेहरा टिका दिया और मेरी नाक उसके मम्मों की गहरी घाटी में धंस सी गई. तब मैंने अपनी जीभ से बहू की क्लीवेज को तीन चार बार चाटा. बहूरानी के जिस्म की सिहरन मुझे स्पष्ट महसूस हुई और उसकी बांहें मेरी गर्दन में कस के लिपट गयीं और उसने मुझे कस के अपने से लिपटा लिया.कुछ पलों तक हम दोनों यूं ही लिपटे हुए एक दूजे के दिलों की धकधक सुनते रहे. बहू रानी के जिस्म की खुशबू में मेरे मन में एक नया उल्लास भर दिया. बहुत लम्बे अरसे के बाद मुझे बहूरानी के कामुक जिस्म की कामुक गंध मिली थी, मैं तो मदहोश ही हो गया था जवानी की गंध पाकर!
“पापा, अब बताओ भी क्या कह रहे थे आप?” बहूरानी ने मेरी ठोड़ी के नीचे हाथ रखकर मेरा चेहरा ऊपर उठा कर मेरी आँखों में झांकते हुए पूछा.अब मैं खुद को रोक नहीं पाया और मैंने बिना कोई जवाब दिए उसे अपने ऊपर झुका लिया और हमारे होंठ स्वतः ही जुड़ गये.किसी नवयौवना के अधरों का चुम्बन, उनका रसपान करना, विशेष तौर पर जब वो भी दिल से साथ निभा रही हो, कितनी स्वर्गिक आत्मिक आनन्द की अनुभूति कराता है, इसे शब्दों में बयाँ करना आसान नहीं है. हमारे जाने पहचाने होंठ यूं ही पता नहीं कितनी देर अठखेलियाँ करते रहे, हमारी जीभ एक दूजे के मुंह में घुस कर लड़ती झगड़ती रही और तन में वासना का ज्वार हिलोरें लेने लगा.
तभी बहूरानी ने खुद को काबू किया और हाँफती हुई सी मुझसे दूर खड़ी हो गई; उसकी आँखों में सम्भोग की चाहत गुलाबी रंगत लिए तैर रही थी.
“क्या हुआ अदिति बेटा?”“कुछ नहीं पापा जी, अब और नहीं, नहीं तो खुद को रोक नही पाऊँगी. ये दही ले कर आने वाले ही होंगे.”“अरे जल्दी जल्दी कर लेंगे न… देख तेरे बिना डेढ़ साल से ऊपर ही हो गया है.”“पापा जी आज दिन और रात का सब्र कर लो फिर कल की पूरी रात, परसों का पूरा दिन और पूरी रात ट्रेन में अपने ही हैं. आप जो चाहो, जैसे चाहो कर लेना मेरे साथ… मैं मना नहीं करूंगी. अभी वक़्त की नजाकत को समझो आप! मैंने भी तो जैसे तैसे खुद को संभाला है आप भी कंट्रोल करो खुद को!”“ठीक है बेटा, तू सही कह रही है, इतना उतावलापन भी ठीक नहीं है.” मैंने कहा.
“पापा जी, अब बताओ, आप कुछ कहने वाले थे मुझे देख कर?” बहूरानी सामने वाली कुर्सी पर बैठती हुई बोली.“हाँ बेटा, मैं यह कह रहा था कि अबकी तो तू एकदम बदली बदली लग रही है, तू पहले की अपेक्षा और भी ज्यादा छरहरी सी निखरी निखरी नयी नयी सी लग रही है.” मैंने कहा.“हाँ पापा जी, मैंने सुबह के टाइम योगा और प्राणायाम करना शुरू किया है और शाम को आधा घंटा जिम में वर्कआउट करती हूँ रोज!” बहूरानी थोड़ा इठला के बोली.“गुड, वैरी गुड, कीप इट अप बेटा!” मैंने कहा.
तभी मेरा बेटा दही ले के आ गया और हमारी बातें यहीं खत्म हो गयीं.इसके बाद बहूरानी के घर में क्या हुआ, वो कुछ ख़ास नहीं है कहने को.
अगले दिन शाम को 8 बजे हमारी ट्रेन थी. राजधानी एक्सप्रेस के प्राइवेट कोच में हम ससुर बहू ने क्या क्या किया ये सब जानने के लिए कल ट्रेन चलने का इंतज़ार कीजिये.
ससुर बहू की कामुकता, शारीरिक आकर्षण, वासना, प्रेम और चुदाई की
अदिति के जाते ही मेरा बेटा मेरे पास बैठ गया और कुछ पारिवारिक बातें होने लगीं. मैंने उससे उसकी नौकरी से सम्बन्धित बातें पूछी, उसने घर परिवार के बारे में पूछा. वैसे तो ये सब बातें फोन पर लगभग रोज होती ही रहती हैं लेकिन आमने सामने मिलने पर चाहे औपचारिकता वहश ही सही, दोहराई ही जाती हैं.अदिति के चचेरे भाई की शादी थी तो बेटे बहू का जाना ज्यादा अच्छा लगता. यही बात मैंने अपने बेटे के सामने फिर से दोहराई लेकिन उसने अपने जॉब, करियर की मजबूरी बता दी और प्रॉमिस किया कि आगे से वो ये सब पारिवारिक जिम्मेवारियाँ खुद संभालेगा.
इतने में ही अदिति भी चाय लेकर आ गई और हम तीनों ने हल्की फुल्की यहाँ वहाँ की बातें करते हुए चाय खत्म की. ये सब बातें करते करते मेरी नज़र बार बार बहूरानी के बदले बदले से जिस्म को निहार रही थी और शायद बहूरानी भी मेरे मन के कौतुहल, जिज्ञासा को अच्छे से समझ रहीं थीं. इसीलिए उसने मेरी तरफ नज़र भर के देखा और आँख झपका के गर्दन हिला के मुझे इशारा किया कि वो मेरे मन की बात समझ रही है.
“सुनो जी, आप बाज़ार से ताजा दही ला दो. पापा जी को नाश्ते में दही जरूर चाहिये होता है, और दही ताजा ही लाना, खट्टा मत ले आना!” बहूरानी ने यह कहते हुए मेरे बेटे को बाज़ार भेज दिया.जैसे ही वो घर से बाहर निकला, मैंने बहूरानी का हाथ पकड़ कर अपनी ओर खींचा तो वो मेरी गोद में आ गिरी. बहूरानी के कूल्हे मेरी जांघों पर थे, मेरी एक बाजू पर बहू का सर टिक गया.“हाँ, पापा जी… अब बताओ, क्या कह रहे थे आप? बहुत इशारे कर रहे थे?” बहूरानी ने मेरी गोदी में बैठ कर मेरे गले में अपनी बांहों का हार पहना कर पूछा. उसकी आंखों से प्यार ही प्यार झलक रहा था.
बहूरानी के होंठ मेरे होंठों से बस चंद इंच की दूरी पर थे, बहू ने होंठों पर कोई लिपस्टिक आदि नहीं लगाई थी, उसके होंठ प्राकृतिक रूप से ही गुलाबी हैं.मन कर रहा था कि अभी बहू के लबों को चूम लूं मैं… लेकिन मैंने सब्र किया… मन में मैंने सोचा कि अभी कुछ देर मैं इन लबों को चूम लेने की लालसा को मन ले लिए तड़पता रहूँगा, इस तड़प में मुझे और ज्यादा आनन्द मिलेगा.
बहूरानी की बात को अनसुना करके और अपने मन में बहू के चुम्बन की इच्छा को दबा कर मैंने उसकी कमर में हाथ डाल के उसे अपने अंक में समेट लिया, पहले तो मैंने बहू को अपनी छाती से चिपटा लिया… अजीब सी शान्ति मिली मुझे बहू को अपने गले से लगा कर…
फिर मैंने बहू के वक्ष पर अपना चेहरा टिका दिया और मेरी नाक उसके मम्मों की गहरी घाटी में धंस सी गई. तब मैंने अपनी जीभ से बहू की क्लीवेज को तीन चार बार चाटा. बहूरानी के जिस्म की सिहरन मुझे स्पष्ट महसूस हुई और उसकी बांहें मेरी गर्दन में कस के लिपट गयीं और उसने मुझे कस के अपने से लिपटा लिया.कुछ पलों तक हम दोनों यूं ही लिपटे हुए एक दूजे के दिलों की धकधक सुनते रहे. बहू रानी के जिस्म की खुशबू में मेरे मन में एक नया उल्लास भर दिया. बहुत लम्बे अरसे के बाद मुझे बहूरानी के कामुक जिस्म की कामुक गंध मिली थी, मैं तो मदहोश ही हो गया था जवानी की गंध पाकर!
