College Sex Stories गर्ल्स स्कूल
11-26-2017, 02:03 PM,
#91
RE: College Sex Stories गर्ल्स स्कूल
गर्ल्स स्कूल पार्ट --49

हेलो दोस्तो मैं यानी आपका दोस्त राज शर्मा गर्ल्स स्कूल--49 लेकर हाजिर हूँ

ये सब क्या है स्नेहा? सब इतने खुश हैं, टूर पर जाने को लेकर और तुम यहाँ लेटी हो, अकेली! बात क्या है आख़िर? पता तो चले!" राज ने अंदर जाते ही स्नेहा से कहा..

स्नेहा ने बैठी होकर अपने चेहरे के आँसुओं को हाथ से सॉफ किया," कुच्छ नही.. वो मेरी तबीयत खराब है!"

"ये लो! खुश हो जाओ.. मोहन का फोन आया था.. अभी फिर आएगा.. चलो उठकर मुँह धो लो और बात करके बाहर आ जाओ, हम सभी टूर की प्लॅनिंग कर रहे हैं.. मोहन को बोल देना, वो तुम्हे टूर के बाद ही यहाँ से ले जाए..." राज ने कहा और फोन वहाँ रखकर बाहर चला गया..

मोहन का नाम सुनते ही स्नेहा की आँखों में पल भर के लिए चमक आ गयी, पर जैसे ही उसको वास्तविकता का आभास हुआ वो फिर से मुरझा गयी.. फोन को हाथ में लिए हुए वह बिना पलक झपकाए उसको देखती रही जब तक की उस पर मोहन का फोन नही आ गया.. फोन आते ही उसने झट से कॉल अटेंड करके फोन अपने कान से लगा लिया..

" हेलो!" फोन में से आवाज़ आई...

" आइ लव यू जान!" स्नेहा ने कहा और किसी बच्चे की तरह रोने लगी...

"आइ लव यू टू यार.. पर ये तुम... रो क्यूँ रही हो?" विकी का दिल धड़क रहा था कहीं स्नेहा को सब पता ना चल गया हो; उसके बारे में...

स्नेहा की आँखों से आँसू और आवाज़ में कारून कंपन थमने का नाम नही ले रहे थे," तुम.. तुम मुझे छ्चोड़ कर क्यूँ चले गये.. वि.. मोहन!" स्नेहा ने तो मोहन से प्यार किया था.. विकी तो बस यूँही ही निकलने को हो गया था..

"कहाँ छ्चोड़ गया मैं? एक रात की ही तो बात थी.. अभी तुम्हे लेने आया तो तुम यहाँ मिली नही.. वहाँ कैसे पहुँच गयी तुम..?" विकी स्नेहा के 'छ्चोड़ कर चले जाने' कहने का मतलब नही समझ पाया...

स्नेहा कुच्छ ना बोली.. रह रह कर उसकी लंबी सिसकियाँ विकी को फोन पर सुनाई दे रही थी..

"मैं तुम्हे लेने आ रहा हूँ! तैयार हो जाओ जान.." विकी ने स्नेहा से कहा...

फिर से जवाब के रूप में एक लंबी सिसकी के सिवाय विकी को कुच्छ ना सुनाई दिया.. उसका दिल धक धक करने लगा.. कहीं उसके सारे किए कराए पर पानी तो नही फिर गया है..

" आओगी ना.. मेरे साथ.. ? बहुत प्यार करना है जान.. कल से तुम्हे देखने को दिल मचल रहा है.. जी भरकर प्यार करेंगे.. आओगी ना.. अभी?" विकी ने सेक्स का पासा स्नेहा की और फैंका..

स्नेहा के ज़ज्बात टीस बनकर उसकी छाती में चुभने लगे.. पर वा कुच्छ ना बोली...

"तुम्हे किसी ने बरगालाया तो नही है जान.. मुझ पर विस्वास नही है क्या?" विकी की धड़कने तेज हो गयी थी.. उसकी परेशानी उसके माथे पर छलक आए पसीने से सॉफ झलक रही थी...

" मैं आ रही हूँ..! लेने आ जाओ" और स्नेहा फफक पड़ी.. जाने क्या सोचकर उसने ये फ़ैसला लिया था.........

" आइ लव यू जान...! मैं तुम्हे लेने आ रहा हूँ.. तैयार रहना.. मैं अंदर नही आउन्गा.. तुमसे प्यार करने को बेकरार हूँ.. आ रहा हूँ मैं.." विकी ने फोन रखने के बाद स्नेहा के जवाब का इंतज़ार किया.. पर जवाब में लगातार उसकी सिसकियाँ ही मिल रही थी.. विकी ने फोन काट दिया..

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दोस्तो आइए इधर अपने वासू भाई क्या कर रहे हैं इनकी खबर लिए हुए भी काफ़ी टाइम हो गया है

" जी श्रीमती जी! कहिए; किसलिए याद किया?" वासू ने ऑफीस के अंदर आते ही अंजलि से सवाल किया..

"आईए वासू जी!" अंजलि उसके व्यक्तिताव से इस कदर प्रभावित थी कि उसके ऑफीस में आने पर एक बार अपनी कुर्सी छ्चोड़ कर खड़ी ज़रूर होती थी," बैठिए!"

"जी, धन्यवाद... कहिए?" वासू कुर्सी संभालते हुए बोला...

"दरअसल.. हमने सोचा है कि क्यूँ ना बच्चों को कही घुमा कर ले आया जाए.. फंड का काफ़ी पैसा हमरे पास जमा है.. सोच रही थी.. उसका सदुपयोग ही हो जाए.. आपका क्या विचार है?" अंजलि ने वासू की राई जान'नि चाही..

"पर अगले महीने से तो बच्चों की परीक्षयें आरंभ हो रही हैं.. हम उसके पासचात भी ऐसा कर सकते हैं.. क्षमा करें पर मुझे तो अभी इसका औचित्या समझ में नही आता!" वासू ने दो टुक जवाब दिया..