“पापा, अब बताओ भी क्या कह रहे थे आप?” बहूरानी ने मेरी ठोड़ी के नीचे हाथ रखकर मेरा चेहरा ऊपर उठा कर मेरी आँखों में झांकते हुए पूछा.अब मैं खुद को रोक नहीं पाया और मैंने बिना कोई जवाब दिए उसे अपने ऊपर झुका लिया और हमारे होंठ स्वतः ही जुड़ गये.किसी नवयौवना के अधरों का चुम्बन, उनका रसपान करना, विशेष तौर पर जब वो भी दिल से साथ निभा रही हो, कितनी स्वर्गिक आत्मिक आनन्द की अनुभूति कराता है, इसे शब्दों में बयाँ करना आसान नहीं है. हमारे जाने पहचाने होंठ यूं ही पता नहीं कितनी देर अठखेलियाँ करते रहे, हमारी जीभ एक दूजे के मुंह में घुस कर लड़ती झगड़ती रही और तन में वासना का ज्वार हिलोरें लेने लगा.
तभी बहूरानी ने खुद को काबू किया और हाँफती हुई सी मुझसे दूर खड़ी हो गई; उसकी आँखों में सम्भोग की चाहत गुलाबी रंगत लिए तैर रही थी.
“क्या हुआ अदिति बेटा?”“कुछ नहीं पापा जी, अब और नहीं, नहीं तो खुद को रोक नही पाऊँगी. ये दही ले कर आने वाले ही होंगे.”“अरे जल्दी जल्दी कर लेंगे न… देख तेरे बिना डेढ़ साल से ऊपर ही हो गया है.”“पापा जी आज दिन और रात का सब्र कर लो फिर कल की पूरी रात, परसों का पूरा दिन और पूरी रात ट्रेन में अपने ही हैं. आप जो चाहो, जैसे चाहो कर लेना मेरे साथ… मैं मना नहीं करूंगी. अभी वक़्त की नजाकत को समझो आप! मैंने भी तो जैसे तैसे खुद को संभाला है आप भी कंट्रोल करो खुद को!”“ठीक है बेटा, तू सही कह रही है, इतना उतावलापन भी ठीक नहीं है.” मैंने कहा.
“पापा जी, अब बताओ, आप कुछ कहने वाले थे मुझे देख कर?” बहूरानी सामने वाली कुर्सी पर बैठती हुई बोली.“हाँ बेटा, मैं यह कह रहा था कि अबकी तो तू एकदम बदली बदली लग रही है, तू पहले की अपेक्षा और भी ज्यादा छरहरी सी निखरी निखरी नयी नयी सी लग रही है.” मैंने कहा.“हाँ पापा जी, मैंने सुबह के टाइम योगा और प्राणायाम करना शुरू किया है और शाम को आधा घंटा जिम में वर्कआउट करती हूँ रोज!” बहूरानी थोड़ा इठला के बोली.“गुड, वैरी गुड, कीप इट अप बेटा!” मैंने कहा.
तभी मेरा बेटा दही ले के आ गया और हमारी बातें यहीं खत्म हो गयीं.इसके बाद बहूरानी के घर में क्या हुआ, वो कुछ ख़ास नहीं है कहने को.
अगले दिन शाम को 8 बजे हमारी ट्रेन थी. राजधानी एक्सप्रेस के प्राइवेट कोच में हम ससुर बहू ने क्या क्या किया ये सब जानने के लिए कल ट्रेन चलने का इंतज़ार कीजिये.
ससुर बहू की कामुकता, शारीरिक आकर्षण, वासना, प्रेम और चुदाई की
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07-26-2019, 02:02 PM,
#43
RE: Bahu ki Chudai बहुरानी की प्रेम कहानी
मेरा बेटा दही लेकर आ गया था. मैं भी फ्रेश हो के नहा के आ गया और सबने मिल के नाश्ता किया. हमारी ट्रेन अगले दिन शाम को थी.तो रात को सोने के पहले मैं बहूरानी के नाम के मुठ मारी और सो गया.तो अगले दिन…
अगले दिन शाम को साढ़े सात बजे ही हम लोग स्टेशन पहुंच गये और दस मिनट बाद ही राजधानी प्लेटफोर्म पर लग गई. यूं तो मैं हमेशा ही ऐ सी में सफ़र करने का प्रयास करता हूं, कभी मजबूरी में स्लीपर कोच में जाना पड़ा हो तो वो अलग बात है. लेकिन फर्स्ट ऐ सी में वो भी प्राइवेट कूपे में यात्रा करने का वो मेरा पहला मौका था और बहूरानी के साथ आने वाले छत्तीस घंटे बिताने के ख़याल से ही मुझे रोमांच होने लगा था.
ट्रेन के प्लेटफोर्म पर लगते ही हम अपनी कोच में चढ़े और कूपे में जा पहुंचे. वाह क्या शानदार नजारा था कूपे का. ऊपर नीचे दो हाई क्वालिटी मटेरियल से बनी बर्थ थीं, नीचे वाली बर्थ सोफे में भी कन्वर्ट हो जाती थी; कोच में बड़ी सी खिड़की, पर्दे और बड़ा सा शीशा लगा था, साथ में ऐ सी का टेम्प्रेचर अपने हिसाब से कंट्रोल करने के लिए स्विच थे, फर्श पर बढ़िया मेट्रेस बिछी थी.कुल मिला कर उम्मीद से भी बढ़िया सुख सुविधा युक्त डिब्बा था.
ठीक आठ बजकर पांच मिनट पर ट्रेन ने बंगलौर स्टेशन से रेंगना शुरू कर दिया और जल्दी ही प्लेटफोर्म और शहर की लाइट्स पीछे छूटने लगीं और खिड़की के बाहर अँधेरा दिखने लगा. ट्रेन एकदम स्मूथली बिना आवाज किये दिल्ली की तरफ दौड़ रही थी.मैंने कूप भीतर से लॉक कर दिया. बहूरानी सोफे पर बैठी अभी कूपे की साज सज्जा को देख ही रही थी कि मैंने उसे अपनी गोद में खींच लिया और उसके दोनों गालों को बारी बारी से चूमने लगा. बहूरानी जी बार बार अपना चेहरा अपनी हथेलियों से छुपाने का जतन करती लेकिन मैंने उसकी एक न चलने दी और अब उसके दोनों स्तन अपने अधिकार में करके अपनी मनमानी करने लगा.
तभी किसी ने दरवाजे पर धीरे से तीन बार नॉक किया. मैंने दरवाजा खोला तो बाहर टी सी खड़ा था.“गुड इवनिंग सर, आपकी टिकेट दिखाइए प्लीज!” वो भीतर आते हुए बोला“गुड इवनिंग” मैंने भी जवाब दिया और अपने टिकट उसे चेक करा दिए. उसने चार्ट में कहीं टिक किया और मुझे हैप्पी जर्नी विश करता हुआ चला गया.
मैंने तुरन्त कूपे को फिर से लॉक किया और बहूरानी को अपने आगोश में भर लिया. उसके जिस्म से उठती भीनी भीनी महक मुझे मदहोश करने लगी.“पापा जी अब बस भी करो ना, चलो पहले खाना खा लो फिर ये सब बाद में कर लेना अब तो टाइम ही टाइम है अपने पास!”
“अरे बेटा, इतनी जल्दी नहीं अभी आठ बीस ही तो हुए हैं. नाइन थर्टी पर खायेंगे. तब तक मैं एक दो ड्रिंक ले लेता हूं.” मैंने कहा.
फिर मैंने बैग में से व्हिस्की की बोतल निकाल ली और डिस्पोजेबल गिलास में बढ़िया सा पटियाला पैग बना के सिप करने लगा.बहूरानी ने फ्राइड काजू कागज़ की प्लेट में सजा के मुझे परोस दिए.
“पापा जी, मुझे कपड़े चेंज करने हैं मैं बत्ती बुझा रही हूं अपना गिलास संभालना आप!” बहूरानी बोली.“अरे बेटा, चेंज क्या करना. उतार ही डालो सब कुछ, वैसे भी अभी कुछ देर बाद उतारना ही है न” मैंने हंस कर कहा.
“पापा अब आप रहने भी दो. आप बन जाओ नागा बाबा मैं ना बनने वाली!” बहूरानी ने कहा और अपने बैगेज से रात के कपड़े निकालने लगीं. फिर उसने लाइट ऑफ कर दी और चेंज करने लगी. उसके कपड़े उतारने की सरसराहट मुझे सुनाई दे रही थी.
फिर वो एक एक करके अपने उतारे हुए कपड़े बर्थ पर फेंकने लगीं जो मेरे ही ऊपर गिर रहे थे; पहले साड़ी फिर ब्लाउज… फिर पेटीकोट… पैंटी और अंत में उसकी ब्रा मेरी गोद में आन गिरी. मैं तो जैसे इतना धन पा के धन्य हो गया और अंधेरे में ही बहूरानी की ब्रा और पैंटी को मसल मसल के सूंघने लगा.
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07-26-2019, 02:02 PM,
#44
RE: Bahu ki Chudai बहुरानी की प्रेम कहानी
जब लाइट जली तो बहूरानी एक झीनी सी पिंक नाइटी में नजर आयीं और अपनी पहनी हुई साड़ी वगैरह तह करके रखने लगी.बहूरानी की पारदर्शी नाइटी, जो सामने से खुलने वाली थी, में से उसके गुलाबी जिस्म की आभा दमक रही थी; उसने ब्रा या पैंटी कुछ भी नहीं पहना था. उसके तने हुए ठोस मम्मों पर नाइटी ऐसी लग रही थी जैसे खूँटी पर टंगी हो और उसकी पुष्ट जांघें देख कर और उसके मध्य स्थित उसकी रसीली गद्देदार चूत की कल्पना करके ही लंड में तनाव भरना शुरू हो गया.
बहूरानी चेंज करने के बाद मेरे सामने ही बैठ गयी और किसी मैगज़ीन को पलटने लगी. इधर मैं अपनी ड्रिंक सिप करता रहा और अपने फोन से बहूरानी को शूट करता रहा. कभी उसकी नाइटी घुटनों तक सरका के उसको शूट करता रहा कभी उसका एक पैर ऊपर मोड़ के जिससे उसकी जांघ का कुछ हिस्सा मेरे कैमरे के हिस्से में भी आ जाए.
मेरे यूं उसके फोटो शूट करने से बहूरानी मुझे कभी गुस्से से देखती हुई मना करती. लेकिन उसने मुझे मेरी मनमानी करने दी. बहूरानी अपने भाई की शादी में जा रही थी तो उसके हाथ पैरों में रची मेहँदी, आलता नाखून पोलिश और ऊपर से गोरे गोरे गुलाबी पैरों में सोने की पायल… मेरा एक एक शॉट लाजवाब निकला.
कोई एक घंटे बाद मेरी ड्रिंक्स खत्म हुई तो बहूरानी ने खाना निकाल लिया और बर्थ पर अखबार बिछा कर कागज़ की डिस्पोजेबल प्लेट्स और कटोरियाँ सजा दीं. फिर अल्युमिनियम फोइल्स में लिपटे हुए परांठे, सब्जी, पिकिल्स, प्याज, नमकीन सेव और स्वीट्स परोस लिया.हम लोगों को ट्रेन का खाना पसन्द नहीं आता इसलिए कोशिश हमेशा यही रहती है कि हमेशा अपना घर का खाना पानी साथ ले के चलें; हालांकि राजधानी और शताब्दी ट्रेन्स में चाय नाश्ता खाना मिलता ही है और उसका चार्ज पहले ही टिकट के साथ ही वसूल लिया जाता है.अब जो भी हो अगली सुबह से तो हमें ट्रेन पर मिलने वाले दाना पानी पर ही निर्भर रहना था.
खाना सजाने के बाद बहूरानी ने पहला कौर मुझे अपने हाथों से खिलाया; ऐसा पहली बार था कि उसने यूं मुझे खिलाया हो फिर मैंने भी उसको एक छोटा सा निवाला उसको खिलाया. फिर मैं खाने पर टूट पड़ा क्योंकि ट्रेन के सफ़र में मुझे भूख नार्मल से कुछ ज्यादा ही लगती है.
खाना समाप्त करते करते दस बजने वाले थे. खाने के बाद मैंने एक चक्कर पूरे कोच का लगाया ताकि कुछ टहलना हो जाय.
वापिस अपने कूपे में लौटा तो बहूरानी जी शीशे के सामने अपने उलझे हुए बाल संवार रही थी. मैंने कूपे को भीतर से लॉक किया और बहू रानी की पीठ से चिपक के उसको अपने बाहुपाश में कैद कर लिया और उसके स्तन मुट्ठियों में दबोच के उसकी गर्दन के पिछले हिस्से को चूमने चाटने लगा.
बहूरानी एकदम से घूम के मेरे सामने हुई और उसने हाथ में पकड़ी कंघी फेंक कर अपनी बाहें मेरे गले में पहना दीं, मैंने भी उसको अपने सीने से लगा लिया. उसके पुष्ट स्तन मेरे सीने से दब गये और मैंने अपनी बाहों का घेरा उसके गिर्द कस दिया. हमारे प्यासे होंठ मिले जीभ से जीभ मिली इधर मेरे लंड ने अंगड़ाई ली और उधर शायद उसकी चूत भी नम हुई क्योंकि वो अपना एक हाथनीचे ले गयी और उसने नाइटी को अपनी जांघों के बीच समेट कर दबा ली.
हम दोनों यूं ही देर तक चूमा चाटी करते रहे; मैं उसके मम्में नाइटी के ऊपर से ही दबाता रहा और वो मेरी पीठ को सहलाती रही.अब मेरा लंड भी पूरे तैश में आने लगा था.
फिर मैंने बहूरानी की नाइटी उसके बदन से छीन के बर्थ पर फेंक दी; नाइटी के भीतर तो उसने कुछ पहना ही नहीं था तो उसका नग्न यौवन मेरे सामने दमक उठा. उसके पहाड़ जैसे स्तन जैसे मुझे चुनौती देने वाले अंदाज में मेरे सामने तन के खड़े हो गये.
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07-26-2019, 02:02 PM,
#45
RE: Bahu ki Chudai बहुरानी की प्रेम कहानी
मैंने भी उसकी चुनौती स्वीकार की और उसको दबोच लिया, उसको मीड़ने गूंथने लगा… अंगूरों को चुटकियों में भर के उमेठने लगा, नीम्बू की तरह निचोड़ने लगा… प्यार से हौले हौले. बहूरानी कामुक सिसकारियाँ लेने लगीं और मुझे अपने से लिपटाने लगी.
फिर उसने मेरी शर्ट के बटन जल्दी से खोल दिए जिसे मैंने खुद ही बनियान सहित उतार के फेंक दिया और बहूरानी के नंगे जिस्म को पूरी ताकत से भींच लिया.“आह… पापा जी. धीरे धीरे… मेरी पसलियाँ टूट जायेंगी इतनी ताकत से तो!” बहूरानी अत्यंत कामुक स्वर में बोली और उसने मेरे चौड़े सीने में अपना मुंह छुपा लिया और वहीं चूमने लगी.
फिर उसका एक हाथ नीचे मेरे लोअर के ऊपर से ही मेरे लंड को टटोलने लगा. उसने मेरे लोअर में हाथ घुसा के लंड को पकड़ लिया उसके ऐसे करते ही मेरा लंड और तमतमाने लगा.
मैंने अपना लोअर और अंडरवियर नीचे खिसका के निकाल फेंका. अब मेरा फनफनाता लंड पूरी तरह से आजाद होकर हवा में लहराया और फिर उसने एक हाई जम्प लगा कर बहूरानी को जैसे सलाम ठोका, बहूरानी ने भी इस अभिवादन को स्वीकार करते हुए इसे प्यार से अपनी चूत पर टच किया और फिर पकड़ कर इसकी फोर-स्किन को पीछे करके टोपा को दबाने मसलने लगी, फिरलंड को जड़ के पास से पकड़ कर दबाया सहलाया साथ में अण्डों को भी दुलारा.
रात धीरे धीरे गुजर रही थी और राजधानी अपने पूरे दम से दिल्ली की ओर भाग रही थी जिसके किसी डिब्बे में भीतर ससुर बहू के नंगे जिस्म सनातन यौन सुख का रसपान करते हुए एक दूसरे में समा जाने को मचल रहे थे. हमारे जिस्मों की ताप पर ऐ सी की कूलिंग भी कोई असर नहीं डाल पा रही थी.
फिर जो प्रतीक्षित था बहूरानी ने वही किया; वो नीचे झुकी और पंजों के बल बैठ कर मेरे लंड को तन्मयता से चाटने चूमने लगी. फिर उसने अपना मुख खोल दिया और मेरा लंड स्वतः ही उसकी मुख गुहा में प्रवेष कर गया और फिर बहूरानी के होंठ और जीभ मेरे लंड पर क़यामत ढाने लगे.मेरे लिए एक तरह से यह यौन सुख की पराकाष्ठा ही थी. जो सुख मुझे मेरी सगी बीवी, मेरे बेटे की माँ नहीं दे सकी थी वो सुख उसकी बीवी, मेरी पुत्रवधू… कुलवधू मुझे दे रही थी.
बहूरानी के लंड चूसने चाटने का तरीका भी कमाल का था… खूब चटखारे ले ले कर, अपनेपन और पूरे समर्पण भाव से बिना किसी हिचकिचाहट के लंड पर अपना प्यार उड़ेलती और उसके यूं लंड को पुचकारने चूमने से निकलती, पुच पुच की आवाज मुझे मस्त करने लगी.
“अदिति बेटा, शाबाश, ऐसे ही… हां… आह मेरी जान बहूरानी जी तू तो कमाल कर रही है आज!” मैंने मुग्ध होकर कहा.“पापा जी, आज पूरे डेढ़ साल बाद ये मेरे हाथ आया है. इसे तो मैं जी भर के प्यार करूंगी.” बहूरानी मेरी तरफ देख के बोली और फिर से लंड को चाटने चूसने में मगन हो गयी.