अंजलि निरुत्तर हो गयी.. उसको ऐसा ही जवाब मिलने का अंदेशा था.. वैसे भी टूर पर स्कूल से एक मेल टीचर का बच्चों के साथ होना ज़रूरी था.. और सुनील निजी काम की वजह से पहले ही साथ जाने में असमर्थता दर्शा चुका था...

"पर 5-7 दिन चलने में हर्ज़ ही क्या है? एग्ज़ॅम वैसे भी सेप्टेंबर लास्ट में हैं.. और उनको हम एक साप्ताह और आगे सरका देंगे.. बोलिए?" अंजलि ने उसको मनाने की कोशिश की..

" आप जो चाहे करें.. आपने मुझसे राई माँगी थी.. सो मैने दे दी.. मुझे आगया दें..मेरी कक्षा का समय निकला जा रहा है" कहकर वासू कुर्सी से उठ गया...

" पर आपको तो साथ चलना पड़ेगा ना.. इसीलिए तो पूच्छ रही हूँ.." अंजलि ने अपना मंतव्या सपस्ट किया...

" क्षमा करें श्रीमती जी! मैं साथ नही दे पाउन्गा आपका.. !" वासू ने दो टुक कहा और हाथ जोड़कर बाहर निकल गया...

"अफ.. क्या किया जाए?" अंजलि ने एक लंबी साँस ली और फोन निकल कर शमशेर के पास मिला लिया...

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"सर.. मुझे ये सूम समझ नही आ रहा!" नीरू नज़रें झुकाए क्लास से बाहर निकल रहे वासू के सामने अपना मत लेकर खड़ी हो गयी...

वासू का तन्हा और बेचैन दिल धड़क उठा.. उस हसीन सुबह के बाद नीरू ने उसके पास आना ही छ्चोड़ दिया था.. स्कूल खुलने के बाद भी वो उस'से कन्नी काटने लगी थी.. वासू भी झिझक के कारण कभी उसको टोक नही पाया था

" श.. ये सवाल.. ये तो बहुत ही आसान है.." बाग बाग हो उठे वासू ने उसके हाथ से किताब लेते हुए कहा.. उसकी तिरछी नज़र ने बस एक बार नीरू की चुननी में छिपि हुई उसकी गोल छातियो के बीच से झलक रही थोड़ी सी मगर कामुक खाई को निहारा," कहाँ समझाउ?"

" जहाँ आपका दिल करे सर.... स्टाफ रूम में....?" नीरू ने अपने हाथों की उंगलियाँ मटका-ते हुए कहा.. बेचैनी में लोग अक्सर ऐसा करते हैं... वासू से नज़रें वो अब भी मिला नही पा रही थी...

"नही नही... मतलब... मेरा ये अभिप्राय नही था.." वासू को लगा जैसे उसकी नज़रों को नीरू ने ताड़ लिया है.. ," आपकी अभ्यास पुस्तिका कहाँ है..? उसी पर तो समझौँगा ना..?"

नीरू लज्जित सी होकर क्लास में गयी.. और अपनी कॉपी उठा लाई.. वासू वहीं खड़े होकर उसको सवाल समझाने लगा..

"सररर..!" नीरू ने नज़रें चुराते हुए वासू को बीच में टोक दिया...

"बोलो!" वासू ने अपनी निस्तूर आवाज़ को आख़िरी हद तक मीठी कर लिया...

" व.. वो.. सर, यहाँ ... शोर बहुत ज़्यादा है.. स्टाफ्फरूम में चलें..!" नीरू ने अटक अटक कर अपनी बात पूरी की... अपने एक पैर से दूसरे पैर को दबाते हुए उसने बस एक बार, एक बार वासू से नज़रें मिलाई...

वासू उसके मंन के भाव-नाओ को ताड़ गया.. कॉपी उसके हाथ में देते हुए बोला," तुम 5 मिनिट के बाद आना!" और स्टाफ रूम की और निकल गया..

अब एक बार फिर हनुमान भक्त का टकराव मेनका से होता देखने को मिलेगा...

" मे आइ कम इन, सर?" नीरू के बदन में वासू को स्टाफ्फरूम में अकेला पाकर झुरजुरी सी दौड़ गयी. वासू के हाथ का नाभि के नीचे वो कामुक स्पर्श अभी तक उसको ज्यों का त्यों महसूस हो रहा था.. मानो कल की ही बात हो..

वासू ने आँखों ही आँखों में उसको अंदर आने का इशारा किया.. नीरू के मनोभावों को ताड़ कर उसके अंग प्रत्यंग में प्रेम रस का संचार होने लगा था..

नीरू अंदर आई और अपनी किताब उठाकर वासू के सामने टेबल पर रख दी.. और खुद वासू की कुर्सी के जितना पास खड़ी हो सकती थी; हो गयी..

"ये लो.. कितना आसान था.. जाने क्यूँ समझ नही पा रही थी.. अब आ गया..?" वासू ने उसके सामने सवाल निकाल कर दिखाने के बाद कहा

नीरू ने वासू की आँखों में आँखें डाली.. जैसे कुच्छ कहा हो.. फिर नज़रें झुका ली.. और वहीं खड़ी रही.. वासू की कोहनी नीरू के घुटनो से कुच्छ उपर उसकी जाँघ को छ्छू रही थी.. उस समय तो नीरू को हल्का सा वो स्पर्श ही जानलेवा प्रतीत हो रहा था..

"और कुच्छ........... समझना है क्या?" वासू उसकी तरफ से पहल का इंतज़ार कर रहा था...

"जी! ..... जी नही!" जब नीरू से कुच्छ बोला ही नही गया तो वा वहाँ रहकर करती भी क्या? हल्का सा झुक कर अपनी किताबें उठाई और चलने लगी.. वासू से रहा ना गया," नी.."