कुछ ही देर बाद :“बस मेरी जान रहने दे. अब तू बर्थ पर बैठ जा.” मैंने बहूरानी के सिर को सहलाते हुए कहा.“ठीक है पापा जी!” बहूरानी बोली और लंड को छोड़ के बर्थ पर जा बैठी.
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07-26-2019, 02:02 PM,
#46
RE: Bahu ki Chudai बहुरानी की प्रेम कहानी
अभी तक इस सेक्सी कहानी में आपने पढ़ा कि मैं अपनी पुत्रवधू यानि बहू के साथ फर्स्ट क्लास ए सी के प्राईवेट केबिन में अकेला था. मेरी बहू पूरी नंगी हो चुकी थी.अब आगे:
मैं नीचे फर्श पर ही बैठ गया और मैंने बहूरानी के दोनों पैर उठा कर अपने कन्धों पर रख लिये और उसकी कमर में दोनों हाथ डाल कर उसे अपनी ओर खींच लिया जिससे उसकी चूत मेरे मुंह के ठीक सामने आ गयी… बिल्कुल करीब; उसकी एकदम सफाचट चिकनी क्लीन शेव्ड चूत मेरे सामने थी. उसकी गुलाबी जांघें V शेप में मेरे सामने खुलीं थीं और जांघों के जोड़ पर वो खूब उभराहुआ गद्देदार तिकोना चबूतरा देख कर मेरे खून में उबाल आने लगा. बहूरानी की चूत की लम्बी सी दरार उस टाइम बंद थी.
मैंने उसकी चूत की दरार के निचले हिस्से पर अपनी जीभ रखी और ऊपर तक चाट लिया और इसी तरह फिर से किया. इस बार उसकी चूत के होंठ स्वतः ही खुल गये और मैंने उसकी भगनासा को जीभ से हौले से छुआ. चूत के दाने पर मेरी जीभ लगते ही बहूरानी के मुंह से एक आनन्ददायक सिसकारी निकल गयी और वो बर्थ पर अधलेटी सी हो गयी और अपनी पीठ पीछे टिका ली, फिर उसने अपनी टाँगें मेरी गर्दन में लिपटा कर मेरा मुंह अपनी चूत पर दबा दिया और मेरे बाल सहलाने लगी.
बहूरानी की चूत से वही चिरपरिचित गंध आ रही थी जैसे दालचीनी, गरम मसाला और कपूर सब इकट्ठे एक कंटेनर में रखने से आती है. अब मेरी जीभ उसकी चूत को लपलप करके चाटने लगी और जितनी गहराई तक भीतर जा सकती थी जाकर चूत में तहलका मचाने लगी. उसकी चूत का नमकीन रस मेरे मुंह में घुलने लगा.
मुझे पता था कि बहूरानी जी को मम्में दबवाते हुये अपनी चूत चटवाना बेहद पसन्द है तो मैंने उसके दोनों स्तन मुट्ठियों में भर लिए और उन्हें मसलते हुए उसकी जांघें चाटने लगा. कुछ देर उसकी केले के तने जैसी चिकनी जांघें चाटने काटने के बाद मैंने उसकी चूत के चबूतरे पर अपनी जीभ से हमला बोल दिया और हौले हौले दांतों से कुतर कुतर के चूत के ऊपर चाटने लगा.
जल्दी ही बहूरानी अच्छे से मस्ता गयीं और अपनी चूत उठा उठा के मेरे मुंह में देने लगीं.
“आह… पापा जी… यू लिक सो नाईस. आई एम फुल्ली वेट नाउ… लिक मी डाउन एंड डीप!” बहूरानी अत्यंत कामुक स्वर में बोली और मेरे बाल पकड़ कर मेरा चेहरा अपनी चूत पर जोर से दबा लिया और मेरे सिर के ऊपर से एक पैर लपेट कर मेरे मुंह को अपनी चूत पर लॉक कर दिया.
“या बेबी… योर साल्टी पुसी टेस्ट्स सो लवली!” मैंने कहा और बहूरानी की समूची बुर को अपने मुंह में भर लिया और इसे झिंझोड़ने लगा
“हाय राम, कितना मज़ा दे रहे हो आज तो आप पापा जी!” बहूरानी बोलीं और उसने अपने पैरों को मेरे सिर के ऊपर से हटा लिया और उन्हें दायें बायें फैला दिया जिससे उसकी चूत मेरे सामने ज़ूम हो कर और विशाल रूप में आ गई और जैसे ही मैंने उसे फिर से चाटना शुरू किया बहूरानी जी की कमर अनियंत्रित होकर उछलने लगी जैसे कोई खिलौने वाली गुड़िया हो.
“फक मी हार्ड नाउ पापा!”“या अदिति बेटा, ऍम गोइंग टू ड्रिल योर चूत नाउ!” मैंने बोला और फर्श पर से उठ कर बहूरानी पर झुक गया और अपने लंड से उसकी रिसती हुई चूत को रगड़ने लगा.“ओफ्फो… पापा जी; अब घुसा भी दो ना!” बहूरानी जी सिसिया कर बोलीं और अपनी कमर उठा उठा कर चूत को मेरे लंड से लड़ाने लगी.
लेकिन मैं उसे अभी और गर्म करना चाहता था इसलिए मैंने अपनी कमर पीछे की तरफ कर ली और उसके मम्में दबोच के चूसने लगा. मेरे ऐसे करते ही बहूरानी अपनी चूत और ताकत से ऊपर तक उठा उठा के मेरे लंड से भिड़ाने की कोशिश करने लगी. लेकिन मैं उसे ऐसा करने दूं तब ना; और मैं और ऊपर को हो गया. मेरे यूं उससे दूर हटते ही बहूरानी जी को जैसे हिस्टीरिया कर दौरा पड़ा हो, उसका सिर बर्थ पर दायें बायें होने लगा… उसके मम्में सख्त हो गये और निप्पल फूल कर भूरे अंगूर की तरह नज़र आने लगे.अभी तक इस सेक्सी कहानी में आपने पढ़ा कि मैं अपनी पुत्रवधू यानि बहू के साथ फर्स्ट क्लास ए सी के प्राईवेट केबिन में अकेला था. मेरी बहू पूरी नंगी हो चुकी थी.अब आगे:
मैं नीचे फर्श पर ही बैठ गया और मैंने बहूरानी के दोनों पैर उठा कर अपने कन्धों पर रख लिये और उसकी कमर में दोनों हाथ डाल कर उसे अपनी ओर खींच लिया जिससे उसकी चूत मेरे मुंह के ठीक सामने आ गयी… बिल्कुल करीब; उसकी एकदम सफाचट चिकनी क्लीन शेव्ड चूत मेरे सामने थी. उसकी गुलाबी जांघें V शेप में मेरे सामने खुलीं थीं और जांघों के जोड़ पर वो खूब उभराहुआ गद्देदार तिकोना चबूतरा देख कर मेरे खून में उबाल आने लगा. बहूरानी की चूत की लम्बी सी दरार उस टाइम बंद थी.
मैंने उसकी चूत की दरार के निचले हिस्से पर अपनी जीभ रखी और ऊपर तक चाट लिया और इसी तरह फिर से किया. इस बार उसकी चूत के होंठ स्वतः ही खुल गये और मैंने उसकी भगनासा को जीभ से हौले से छुआ. चूत के दाने पर मेरी जीभ लगते ही बहूरानी के मुंह से एक आनन्ददायक सिसकारी निकल गयी और वो बर्थ पर अधलेटी सी हो गयी और अपनी पीठ पीछे टिका ली, फिर उसने अपनी टाँगें मेरी गर्दन में लिपटा कर मेरा मुंह अपनी चूत पर दबा दिया और मेरे बाल सहलाने लगी.
बहूरानी की चूत से वही चिरपरिचित गंध आ रही थी जैसे दालचीनी, गरम मसाला और कपूर सब इकट्ठे एक कंटेनर में रखने से आती है. अब मेरी जीभ उसकी चूत को लपलप करके चाटने लगी और जितनी गहराई तक भीतर जा सकती थी जाकर चूत में तहलका मचाने लगी. उसकी चूत का नमकीन रस मेरे मुंह में घुलने लगा.
मुझे पता था कि बहूरानी जी को मम्में दबवाते हुये अपनी चूत चटवाना बेहद पसन्द है तो मैंने उसके दोनों स्तन मुट्ठियों में भर लिए और उन्हें मसलते हुए उसकी जांघें चाटने लगा. कुछ देर उसकी केले के तने जैसी चिकनी जांघें चाटने काटने के बाद मैंने उसकी चूत के चबूतरे पर अपनी जीभ से हमला बोल दिया और हौले हौले दांतों से कुतर कुतर के चूत के ऊपर चाटने लगा.
जल्दी ही बहूरानी अच्छे से मस्ता गयीं और अपनी चूत उठा उठा के मेरे मुंह में देने लगीं.
“आह… पापा जी… यू लिक सो नाईस. आई एम फुल्ली वेट नाउ… लिक मी डाउन एंड डीप!” बहूरानी अत्यंत कामुक स्वर में बोली और मेरे बाल पकड़ कर मेरा चेहरा अपनी चूत पर जोर से दबा लिया और मेरे सिर के ऊपर से एक पैर लपेट कर मेरे मुंह को अपनी चूत पर लॉक कर दिया.
“या बेबी… योर साल्टी पुसी टेस्ट्स सो लवली!” मैंने कहा और बहूरानी की समूची बुर को अपने मुंह में भर लिया और इसे झिंझोड़ने लगा
“हाय राम, कितना मज़ा दे रहे हो आज तो आप पापा जी!” बहूरानी बोलीं और उसने अपने पैरों को मेरे सिर के ऊपर से हटा लिया और उन्हें दायें बायें फैला दिया जिससे उसकी चूत मेरे सामने ज़ूम हो कर और विशाल रूप में आ गई और जैसे ही मैंने उसे फिर से चाटना शुरू किया बहूरानी जी की कमर अनियंत्रित होकर उछलने लगी जैसे कोई खिलौने वाली गुड़िया हो.
“फक मी हार्ड नाउ पापा!”“या अदिति बेटा, ऍम गोइंग टू ड्रिल योर चूत नाउ!” मैंने बोला और फर्श पर से उठ कर बहूरानी पर झुक गया और अपने लंड से उसकी रिसती हुई चूत को रगड़ने लगा.“ओफ्फो… पापा जी; अब घुसा भी दो ना!” बहूरानी जी सिसिया कर बोलीं और अपनी कमर उठा उठा कर चूत को मेरे लंड से लड़ाने लगी.
लेकिन मैं उसे अभी और गर्म करना चाहता था इसलिए मैंने अपनी कमर पीछे की तरफ कर ली और उसके मम्में दबोच के चूसने लगा. मेरे ऐसे करते ही बहूरानी अपनी चूत और ताकत से ऊपर तक उठा उठा के मेरे लंड से भिड़ाने की कोशिश करने लगी. लेकिन मैं उसे ऐसा करने दूं तब ना; और मैं और ऊपर को हो गया. मेरे यूं उससे दूर हटते ही बहूरानी जी को जैसे हिस्टीरिया कर दौरा पड़ा हो, उसका सिर बर्थ पर दायें बायें होने लगा… उसके मम्में सख्त हो गये और निप्पल फूल कर भूरे अंगूर की तरह नज़र आने लगे.
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07-26-2019, 02:02 PM,
#47
RE: Bahu ki Chudai बहुरानी की प्रेम कहानी
“मुझे आपका लंड अपनी चूत में चाहिये पापा …जल्दी से पेल दो मेरी चूत में!” बहूरानी जी अब भयंकर चुदासी होकर निर्लज्ज होने लगी थी और यही मैं चाहता था.संग सहवास करने वाली स्त्री चाहे वो कोई भी हो, चुदाई के टाइम उसकी निर्लज्जता उसका बिंदासपन एक अनमोल गुण होता है जो कुछ ही कामिनियों को प्राप्त है; यूं तो नारी का शर्मीला, लज्जालु, शीलवान स्वाभाव ही उसका नैसर्गिक गहना है लेकिन सम्भोग काल में जब वह लाज शर्म तज कर बिंदास उन्मुक्त कामिनी का रूप धर चुदाई में लीन हो कर अपने साथी को पूरा आनन्द उसकी इच्छानुसार देती है और खुद भी तृप्त होती है तब ही उसका नारीत्व पूर्णता को प्राप्त करता है.
यहां एक बात और कहना चाहूंगा कि शुरुआत में जब हमारे बीच यौन सम्बन्ध स्थापित हुए तो बहूरानी चूत, लंड, चुदाई जैसे अश्लील शब्द बोलना तो क्या सुनना भी पसन्द नहीं करती थी. मैं बोलता तो वो अपने कान हथेलियों से ढक लेती; लेकिन धीरे धीरे मैं उसे अपनी मर्जी के अनुसार ढालता गया और वो ढलती गयी. अब उसे चूत लंड जैसे शब्द मुंह से निकालने में कोई हिचक नहीं होती.
“पापा जी ई ई… मुझे अपने लंड से चोदिये ना प्लीज!” बहूरानी अपनी आँखें मूँद कर अपनी कमर उठा कर बोली.वक़्त की नजाकत को समझते हुए मैंने अपना लंड बहूरानी की चूत की देहरी पर रख दिया और उसके दोनों दूध कसकर दबोचे और… इससे पहले कि मैं धक्का मारता, बहूरानी ने अपनी कमर पूरे दम से ऊपर उछाली और मेरा लंड लील लिया अपनी चूत में.
ठीक इसी टाइम कोई ट्रेन विपरीत दिशा से आती हुई मेरी राजधानी को क्रॉस करती हुई धड़धड़ाती, हॉर्न देती हुई बगल से निकल गयी. कुछ देर का शोर उठा और फिर पहले की तरह शान्ति छा गयी.
अब तक बहूरानी ने अपने पैर मेरी कमर में बांध दिये थे और मुझे बेतहाशा चूमे जा रही थी. मैंने धक्का लगाने को कमर उठाई तो बहूरानी जी चिपकी हुई मेरे साथ ऊपर को उठ गयी.
“अदिति बेटा, अपने पैर खोल दे और ऊपर कर ले!” मैंने धक्के लगाने का प्रयास करते हुए कहा.“ऊं हूं… आप लंड बाहर निकाल लोगे!” वो बोली जैसे उसने इसी बात के डर से मुझे अपने से बांध लिया था.
बहूरानी के इस भोलेपन पर मुझे हंसी आ गई- अरे नहीं निकालूंगा बेटा, अब तो तेरी चूत मारनी है न!मैंने उसे चूमते हुए कहा.“पहले प्रॉमिस करो?”“ओके बिटिया रानी… आई प्रॉमिस!”
मेरे कहने से बहूरानी ने अपने पैरों के बंधन से मुझे आजाद कर दिया और अपने घुटने मोड़ कर ऊपर की ओर कर लिए. अब उसकी चूत अपना मुंह बाये हुये मेरे सामने थी और चूत का दाना फूल कर बाहर की ओर निकल आया था. मैं बहूरानी के ऊपर झुक गया और उसकी प्यासी चूत का दाना अपनी छोटी छोटी नुकीली झांटों से घिसने लगा. बहूरानी ने भी मिसमिसाकर अपनी चूत और ऊपर उठा दी और अपने नाखून मेरी पीठ में गड़ा दिए. मैं भी उसके निप्पल चुटकियों में भर के बड़े आराम से मसलने लगा और साथ में उसका निचला होंठ अपने होंठों से चूसने लगा.
बहूरानी जी मुझसे किसी लता की तरह लिपट गयीं जैसे सशरीर ही मुझमें समा जाना चाहती हो.“लव यू पापा…” वो नशीली आवाज में बोली.“बेटा, आई लव यू टू…” मैंने कहा और उसका बायाँ दूध चूसने लगा.
बहूरानी की चूत से जैसे रस का झरना बह रहा था, मैंने लंड को अन्दर बाहर करना शुरू कर दिया. पहले धीरे धीरे फिर रफ़्तार बढ़ा दी. बहूरानी भी मेरे धक्कों का जवाब अपनी चूत से देने लगी. फिर मैं किसी वहशी की तरह उसकी चूत मारने लगा. लंड को पूरा बाहर तक खींच कर फिर पूरी ताकत से उसकी चूत में पेलने लगा.मेरे हर धक्के का जवाब वो पूरे लय ताल से अपनी कमर उचका उचका के देने लगी.
चुदाई की फच फच की मधुर आवाजें और बहूरानी के मुंह से निकलती संतुष्टिपूर्ण किलकारियाँ और अपनी पूरी रफ़्तार से दिल्ली की ओर दौड़ती राजधानी एक्सप्रेस…“पापा जी… अच्छे से कुचल डालो इस चूत को आज!”“हां बेटा, ये लो… और लो… अदिति मेरी जाऽऽऽन!” मैं भी यूं बोलते हुए अपने हाथों और पैरों के बल उस पर झुक गया. अब मेरे शरीर का कोई अंग बहूरानी को छू नहीं रहा था; सिर्फ मेरा लंड उसकी चूत में घुसा था… मैंने इसी पोज में उसे चोदना शुरू कर दिया.
“आःह पापा जी…मस्त हो आप. फाड़ डालो मेरी चूत को… ये मुझे बहुत सताती है बहुत ही परेशान करती रहती है. आज इसकी अच्छे से खबर लो आप!” बहूरानी जी अपनी चूत मेरे लंड पर उछालते हुए बोली.
हम ससुर-बहू ऐसे ही कुछ देर और ट्रेन में चुदाई का कभी न भूलने वाला अलौकिक आनन्द लूटते रहे. फिर हम दोनों एक संग स्खलित होने लगे. मेरे लंड से रस की फुहारें मेरी इकलौती बहूरानी की चूत में समाने लगी और वो भी मुझसे पूरी ताकत सी लिपट गयी.