"जी सर..!" नीरू ने अपना नाम भी पूरा ना लेने दिया.. तुरंत पलट गयी.. जैसे उसको पता ही था.. वासू उसको रोकेगा ज़रूर..," जी.. सर!" नीरू ने वापस टेबल के पास आकर किताबें उसस्पर रख दी और दोनो हाथों से टेबल पर लगी सुनमाइका को साइड से खुरचने लगी.. नज़रें झुकाए हुए.. जैसे उसका पता ही था की वासू अब क्या बोलेगा.. खड़ी खड़ी उसके बदन में कंपकपि सी जाग उठी...

"व.. वो.. मैं कह रहा था.. तुम्हारे घर भैंसे हैं क्या?" वासू क्या का क्या बोल गया...

"जी? ..." नीरू ने नज़रें उठाकर वासू के चेहरे को देखा और नज़रें मिलाए बिना ही वापस झुका ली.. कम से कम उसको इतने बेतुके सवाल की उम्मीद नही थी.. इतना रोमांच पैदा होने के बाद...," जी हैं..."

" दूध देती हैं..?" वासू का अगला सूपरहिट सवाल!!!

नीरू ने सकपका कर अपनी चुननी को ठीक किया.. उसके दिमाग़ में जो कुच्छ चल रहा था.. उस'से उसको यही ख़याल आया की उसके ही 'दूध' की बात कर दी वासू ने! और जैसे ही उसको होश आया, उसने खुद को संभाला," जी.. अभी तो नही.."

"हूंम्म.." वासू ने अपना सिर हिलाते कहा.. वासू को समझ ही नही आ रहा था.. आगे क्या बोले? कैसे बोले?..

"सर..?"

"हां?" वासू ने उम्मीद की शायद वही शुरुआत कर दे..

" मैं जाउ? क्लास में?" और वो बेचारी क्या कहती...

"हां.. एक मिनिट!" वासू ने उसको फिर रोक लिया.. इश्स बार उसका हाथ पकड़ कर..

नीरू के सारे शरीर में उत्तेजना की लहर दौड़ गयी... उसने घबराकर वासू की और देखा.. तो वासू ने तुरंत हाथ छ्चोड़ दिया... नीरू तड़प उठी," नही सर.. मैं ऐसा नही कह रही.." नीरू को वासू का यूँ हाथ पकड़ कर छॉड्ना कतई अच्च्छा नही लगा.. उसका हाथ अभी भी वासू की तरफ उठा हुआ था.. जो वासू ने छ्चोड़ दिया था....

" क्या?" वासू की समझ में नही आया.. वो क्या कह रही है.. और क्या नही..

" वो.. सर.. मुझे बुरा नही लगा.. जब आपने हाथ पकड़ा तो.." नीरू का सारा बदन उत्तेजना की गर्त में डूबता जा रहा था.. आख़िरकार उसने कह ही दिया...

वासू ने हाथ बढ़ाकर फिर से उसका हाथ पकड़ लिया.. एक बार दरवाजे की तरफ देखा और दूसरे हाथ से उसकी कलाई को सहलाने लगा.. प्यार से..

नीरू की आँखें बंद हो गयी और वा अपनी कलाई पर प्यार से रेंग रहे वासू के हाथ को अपने हर नग पर महसूस करने की कोशिश करने लगी.. 'वहाँ' गीलेपन का अहसास होते ही उसने अपनी जांघों को एक दूसरी से चिपका लिया.. साँसों की तीव्रता के साथ ही उनमें मादकता भी बढ़ गयी.. जो वासू को सीधे अपने कलेजे में महसूस हो रही थी...

"उस दिन तो बुरा लगा था ना?" वासू ने अपने हाथ की पकड़ उसकी हथेलियों पर मजबूत कर दी...

नीरू ने आँखें बंद किए हुए ही अपना सिर 'ना' में हिला दिया.. उसको समझते देर ना लगी की वासू किस दिन की बात कर रहा है.. उसके तेज़ी से धड़क रहे दिल से सॉफ था की 'उस' दिन जैसा ही कुच्छ वो आज भी चाहती है.. बुल्की उस'से भी ज़्यादा...

" फिर तुम वहाँ से भागी क्यूँ?" वासू का सवाल जायज़ था.. पर वक़्त सही नही था.. ये वक़्त सवाल जवाब का थोड़े ही था.. आगे बढ़ने का था.. पिच्छली ग़लतियों को भूला कर...

"आइन्दा नही भागुंगी सर..." लंबी साँस छ्चोड़ते हुए नीरू खिसक कर वासू की कुर्सी से सटकार खड़ी हो गयी और उसकी तरफ अर्थपूर्ण नज़रों से देखा......

"भाग चलें.. सॉरी.. बाहर चलें.. घूमने के लिए.. 5-7 दिन?" वासू ने उसका दूसरा हाथ भी अपने हाथ में लेकर उसको अपनी तरफ घुमा दिया..

" पर ये कैसे हो सकता है सर.. घर वालों को क्या कहूँगी...?" नीरू ने सवाल किया.. हालाँकि उसकी तरफ से पूरी 'हां' थी...

" स्कूल की तरफ से जायें तो.. और बच्चों के साथ..?" वासू का भी टूर का मूड बन गया था.. नीरू के साथ

नीरू के आनच्छुए यौवन की प्यास हाथों से ना मिट पाने की कसक नीरू की आँखों में सपस्ट दिखाई दी जब उसने वासू से नज़रें चार की," चलूंगी सर.. कब चलना है.?"

वासू का रोम रोम खिल उठा..," मैं लंच के बाद बताता हूँ... अभी तुम जाओ.. कोई आ जाएगा.. " कहकर वासू खड़ा होकर स्टाफ्फरूम से निकल गया...

नीरू तड़प उठी.. टूर तो जब जाएगा तब जाएगा.. अभी क्या करूँ.. उसने अंगड़ाई लेकर जांघों के बीच अपनी पॅंटी को ठीक किया और मुरझाई हुई सी अपनी क्लास में आ गयी...

" स्नेहा! मैं 5 मिनिट में घर के बाहर मिलूँगा.. तुम तैयार हो ना.. जान?" विकी ने स्नेहा को फोन पर कहा...