लाइट का स्विच पास में ही था, मैंने बहूरानी को लिपटाए हुए ही बत्ती बंद कर दी और अंधेरे कूपे में फिर से उसके होंठ चूसने लगा; रास्ते में कोई छोटा स्टेशन आता तो वहां की रोशनी एकाध मिनट के लिए भीतर आती और फिर घुप्प अँधेरा हो जाता.सच कहूं तो ऐसा सम्भोग सुख मैं पहली बार भोग रहा था.
फिर पता नहीं कब नींद ने हमें घेर लिया.
अगले दिन सुबह देर से आँख खुली. बहूरानी अभी भी मुझसे नंगी ही लिपटी हुई बेसुध सो रही थी पर उसके होंठो पर मधुर मुस्कान खेल रही थी, शायद कोई हसीन सपना देख रहीं हो.मैं बड़े आहिस्ता से उसके पहलु से निकला और अपनी टी शर्ट और लोअर पहन लिया. सुबह के साढ़े सात बज चुके थे चारों ओर उजाला फ़ैल चुका था ट्रेन अभी भी पूरे रफ़्तार से अपना सफ़र तय कर रही थी.
कुछ ही देर बाद ट्रेन सिकंदराबाद स्टेशन पर आ कर ठहर गयी. मैंने बहूरानी के नंगे जिस्म पर कम्बल ओढ़ा दिया; तभी उसकी नींद खुल गयी और उसे अपनी नग्नता का अहसास होते ही उसने कम्बल को अपने कन्धों के ऊपर तक ओढ़ लिया और मुस्कुरा के मेरी तरफ देखा.
“अदिति बेटा, नींद तो अच्छी आई ना?” मैंने अपना टूथपेस्ट ब्रश पर लगाते हुए पूछा.“हां पापा जी… अब मैं खुद को बहुत ही हल्का फुल्का फील कर रही हूं. थैंक्स फॉर आल दैट!” वो शर्माते हुए बोली.“ओके बेटा जी, मैं फ्रेश होकर आता हूँ.” मैंने कहा और अपना टूथब्रश मुंह में चलाते हुए कूपे से निकल गया.
मैं वापिस लौटा तो बहूरानी ने सलवार कुर्ता पहन लिया था और मेरे आते ही वो बाहर निकल गयी. मैं खिड़की से बाहर के नज़ारे देखने लगा. मेरे लिये ये एकदम अनजाना रूट था मैं इस रास्ते पर पहले कभी नहीं आया था लेकिन ये बदला बदला माहौल सुखद लग रहा था.
बहूरानी वापिस आ गयी और अपने बाल संवारने लगी.
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07-26-2019, 02:03 PM,
#48
RE: Bahu ki Chudai बहुरानी की प्रेम कहानी
अभी तक इस फ्री सेक्सी कहानी में आपने पढ़ा कि मैंने रात को अपनी पुत्रवधू को फर्स्ट क्लास ए सी के प्राईवेट केबिन में पूरा मजा लेकर और देकर चोदा. पूरे डेढ़ साल बाद मैंने अपनी कामुकता से भरपूर बहू की चूत की चुदाई की थी.
अब आगे क्या हुआ, कहानी का मजा लें:तभी पेंट्री कार का स्टाफ चाय नाश्ता लेकर आ गया, साथ में ताजा न्यूज़पेपर भी था.
इन सबसे निपट कर हम दोनों यूं ही बातें करते रहे कि शादी में क्या क्या होना है.ये… वो…मैं बीच बीच में बहू का हाथ अपने हाथ में लेकर सहलाता रहा, बहू के बदन को भी बिना किसी हिचक के यहाँ वहां छूकर बातें कर रहा था. बहू भी मुझसे पूर्ण रूपेण स्वछंद उन्मुक्त मित्रवत व्यवहार कर रही थी.ऐसे ही बातें करते करते दोपहर के एक बजे से ऊपर ही टाइम हो गया. लंच भी सर्व हो गया. हम लोग लंच करके दो बजे तक फ्री हो गये.ट्रेन की लम्बी जर्नी में कुछ करने को तो होता नहीं, बस खाओ, पियो और सोओ. लेकिन मेरे साथ तो बहूरानी थी और हम लोगों का ट्रेन से दिल्ली जाने का एक ही उद्देश्य था – चुदाई चुदाई और चुदाई!
“अदिति बेटा, अब आजा फिर से!”“क्यों आऊँ पापा जी… मैं तो यहीं ठीक हूं!”“अरे आ ना टाइम पास करते हैं दोनों मिल के!”“टाइम तो अच्छे से पास हो रहा है मेरा यहीं बैठे बैठे!”“बेटा जी, इस कूपे का हजारों रुपये किराया दिया है हमने. अभी दिल्ली पहुँचने में 18 घंटे बाकी हैं. चल आ जा अपने पैसे वसूल करें!”
“वो कैसे करोगे पापा जी?”“जैसे कल रात किये थे.”“रहने दो पापा… मेरी नीचे वाली अभी तक दुःख रही है. आपने तो कल बिल्कुल बेरहम, निर्दयी बन के कुचल दिया मुझे. जरा भी रहम नहीं आया आपको अपनी बहूरानी पर?”“अच्छा, अब तू मुझे ही दोष दे रही है? रात को तू ही तो ‘लव यू… लव यू…’ बोल कर कह रही थी- कुचल डालो इसे… फाड़ के रख दो मेरी चूत आज… बहुत सताती है ये!“इसका मतलब यह थोड़ी न के आप सच में ही रौंद डालो मेरी कोमल जगह को बेरहमी से; चाहे कोई जिये या मरे; आपकी बला से!”बहूरानी थोड़ा तुनक कर बोलीं लेकिन उनकी आँखें से शरारत झलक रही थी.
“और जो अभी सुबह सुबह तू मुझे थैंक्स बोल रही थी वो किसी ख़ुशी में था?”“वो तो ऐसे ही आपका दिल रखने के लिये; रात में आपने इतनी कठोर मेहनत जो की थी न मेरे ऊपर चढ़ के!”“और अब क्या इरादा है मेरी प्यारी प्यारी बहूरानी का?”“पापा जी, जो आप चाहो… आखिर हमने हजारों रुपये रेलवे को पे किये हैं, उसमें से जितने वसूल हो जायें उतना अच्छा!”“यह हुई न बात!” मैं बोला और बहूरानी को अपनी गोद में घसीट लिया.
“अदिति बेटा, तेरी ये नीचे वाली सच में दुख रही है?” मैंने उनकी चूत सलवार के ऊपर से ही सहलाते हुए पूछा.“हा हा हा, अरे नहीं पापा जी. मैं तो बस ऐसे ही हंसी ठट्ठा कर रही थी. ये ससुरी ना दुखती… इसे तो लंड से जितना मारो पीटो… उतनी ही ज्यादा खुश होती है बेशरम!” बहूरानी जी खनकती हुई हंसी हंसी.बहू रानी आगे बोली- यह आपकी चहेती हो गई है, बिगड़ गई है, पूरी की पूरी ढीठ हो गई है, हद कर दी इसने तो बेशर्मी की!
“तो फिर आ जा मेरी रानी… कुछ नया करते हैं अब इसके साथ!” मैंने कहा- बोलो बहूरानी… क्या ख्याल है?“अब और क्या नया होना बाकी रह गया पापा जी… सब कुछ हर तरीके से तो कर चुके आप मेरे साथ. वो घुसेगा तो मेरी ही में है न?”“अरे वो नहीं घुसेगा तेरी में; अभी तो सिर्फ एन्जॉय करेंगे अलग तरीके से!”“अच्छा ठीक है, बताओ क्या करना है?” बहूरानी बोली.
“पहले तू पूरी न्यूड हो के बैठ जा मेरे सामने मुंह करके!”“धत्त, दिन में ही?” बहू रानी बोली.“अरे बेटा दिन रात से क्या फर्क पड़ता है, चल आ जा!”
बहू रानी ने पहले कूपे को चेक किया कि वो अन्दर से ठीक से बंद है या नहीं… फिर पहले अपनी बाहें ऊपर उठा कर अपना कुर्ता और सलवार का नाड़ा खोला और सलवार भी उतार डाली.आह… क्या गजब का हुस्न दिया है ऊपर वाले ने मेरी बेटी सी बहू अदिति को. सिर्फ ब्रा और पैंटी में मेरी बहूरानी की जवानी क़यामत ढा रहीं थी. डिजाइनर ब्रा में बहू के मम्में और भी दिलकश लग रहे थे और उसकी पैंटी में वो उभरी हुई चूत… चूत का त्रिभुज और लम्बी सी दरार बिल्कुल साफ़ साफ़ दिख रही थी पैंटी के ऊपर से! पैंटी के ऊपर चूत की दरार इस तरह से दिखे तो पोर्न की दुनिया में इसे कैमल टो Camel toe कहते हैं.
ससुर और बहू की कामवासना और चुदाईमुझे अपनी बहू की कैमल टो बहुत सेक्सी लगी तो मैंने अपना स्मार्ट फोन निकाल कर उसकी पैंटी की एक फोटो खींच ली.
मैंने बहूरानी का हाथ पकड़ के अपने पास खींचा और पहले तो पैंटी के ऊपर से ही उसकी चूत की जो दरार दिख रही थी, उसमें उंगली फिराई, फिर बहू की पैंटी थोड़ी सी साइड में सरका कर उसकी नंगी चूत की दरार में उंगली फिराई और फिर चूत को चूम लिया.
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07-26-2019, 02:03 PM,
#49
RE: Bahu ki Chudai बहुरानी की प्रेम कहानी
फिर मैं उठ कर खड़ा हो गया और अपने कपड़े उतार कर बिल्कुल नंगा हो गया. मेरा मुरझाया लंड झूल रहा था जो धीरे धीरे जान पकड़ रहा था.
अब मैंने अपनी बहू की की ब्रा का हुक खोल दिया; हुक खुलते ही ब्रा के स्ट्रेप्स स्प्रिंग की तरह उछल गये और मैंने ब्रा को उतार कर बर्थ पर डाल दिया और बहूरानी को अपने सीने से लगा लिया. उनके मम्में मेरे सीने में समा गये. मैंने उसके कान की लौ को अपने होंठों और जीभ से चुभलाया और फिर कान के नीचे और गर्दन चूम डाली. फिर उसे बर्थ पर एक कोने में बैठा दिया.
बर्थ के दूसरे कोने पर मैं बैठ गया और बहूरानी के पांव पकड़ कर अपनी गोद में रख लिए.
“पापा जी… मेरे पांव छोड़िये… मुझे अच्छा नहीं लगता!” मेरी संस्कारशील बहू रानी बोली और अपने पैर पीछे खींचने लगी. मेरी बहू को उसके ससुर द्वारा उसके पाँव छूना अच्छा नहीं लगा.“अरे बेटा, तू टेंशन मत ले… बस एन्जॉय कर मेरे साथ!” मैंने उनके पांवों के दोनों तलुए चूम डाले और अपना लंड उनके तलुओं के बीच फंसा लिया.
“अदिति बेटा, अब तू अपने पैरों से मेरे लंड से खेल; अपने पंजों में इसे दबा कर इसकी मूठ मार और इसे रगड़!”
मेरे कहने से बहूरानी ने मेरा लंड अपने पैरों के पंजों में अच्छे से दबा लिया और इसे हल्के हल्के रगड़ने लगी जैसे हम कोई चीज अपनी हथेलियों से मलते या रगड़ते हैं. उसके ऐसे करते ही मेरे लंड में जोश भरने लगा.
इस तरह का ‘फुट जॉब’ मैंने कभी किसी पोर्न क्लिप में देखा था, तभी से मेरी तमन्ना थी कि कभी मौका मिला तो ये खेल मैं भी खेल के देखूंगा.
आह… कितना प्यारा नजारा था वो… बहूरानी के गोरे गुलाबी मुलायम पैर जिनमें शादी में जाने हेतु मेहंदी रचाई हुई थी और उनके बीच मेरा काला मोटा लंड. बेहद उत्तेजक दृश्य लग रहा था ऊपर से बहूरानी की सोने की पायलें और बिछिया… इन सबका कलर कम्बिनेशन लाजवाब था. भारत में काफी परिवारों में सोने के जेवर पैरों में नहीं पहनते लेकिन हमारे घर में ऎसी कोई रोक नहीं है.
बहूरानी के कोमल पैरों का स्पर्श मेरे लंड को और कठोर बनाता जा रहा था और अब वह पूरा अकड़ चुका था.
इसी समय ट्रेन की रफ़्तार धीमी पड़ने लगी शायद कोई स्टेशन होगा. मैंने टाइम देखा तो दोपहर के साढ़े तीन होने वाले थे. यह टाइम तो नागपुर पहुँचने का था और जल्दी ही ट्रेन स्लो होती चली गई फिर रुक गई.हां नागपुर ही तो था. पर मुझे क्या. मुझे कौन से नागपुरी संतरे खरीदने थे.
ट्रेन रुकते ही मैंने बहूरानी को थोड़ा सा अपने पास खिसका लिया जिससे मेरे लंड पर उसके पंजों की ग्रिप और मजबूत हो गयी. मेरे पास खिसक आने से बहूरानी की जांघें खुल गयीं थीं और उसकी पैंटी में से चूत की झलक दिखने लगी थी. मैंने अपना एक पैर आगे बढ़ाया और अंगूठे से उसकी पैंटी अलग करके चूत को कुरेदने लगा.
बहूरानी को भी इस खेल में मजा आने लगा तो उसने अपनी पैंटी खुद ही उतार फेंकी और मेरे और नजदीक पैर खोल के बैठ गयी. मैंने अपना लंड फिर से उसके पांवों के तलुओं में दबा लिया और अपने पैर का अंगूठा उसकी चूत में घुसेड़ दिया.
हम दोनों अब पूरी मस्ती में आ चुके थे. बहूरानी अपने पैरों से मेरे लंड की मुठ मार रही थी, बीच बीच में वो मेरे लंड को मथानी की तरह मथने लगती और मैं उसकी चूत में पैर के अंगूठे से कुरेद रहा था. मैं अपने पैर का अंगूठा कभी गोल गोल घुमाता चूत में कभी अप एंड डाउन कभी दायें बायें… उसकी चूत अब खूब रसीली हो उठी थी; मेरा अंगूठा पूरा गीला हो गया था.
मेरी बहूरानी की आँखें वासना से गुलाबी हो गयीं थीं और वो इस खेल को खूब एन्जॉय करने लगीं थी.
तभी ट्रेन ने हॉर्न दिया और धीमे धीमे चलने लगी.नागपुर पीछे छूट चला था पर हम दोनों ससुर बहू अपने केबिन से बाहर की दीन दुनिया से बेख़बर अपनी ही दूसरी दुनिया में खोये हुए मजा कर रहे थे. हम दोनों में से कोई किसी को हाथों से छू नहीं रहा था; बस अपने पैरों से ही एक दूजे को मजे दे रहे थे.
बहूरानी ने अब अपनी कमर हिलानी शुरू कर दी थी, मैं समझ गया कि अब उसकी चूत का बांध टूटने ही वाला है. इधर मेरा लंड भी झड़ने के करीब पहुंच रहा था… और मेरे लंड की नसें फूलने लगीं.और तभी बहूरानी ने इसे महसूस करते हुए लंड को पंजों से मथना शुरू कर दिया.
पंद्रह बीस सेकंड बाद ही मेरे लंड से वीर्य की पिचकारी छूटी और ऊपर वाली बर्थ से जा टकराई… फिर छोटी छोटी पिचकारियाँ किसी फव्वारे की तरह निकलने लगीं और बहूरानी के दोनों पांव मेरे वीर्य से सन गये.इसके साथ ही बहूरानी की कमर जोर से तीन चार बार आगे पीछे हुई और वो भी झड़ गयी और निढाल सी होकर उसकी नंगी पीठ पीछे टिक गयी और वो गहरी गहरी साँसें लेने लगीं.
“उफ्फ पापा जी, इस खेल का भी अपना एक अलग ही मजा है; आज पहली बार जाना! अह… मजा आ गया सच में!” बहूरानी थके थके से स्वर में बोली.“हां बेटा जी, जो काम लंड नहीं कर सकता वो काम उंगली या अंगूठा करता है. लंड तो सिर्फ अन्दर बाहर हो सकता है लेकिन अंगूठा तो हर एंगल से मज़ा दे सकता है.”“हां पापा जी, आप शत प्रतिशत सही कह रहे हैं.”
मैंने नेपकिन से अपना लंड और बहूरानी के पांव अच्छे से पौंछ डाले और फिर बहूरानी ने अपना सलवार कुर्ता पहन लिया, मैंने भी कपड़े पहन लिये.
अब मैंने टाइम देखा तो सवा चार बजने वाले थे. ट्रेन लगातार फुल स्पीड से सीटी बजाती हुई दिल्ली की ओर दौड़ी चली जा रही थी.
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07-26-2019, 02:03 PM,
#50
RE: Bahu ki Chudai बहुरानी की प्रेम कहानी
अभी तक की इस कामवासना से भरपूर बहु की चुदाई कहानी में आपने पढ़ा कि हम ससुर बहू अपने केबिन के बाहर की दुनिया से बेपरवाह अपनी ही दुनिया में खोये हुए सेक्स का मजा कर रहे थे.
अब शाम हो चुकी थी, तभी कूपे के दरवाजे पर किसी ने नॉक किया, मैंने खोल कर देखा था पेंट्री कार का स्टाफ चाय नाश्ता लिए खड़ा था.चाय से निबट के बहूरानी बोली- पापा जी, अब मैं कुछ देर सोना चाहती हूँ.और वो ऊपर की बर्थ पर चली गयी.मैं भी अलसाया सा लेट गया.