" हां.. मैं तैयार हूँ.. आ जाओ!" स्नेहा ने खुद को नियती का सामना करने के लिए तैयार कर लिया था.. वैसे भी अब उसके पास उसकी जिंदगी के अलावा खोने को था ही क्या जो वो मना करती.. और उस जिंदगी का भी अब क्या फाय्दा?

वह पहले ही तैयार हो चुकी थी.. वीरू समेत सबको उसने बता दिया था.. वह जा रही है; विकी के साथ..

जैसे ही वह बाहर निकली, राज ने उसको टोका," अभी मत जाओ ना स्नेहा! प्ल्स.. एक हफ्ते की ही तो बात है.. मान भी जाओ!"

" नही भैया.. मुझे जाना पड़ेगा.. विकी.. मोहन को मेरी ज़रूरत है.. मैं नही गयी तो शायद उसका सपना 'सपना' ही रह जाएगा..." अपनी आँखों की नमी को रुमाल से पौंचछते हुए वह बोली...," वीरू कहाँ है?"

"पता नही.. तुम नही मानी तो वो नाराज़ होकर कहीं चला गया.. मैने उसको रोका भी था.. पर वो नही माना.. लंगदाते हुए गया है.. पता नही कहाँ.." राज को लगा अब उसको रोकने का कोई फ़ायडा भी नही.. उसकी गीली आँखों में दृढ़ता सॉफ झलक रही थी.. जाने की.. मोहन के साथ..

"वो कहाँ है?" स्नेहा ने अपने मुरझाए चेहरे पर क्षणिक मुस्कुराहट लाते हुए पूचछा.. राज समझ गया.. वो किसकी बात कर रही है..

"अभी बुलाता हूँ.." राज दूसरे कमरे में गया और लड़कियों में से प्रिया का हाथ पकड़ लाया..

" तुम मान तो रही नही हो.. मेरा तुमसे बात करने का दिल नही करता..." प्रिया ने आते ही अपना मुँह बनाया....

स्नेहा ने उसका हाथ पकड़ लिया.. बरबस ही उसके आँसू छलक उठी..," राज का हाथ मत छ्चोड़ना प्रिया.. पहला प्यार अक्सर खो जाता है.. और फिर आँखें तमाम उम्र भीड़ में उसको खोजती रहती हैं.. (आम आइ राइट?) ...मुसीबतें आएँगी.. पर तुम दोनो मिलकर सामना करना... भगवान सच्चे प्रेम का साथ हमेशा देते हैं.." स्नेहा के लिए कहते हुए अपने आपको संभालना मुश्किल हो गया.. रोते हुए ही उसने बात पूरी की,"... ऐसा सुना है मैने!"

"पर तुम रो क्यूँ रही हो स्नेहा.. सुबह से ही तुम रो रही हो.. बात क्या है..?" प्रिया ने स्नेहा को प्यार का गुरुमन्तरा देते हुए सुबक्ते देख पूछा..

"कुच्छ नही.. इनका क्या है.. ये तो हमेशा साथ देते हैं.. तन्हाई की अग्नि जब तड़प बनकर हमें कचॉटने लगती है तो यही तो ठंडक देते हैं.. आँसू!." स्नेहा ने उन्हे पौचहते हुए कहा..," ध्यान रखना एक दूसरे का.. हर कोई मोहन नही होता.." कहते हुए वह प्रिया के गले लगकर रोने लगी... प्रिया की आँखों से भी आँसू छलक उठे..

" स्नेहा.. हमें तुम्हारे साथ की ज़रूरत पड़ेगी.. मोहन को बोल देना.. हमारी मदद करे.. अब यहाँ हम कब तक रहेंगे..?" प्रिया ने भी उसको अपनी छाती से चिपका लिया..

" तभी बाहर गाड़ी का हॉर्न सुनाई दिया.. स्नेहा बिना किसी और से बात किए जल्दी से बाहर निकल गयी.. बाहर मोहन उसका इंतज़ार कर रहा था.. 'अपना' सपना साकार करने के लिए.... स्नेहा ने गाड़ी की खिड़की खोली और अगली सीट पर जाकर बैठ गयी.. अपने आखरी सफ़र के लिए

"बात क्या है स्नेहा? तुम्हारा मूड ठीक नही लग रहा.. कोई प्राब्लम है क्या?" विकी ने झिझकते हुए स्नेहा से पूछा.. हालाँकि स्नेहा ने उसके पास आने से पहले अपने आपको संभाल लिया था.. और गाड़ी में बैठते ही मुस्कुराकर विकी की और देखा भी था.. पर आज उसकी मुस्कुराहट में वो कशिश नही थी.. वो निरलापन नही था.. और.. फिर चोर की दाढ़ी में तिनका होता ही है.. विकी को शक था ही.. कहीं स्नेहा 'कुच्छ' जान तो नही गयी है..

"नही.. कुच्छ नही.. हम अब कहाँ जा रहे हैं..?" स्नेहा ने बात पलट'ते हुए पूचछा...

" कहाँ जा रहे हैं मतलब? कहीं तो जाएँगे ही.. प्यार नही करना क्या? तुम तो तड़प रही थी मेरे लिए!" विकी ने उसके बालों में हाथ फेरते हुए कहा...

'प्यार करना किसी के हाथ में तो नही होता ना मोहन.. वो तो बस हो जाता है.. जैसे मुझे हो गया.. तुमसे.. वरना किसने सोचा था.... मोहन! तुम्हे मैं प्यारी तो लगती हूँ ना...?" स्नेहा ने विकी से पूचछा..

"ययए तुम आज कैसी बातें कर रही हो.. क्या हो गया है तुम्हे?" विकी के अंतर्मन ने उसको धिक्कारा और उसने स्नेहा के हाथों में लहरा रहा अपना हाथ वापस खींच लिया...

"कुच्छ नही.. आज मम्मी की बड़ी याद आ रही है.. !" स्नेहा रेकॉर्डिंग को याद करते ही भावनाओ में बहकर बिलख पड़ी.. विकी से रहा ना गया.. उसने गाड़ी साइड में लगाकर स्नेहा का चेहरा अपने हाथों में ले लिया.. स्नेहा का एक एक आँसू लावे की तरह उसके दिल पर टपक रहा था.. बड़ी मुश्किल स्थिति थी.. विकी के लिए," क्या बात है.. तुम आज... तुम तो कह रही थी.. तुमने मम्मी को कभी देखा ही नही.. फिर आज यूँ अचानक मम्मी कैसे याद आ गयी.....?"

" हां.. देखा नही है कभी.. पर आज महसूस हो रहा है.. वो भी कितनी बेबस रही होंगी.. कितनी तदपि होंगी वो.. ये कब तक चलेगा विकी.. नारी कब तक पुरुष के जुल्मों का शिकार होती रहेगी.. कब तक पुरुष उसको अपनी हसरातों और सपनो को पूरा करने का 'साधन' मानता रहेगा.. अर्धांगिनी होने का हक़ क्या हमें कभी नही मिल पाएगा? हम क्या ऐसे ही दुनिया में आती हैं.. नंगी करके जंगली कुत्तों के सामने डालने के लिए..?" स्नेहा को 'वो' बातें लगातार घुटन बनकर उसको खाए जा रही थी... आख़िर उसने निकाल ही दी.. विकी को विकी कहकर उसने विकी को हक्का बक्का कर दिया.. आख़िर उसको भी हक़ था.. जाने से पहले जान'ने का.. की उसके साथ ऐसा क्यूँ हुआ.. यही उसकी आख़िरी इच्च्छा थी...

विकी को जैसे साँप सूंघ गया.. पूरी तीव्रता दिखाते हुए उसने गाड़ी को लॉक कर दिया.. ताकि स्नेहा वहाँ से बचकर भाग ना सके..

" मुझे भागना होता तो मैं तुम्हारे साथ आती ही क्यूँ?" स्नेहा के चेहरे पर अब सुकून झलक रहा था... विकी को ये बताकर की वो उसकी फ़ितरत जान चुकी है..

" हूंम्म्म.. तो तुम्हे सब कुच्छ पता लग गया.." विकी ने लंबी साँस छ्चोड़ते हुए कहा...

"नही.. सब कुच्छ कहाँ पता लगा.. मुझे अभी तक ये पता नही लगा है कि मैं तुम्हे पहचान क्यूँ नही पाई.. तुम्हारी आँखों में छिपि वासना को मैं प्यार कैसे समझ बैठी.. और ये भी मैं कभी नही जान पाउन्गि कि सब कुच्छ जान लेने के बाद भी तुम्हारे पास क्यूँ चली आई... मरने के लिए..!" स्नेहा ने विकी को झकझोर कर रख दिया...

" देखो स्नेहा.. इसके लिए मैं ज़िम्मेदार नही हूं.. अपने ये सारे सवाल अपने बाप से करना.. जिसने अपनी बीवी के साथ ऐसा किया.. और अब तुम्हारे साथ करने की सोच रहा है...! मैने तुमसे कभी प्यार किया ही नही.. मैं प्यार व्यार को नही मानता.. मेरा लक्ष्या मल्टिपलेक्स हासिल करना था.. और वो तुम्हे उनको सॉन्प देने के बाद ही पूरा हो सकता है..." विकी ने खुद को ग्लानि से बचाने की कोशिश की...

" ठीक ही तो है.. जब वो ऐसा कर सकते हैं तो तुमसे क्या उम्मीद करूँ..? हो तो तुम भी मर्द ही आख़िर... मेरी एक आख़िरी इच्च्छा पूरी करोगे विकी...?" स्नेहा ने उसकी आँखों में आँखें डाल कर कहा...

" बोलो!" विकी ने स्टियरिंग पर सिर रख लिया.. वो स्नेहा से नज़रें मिलाते हुए क़तरा रहा था...

स्नेहा की आँखों से जैसे सूखे हुए आँसुओं की धारा बह निकली...," पता है विकी.. जब मैं तुम्हे मोहन समझती थी.. अपना मोहन मानती थी..," स्नेहा सुबकने लगी.. पर उसने बोलना जारी रखा," तब मैने... एक सपना देखा था.. हर लड़की की तरह लाल जोड़े में लिपटी हुई.... सुहाग की सेज़ पर तुम्हारा इंतजार करने का.. हमेशा के लिए तुम्हारी हो जाने का.. तुम्हारे लिए खाना बनाने का.. तुमसे रूठने का.. तुम्हे मना'ने का.. हमारे बच्चे को जनम देने का.. उसको दुलार कर रखने का.. तुम्हारे गुस्से से उसको बचाकर अपने आँचल में लपेट कर छुपा लेने का.. और.. उसको.. कभी मेरी तरह अकेला नही होने देने का.. उसको कभी हॉस्टिल ना भेजने का....." कहते हुए स्नेहा बिलख बिलख कर रोने लगी.. विकी जैसा निस्थुर भी उसकी बातें सुनकर अंदर तक हिल गया..," संभलो स्नेहा खुद को.. मैं कोशिश करूँगा तुम्हारे साथ ऐसा ना हो.. मल्टिपलेक्स मिल जाने के बाद में तुम्हे बचाने की कोशिश करूँगा.. वैसे भी तुम्हारे बाप ने कहा था.. कि उसके बाहर आने से पहले तुम्हारे साथ कुच्छ ना करें.. मैं वादा नही करता.. पर कोशिश ज़रूर करूँगा.. तुम्हे बचाने की.."

"क्यूँ कोशिश करोगे तुम.. क्यूँ...? ताकि फिर से किसी स्वार्थ के लिए मेरा इस्तेमाल कर सको.. ना.. मुझे बचाने की कोशिश मत करना.. मैं तो पहले ही मर चुकी हूँ.. मुझे बार बार मरने के लिए मत छ्चोड़ो प्लीज़.." स्नेहा ने विकी के सामने हाथ जोड़ लिए.....