जब हम लोग जागे तो चारों ओर अँधेरा घिर चुका था. बहूरानी टॉयलेट जाकर फ्रेश हो आयी फिर उसने अपने उलझे बाल सँवारे और हल्का सा मेकअप किया. इसी बीच मैं भी फ्रेश हो आया; अब कुछ ताजगी महसूस होने लगी थी. फिर हम दोनों कूपे से बाहर निकले और कम्पार्टमेंट के तीन चार चक्कर लगा डाले ताकि टहलना हो जाय और हाथ पैर खुल जायें.
ट्रेन साढ़े नौ के करीब भोपाल जा पहुंची. हम लोगों का डिनर हो चुका था और अब हमारी जर्नी लास्ट लैप में थी. सुबह छह बजे हमें निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन (दिल्ली में कई रेलवे स्टेशनों में से एक) पहुंच जाना था. अब कोई सात आठ घंटे ही हमारे पास थे.
“अदिति बेटा!”“हां जी पापा जी?”“दस बजने वाले हैं सवेरे छह बजे हम दिल्ली पहुंच जायेंगे. बस यही रात है हमारे पास!” मैंने कुछ दुखी होकर कहा.“हां पापा जी, फिर न जाने कब ऐसा मौका मिले!” बहूरानी जी भी कुछ मायूस होकर बोली.“चलो बेटा, बत्ती बुझा दो, फिर सोते हैं!” मैंने अपने सारे कपड़े उतार दिए और लेटते हुए कहा.“ओ के पापा जी!” बहूरानी बोली और फिर लाइट्स ऑफ हो गयीं, कूपे में घुप्प अँधेरा छा गया.
मुझे बहूरानी के कपड़े उतरने की सरसराहट सुनाई दी और फिर उसका नंगा जिस्म मुझसे लिपट गया और उसका एक हाथ मेरे बालों में कंघी करने लगा. मैंने भी उसे अपने से चिपटा लिया और उसके स्तनों से खेलने लगा.बहूरानी मेरी छाती को सहलाने लगी, उसका हाथ मेरे सीने पर पेट पर सब जगह फिरने लगा, फिर उसने मेरी छाती चूमना शुरू कर दी. बार बार लगातार… ऐसा वो पहली बार कर रही थी.
“क्या बात है बहूरानी, आज यूं मेरी छाती ही चूमे जा रही हो; चूमना ही है तो लंड है नीचे की तरफ!” मैंने मजाक किया.“पापा जी, जो बात इस सीने में है वो लंड में कहां!” वो मेरे बायें निप्पल को मसलते हुए बोली.“क्या मतलब? मेरी छाती में कौन से मम्में लगे हैं… हहहहा” मैंने हँसते हुए कहा.“पापा जी, ये राज की बातें हैं. हम लेडीज को पुरुष की चौड़ी छाती ही सबसे ज्यादा अटरेक्ट करती है, आदमी की चौड़ी छाती हमें एक सिक्योर फीलिंग देती है फिर आपके इस चौड़े चकले सीने के तले पिसते हुए आपके लम्बे मोटे लंड की ठोकरें चूत को वो मजा देती हैं कि आत्मा तक तृप्त हो जाती है.”
“अच्छा? अगर चौड़े सीने वाले आदमी का लंड छोटा सा पतला सा हुआ तो?” मैंने हँसते हुए कहा.“पापा जी, वो बाद की बात है. मैंने तो ये कहा कि पहला इम्प्रेशन इस सीने का ही होता है हम लड़कियों पर; मर्द का चौड़ा मजबूत सीना हम फीमेलज़ को सेक्सुअली अपील करता है.” बहूरानी बोली और मेरे ऊपर मेरे सीने पर लेट गयी; उसके मम्में मेरी छाती में पिसने लगे.उधर मेरा लंड चूत में घुसने की आशा में झट से खड़ा हो गया.
फिर बहूरानी ने मुझ पर बैठ के मेरा सुपारा अपनी चूत के छेद पर सेट किया और लंड को दबाने लगी. उसकी गीली रसीली चूत मेरे लंड को कुछ ही पलों में समूचा लील गयी. फिर बहूरानी जी मेरा लंड यूं अपनी चूत में घुसाये हुए मेरे ऊपर शांत लेट गयी. मेरे हाथ उसके नितम्बों पर जा पहुंचे, उसके गोल गोल गुदाज नितम्बों को मुट्ठी में भर भर के मसलने दबाने का मजा ही अलग आया.फिर मेरी कमर धक्के लगाने को उछलने लगी.
“पापा जी, धक्के नहीं लगाओ… बस चुपचाप यूं ही लेटे रहो रात भर!” बहूरानी बोली और मेरा निचला होंठ चूसने लगी.“ठीक है अदिति बेटा… एज यू लाइक!” मैंने कहा और अपना जिस्म ढीला छोड़ दिया.
रात के सन्नाटे को चीरती हुई बंगलौर दिल्ली राजधानी अपने पूरे वेग से आंधी तूफ़ान की तरह अपने गंतव्य की ओर भागी दौड़ी चली जा रही थी. मेरे ऊपर जैसे कोई सुगन्धित रेशम का ढेर हो वैसी ही फीलिंग देता बहूरानी का नंगा जिस्म मुझसे लिपटा हुआ था. उसकी चूत से कल कल बहता रस मेरी जांघों को भिगोने लगा था.
“पापा जी…” बहूरानी मेरे कान में फुसफुसायी.“हां बेटा?”“जब ट्रेन किसी छोटे स्टेशन पर पटरियाँ चेंज करती है तो कितनी मस्त आवाजें आती हैं न…” बहूरानी जी अपनी चूत मेरे लंड पर धीरे से घिसते हुए बोली.“अबकी छोटा स्टेशन आये, तो आप ध्यान से सुनना!” वो फिर बोली.“हां बेटा, इन पटरियों का भी अपना संगीत है.” मैं बोला.
“आधी रात बीतने को थी; कभी कभी विपरीत दिशा से आती कोई ट्रेन हमें क्रॉस करती हुई निकल जाती. बहूरानी से मिलन का ये अलौकिक आनन्द अलग ही अनुभूति दे रहा था. चुदाई और सम्भोग का फर्क अब महसूस होने लगा था. नीरव अन्धकार में संभोगरत दो जिस्म आपस में कम्युनिकेट कर रहे थे जहां शब्दों की आवश्यकता ही नहीं थी. न कुछ देखने की जरूरत थी न कुछ सुनने की… योनि और लिंग के मिलन की वो अलौकिक अनुभूति जिसे शब्दों में बयाँ करना आसान नहीं. चूत में घुस के आनन्द लूटता और लुटाता लंड का आनन्द देखने की चीज नहीं महसूस करने वाली बात है.
तभी किसी छोटे स्टेशन से ट्रेन गुजरने लगी. मेन लाइन से लूप लाइन पर जाती ट्रेन फिर वापिस मेन लाइन पर आती हुई… पटरियों की खटर पटर सच में एक मीठा उन्माद भरा संगीत सुनाने लगी.
“पापा जी… अब आप ऊपर आ जाओ, थक गई मैं तो!” बहूरानी बोली और मेरे ऊपर से हट गयी.मैं भी उठ के अलग हो गया.फिर वो बर्थ पर लेट गयीं.
“बहूरानी बेटा… अपनी चूत खोल न!” मैं उस पर झुकते हुए बोला.“वो तो मैंने पहले ही अपने हाथों से खोल रखी है पूरी… आ जाओ आप जल्दी से!” वो बेचैन स्वर में बोली.
मैं उसके ऊपर झुका और उसने खुद ही मेरा लंड पकड़ कर सही जगह पर रख कर उसे ज़न्नत का रास्ता दिखा दिया. मैंने भी देर न करते हुए लंड से एक करारा शॉट लगा दिया; लंड फचाक से बहूरानी की चूत में जड़ तक समा गया.
बहूरानी ने मुझे अपने आलिंगन में भर कर प्यार से चूमा और अपनी कमर ऊपर तक उठा के मेरे लंड का सत्कार किया- बस पापाजी, ऐसे ही लेटे रहिये मेरे ऊपर चुपचाप!वो बोली और अपने घुटने मोड़ के ऊपर उठा लिए; अब उसकी चूत का खांचा अपने पूरे आकार में आ चुका था; मैंने अपने लंड को और दबाया तो लगभग एक अंगुल के करीब लंड और सरक गया चूत में.यूं लंड घुसाये हुए चुपचाप शांत पड़े रहने का भी एक अलग ही मजा है; जी तो कर रहा था कि ताबड़तोड़ धक्के लगाऊं उसकी चूत में; बहूरानी का दिल भी पक्का कर रहा होगा लंड उसकी चूत में सटासट अन्दर बाहर होने लगे तो उसे चैन आये.
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