विकी के पास कोई जवाब नही था.. स्नेहा के किसी सवाल का.. अचानक विकी का फोन बाज उठा.. बांके का फोन था," हां.. मैं आ रहा हूँ.. आधा घंटा लगेगा.." कहकर विकी ने फोन काटा और गाड़ी स्टार्ट करके चल दिया.......

साधू सा आलाप कर लेता हूँ ,

मंदिर जाकर जाप भी कर लेता हूँ ..

मानव से देव ना बन जाऊं कहीं,,,,

बस यही सोचकर थोडा सा पाप भी कर लेता हूँ

आपका दोस्त

राज शर्मा

(¨`·.·´¨) ऑल्वेज़

`·.¸(¨`·.·´¨) कीप लविंग &

(¨`·.·´¨)¸.·´ कीप स्माइलिंग !

`·.¸.·´ -- राज

girls school--49

hello dosto main yaani aapka dost raj sharma girls school--49 lekar haajir hun

Ye sab kya hai Sneha? Sab itne khush hain, tour par jane ko lekar aur tum yahan leti ho, Akeli! baat kya hai aakhir? pata toh chale!" Raj ne andar jate hi Sneha se kaha..

Sneha ne baithi hokar apne chehre ke aansuon ko hath se saaf kiya," kuchh nahi.. wo meri tabiyat kharaab hai!"

"ye lo! khush ho jao.. Mohan ka fone aaya tha.. abhi fir aayega.. chalo uthkar munh dho lo aur baat karke bahar aa jao, hum sabhi tour ki planning kar rahe hain.. Mohan ko bol dena, wo tumhe tour ke baad hi yahan se le jaye..." Raj ne kaha aur Fone wahan rakhkar bahar chala gaya..

Mohan ka naam sunte hi Sneha ki aankhon mein pal bhar ke liye chamak aa gayi, par jaise hi usko vastavikta ka aabhas hua wo fir se murjha gayi.. fone ko hath mein liye huye wah bina palak jhapakaye usko dekhti Rahi jab tak ki uss par Mohan ka fone nahi aa gaya.. fone aate hi usne jhat se call attend karke fone apne kaan se laga liya..

" Hello!" fone mein se aawaj aayi...

" I love you jaan!" Sneha ne kaha aur kisi bachche ki tarah rone lagi...

"I love you too yaar.. par ye tum... ro kyun rahi ho?" Vicky ka dil dhadak raha tha kahin Sneha ko sab pata na chal gaya ho; uske baare mein...

Sneha ki aankhon se aansoo aur aawaj mein karun kampan thamne ka naam nahi le rahe the," tum.. tum mujhe chhod kar kyun chale gaye.. Vi.. Mohan!" Sneha ne toh Mohan se pyar kiya tha.. vicky toh bus yunhi hi nikalne ko ho gaya tha..

"kahan chhod gaya main? ek raat ki hi toh baat thi.. abhi tumhe lene aaya toh tum yahan mili nahi.. wahan kaise pahunch gayi tum..?" Vicky Sneha ke 'chhod kar chale jane' kahne ka matlab nahi samajh paya...

Sneha kuchh na boli.. Rah rah kar uski lambi siskiyan Vicky ko fone par sunayi de rahi thi..

"main tumhe lene aa raha hoon! taiyaar ho jao jaan.." vicky ne sneha se kaha...

fir se jawaab ke roop mein ek lumbi siski ke siway vicky ko kuchh na sunayi diya.. uska dil dhak dhak karne laga.. kahin uske sare kiye karaye par pani toh nahi fir gaya hai..

" aaogi na.. mere sath.. ? bahut pyar karna hai jaan.. kal se tumhe dekhne ko dil machal raha hai.. ji bharkar pyar karenge.. aaogi na.. abhi?" Vicky ne Sex ka paasa Sneha ki aur fainaka..

Sneha ke jajbaat tees bankar uski chhati mein chubhne lagey.. par wah kuchh na boli...

"tumhe kisi ne bargalaya toh nahi hai jaan.. mujh par visvas nahi hai kya?" Vicky ki dhadkane tej ho gayi thi.. Uski pareshani uske maathe par chhalak aaye pasine se saaf jhalak rahi thi...

" main aa rahi hoon..! lene aa jao" aur Sneha fafak padi.. jane kya sochkar usne ye faisla liya tha.........

" I love you jaan...! Main tumhe lene aa raha hoon.. taiyaar rahna.. main andar nahi aaunga.. tumse pyar karne ko bekaraar hoon.. aa raha hoon main.." Vicky ne fone rakhne ke baad Sneha ke jawaab ka intzaar kiya.. par jawaab mein lagataar uski siskiyan hi mil rahi thi.. Vicky ne fone kaat diya..

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" Ji Shrimati ji! kahiye; kisliye yaad kiya?" Vasu ne office ke andar aate hi Anjali se sawaal kiya..

"aaiiye Vasu ji!" Anjali uske vyaktitav se iss kadar prabhavit thi ki uske office mein aane par ek baar apni kursi chhod kar khadi jaroor hoti thi," Baithiye!"

"ji, dhanyawad... kahiye?" Vasu kursi sambhalte huye bola...

"Darasal.. hamne socha hai ki kyun na bachchon ko kahi ghuma kar le aaya jaye.. PTA fund ka kafi paisa hamre paas jama hai.. soch rahi thi.. uska sadupyog hi ho jaye.. aapka kya vichar hai?" Anjali ne vasu ki rai jaan'ni chahi..

"par agle mahine se toh bachchon ki pareekshayein aarambh ho rahi hain.. hum uske paschat bhi aisa kar sakte hain.. kshama karein par mujhe toh abhi iska auchitya samajh mein nahi aata!" Vasu ne do took jawaab diya..

Anjali niruttar ho gayi.. usko aisa hi jawaab milne ka andesha tha.. waise bhi tour par school se ek male teacher ka bachchon ke sath hona jaroori tha.. aur Sunil niji karno se pahle hi sath jaane mein asamarthta darsha chuka tha...

"par 5-7 din chalne mein harz hi kya hai? exam waise bhi september last mein hain.. aur unko hum ek saptaah aur aage sarka denge.. boliye?" Anjali ne usko manane ki koshish ki..

" aap jo chahe karein.. aapne mujhse rai maangi thi.. so maine de di.. mujhe aagya dein..meri kaksha ka samay nikla ja raha hai" kahkar Vasu kursi se uth gaya...

" par aapko toh sath chalna padega na.. isiliye toh poochh rahi hoon.." Anjali ne apna mantvya sapast kiya...

" kshma karein shrimati ji! main sath nahi de paaunga aapka.. !" Vasu ne do took kaha aur hath jodkar bahar nikal gaya...

"uff.. kya kiya jaye?" Anjali ne ek lumbi saans li aur fone nikal kar shamsher ke paas mila liya...

------------------------------

"Sir.. mujhe ye sum samajh nahi aa raha!" Neeru najrein jhukaye class se bahar nikal rahe Vasu ke saamne apna math lekar khadi ho gayi...

Vasu ka tanha aur bechain dil dhadak utha.. uss haseen subah ke baad Neeru ne uske paas aana hi chhod diya tha.. School khulne ke baad bhi wo uss'se kanni kaatne lagi thi.. Vasu bhi jhijhak ke karan kabhi usko tok nahi paya tha

" ohh.. ye sawaal.. ye toh bahut hi aasan hai.." baag baag ho uthe Vasu ne uske hath se kitab lete huye kaha.. uski tirchi najar ne bus ek baar Neeru ki chunni mein chhipi huyi uski gol chhatiyon ke beech se jhalak rahi thodi si magar kamuk khayi ko nihara," kahan samajhaaun?"

" jahan aapka dil kare sir.... Staff room mein....?" Neeru ne apne hathon ki ungaliyan matkate huye kaha.. bechaini mein log aksar aisa karte hain... Vasu se najrein wo ab bhi mila nahi pa rahi thi...

"nahi nahi... matlab... mera ye abhipray nahi tha.." Vasu ko laga jaise uski najron ko Neeru ne taad liya hai.. ," aapki abhyas pustika kahan hai..? usi par toh samjhaunga na..?"

Neeru lajjit si hokar class mein gayi.. aur apni copy utha layi.. Vasu wahin khade hokar usko sawaal samjhane laga..

"Sirrr..!" Neeru ne najrein churate huye Vasu ko beech mein tok diya...

"bolo!" Vasu ne apni nisthur aawaj ko aakhiri had tak meethi kar liya...

" w.. wo.. sir, yahan ... shor bahut jyada hai.. Staffroom mein chalein..!" Neeru ne atak atak kar apni baat poori ki... apne ek pair se dusre pair ko dabate huye usne bus ek baar, ek baar Vasu se najrein milayi...

Vasu uske mann ke bhanvo ko taad gaya.. copy uske hath mein dete huye bola," tum 5 minute ke baad aana!" aur staff room ki aur nikal gaya..

" Ji Shrimati ji! kahiye; kisliye yaad kiya?" Vasu ne office ke andar aate hi Anjali se sawaal kiya..

"aaiiye Vasu ji!" Anjali uske vyaktitav se iss kadar prabhavit thi ki uske office mein aane par ek baar apni kursi chhod kar khadi jaroor hoti thi," Baithiye!"

"ji, dhanyawad... kahiye?" Vasu kursi sambhalte huye bola...

"Darasal.. hamne socha hai ki kyun na bachchon ko kahi ghuma kar le aaya jaye.. PTA fund ka kafi paisa hamre paas jama hai.. soch rahi thi.. uska sadupyog hi ho jaye.. aapka kya vichar hai?" Anjali ne vasu ki rai jaan'ni chahi..

"par agle mahine se toh bachchon ki pareekshayein aarambh ho rahi hain.. hum uske paschat bhi aisa kar sakte hain.. kshama karein par mujhe toh abhi iska auchitya samajh mein nahi aata!" Vasu ne do took jawaab diya..

Anjali niruttar ho gayi.. usko aisa hi jawaab milne ka andesha tha.. waise bhi tour par school se ek male teacher ka bachchon ke sath hona jaroori tha.. aur Sunil niji karno se pahle hi sath jaane mein asamarthta darsha chuka tha...

"par 5-7 din chalne mein harz hi kya hai? exam waise bhi september last mein hain.. aur unko hum ek saptaah aur aage sarka denge.. boliye?" Anjali ne usko manane ki koshish ki..

" aap jo chahe karein.. aapne mujhse rai maangi thi.. so maine de di.. mujhe aagya dein..meri kaksha ka samay nikla ja raha hai" kahkar Vasu kursi se uth gaya...

" par aapko toh sath chalna padega na.. isiliye toh poochh rahi hoon.." Anjali ne apna mantvya sapast kiya...

" kshma karein shrimati ji! main sath nahi de paaunga aapka.. !" Vasu ne do took kaha aur hath jodkar bahar nikal gaya...

"uff.. kya kiya jaye?" Anjali ne ek lumbi saans li aur fone nikal kar shamsher ke paas mila liya...

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"Sir.. mujhe ye sum samajh nahi aa raha!" Neeru najrein jhukaye class se bahar nikal rahe Vasu ke saamne apna math lekar khadi ho gayi...

Vasu ka tanha aur bechain dil dhadak utha.. uss haseen subah ke baad Neeru ne uske paas aana hi chhod diya tha.. School khulne ke baad bhi wo uss'se kanni kaatne lagi thi.. Vasu bhi jhijhak ke karan kabhi usko tok nahi paya tha

" ohh.. ye sawaal.. ye toh bahut hi aasan hai.." baag baag ho uthe Vasu ne uske hath se kitab lete huye kaha.. uski tirchi najar ne bus ek baar Neeru ki chunni mein chhipi huyi uski gol chhatiyon ke beech se jhalak rahi thodi si magar kamuk khayi ko nihara," kahan samajhaaun?"

" jahan aapka dil kare sir.... Staff room mein....?" Neeru ne apne hathon ki ungaliyan matkate huye kaha.. bechaini mein log aksar aisa karte hain... Vasu se najrein wo ab bhi mila nahi pa rahi thi...

"nahi nahi... matlab... mera ye abhipray nahi tha.." Vasu ko laga jaise uski najron ko Neeru ne taad liya hai.. ," aapki abhyas pustika kahan hai..? usi par toh samjhaunga na..?"

Neeru lajjit si hokar class mein gayi.. aur apni copy utha layi.. Vasu wahin khade hokar usko sawaal samjhane laga..

"Sirrr..!" Neeru ne najrein churate huye Vasu ko beech mein tok diya...

"bolo!" Vasu ne apni nisthur aawaj ko aakhiri had tak meethi kar liya...

" w.. wo.. sir, yahan ... shor bahut jyada hai.. Staffroom mein chalein..!" Neeru ne atak atak kar apni baat poori ki... apne ek pair se dusre pair ko dabate huye usne bus ek baar, ek baar Vasu se najrein milayi...

Vasu uske mann ke bhanvo ko taad gaya.. copy uske hath mein dete huye bola," tum 5 minute ke baad aana!" aur staff room ki aur nikal gaya..[/quote]

thank god

vasu laut k to aaya...xb par na sahi gs me hi sahi aaya to

ab ek bar fir hanuman vakt ka takrav menka se hota dekhne ko milega...

" May I come in, Sir?" Neeru ke badan mein Vasu ko Staffroom mein akela pakar jhurjhuri si doud gayi. Vasu ke hath ka nabhi ke neeche wo kamuk sparsh abhi tak usko jyon ka tyon mahsoos ho raha tha.. mano kal ki hi baat ho..

Vasu ne aankhon hi aankhon mein usko andar aane ka ishara kiya.. Neeru ke Manobhavon ko taad kar uske ang pratyang mein prem ras ka sanchar hone laga tha..

Neeru andar aayi aur apni kitab uthakar Vasu ke saamne table par rakh di.. aur khud vasu ki kursi ke jitna paas khadi ho sakti thi; ho gayi..

"ye lo.. kitna aasan tha.. jaane kyun samajh nahi pa rahi thi.. ab aa gaya..?" Vasu ne uske saamne sawal nikal kar dikhane ke baad kaha

Neeru ne Vasu ki aankhon mein Aankhein Dali.. jaise kuchh kaha ho.. fir najrein jhuka li.. aur wahin khadi rahi.. Vasu ki kohni Neeru ke ghutno se kuchh upar uski jaangh ko chhoo rahi thi.. uss samay toh Neeru ko hulka sa wo sparsh hi jaanleva prateet ho raha tha..

"aur kuchh........... samajhna hai kya?" Vasu uski taraf se pahal ka intzaar kar raha tha...

"Ji! ..... Ji nahi!" Jab neeru se kuchh bola hi nahi gaya toh wah wahan rahkar karti bhi kya? hulak sa jhuk kar apni kitabein uthai aur chalne lagi.. Vasu se raha na gaya," Nee.."

"Ji Sir..!" Neeru ne apna naam bhi poora na lene diya.. turant palat gayi.. jaise usko pata hi tha.. Vasu usko rokega jaroor..," Ji.. Sir!" Neeru ne wapas table ke paas aakar kitabein usspar rakh di aur dono hathon se table par lagi sunmayika ko side se khurachane lagi.. najrein jhukaye huye.. jaise uska pata hi tha ki Vasu ab kya bolega.. khadi khadi uske badan mein kanpkapi si jaag uthi...

"w.. wo.. main kah raha tha.. tumhare ghar bhainse hain kya?" vasu kya ka kya bol gaya...

"Ji? ..." Neeru ne najrein uthakar Vasu ke chehre ko dekha aur najrein milaye bina hi wapas jhuka li.. kum se kum usko itne betuke sawaal ki ummeed nahi thi.. itna romanch paida hone ke baad...," Ji hain..."

" Doodh deti hain..?" Vasu ka agla superhit sawaal!!!

Neeru ne sakpaka kar apni chunni ko theek kiya.. uske dimag mein jo kuchh chal raha tha.. uss'se usko yahi khayal aaya ki uske hi 'doodh' ki baat kar di Vasu ne! aur jaise hi usko hosh aaya, usne khud ko sambhala," Ji.. abhi toh nahi.."

"hummm.." Vasu ne apna sir hilatehuye kaha.. vasu ko samajh hi nahi aa raha tha.. aage kya bole? kaise bole?..

"Sir..?"

"haan?" Vasu ne ummeed ki shayad wahi shuruat kar de..

" main jaaun? Class mein?" aur wo bechari kya kahti...

"haan.. ek minute!" Vasu ne usko fir rok liya.. iss baar uska hath pakad kar..

Neeru ke Sare shreer mein uttejna ki lehar doud gayi... usne ghabrakar Vasu ki aur dekha.. toh Vasu ne turant hath chhod diya... Neeru tadap uthi," Nahi Sir.. main aisa nahi kah rahi.." Neeru ko Vasu ka yun hath pakad kar chhodna katai achchha nahi laga.. uska hath abhi bhi vasu ki taraf utha hua tha.. jo vasu ne chhod diya tha....

" kya?" Vasu ki samajh mein nahi aaya.. wo kya kah rahi hai.. aur kya nahi..

" wo.. Sir.. mujhe bura nahi laga.. jab aapne hath pakda toh.." Neeru ka sara badan uttejna ki gart mein doobta ja raha tha.. aakhirkar usne kah hi diya...

Vasu ne hath badhakar fir se uska hath pakad liya.. ek baar darwaje ki taraf dekha aur dusre hath se uski kalayi ko sahlane laga.. pyar se..

Neeru ki aankhein band ho gayi aur wah apni kalayi par pyar se reng rahe vasu ke hath ko apne har nag par mahsoos karne ki koshish karne lagi.. 'wahan' geelepan ka ahsaas hote hi usne apni jaanghon ko ek dusri se chipka liya.. saanson ki teevrata ke sath hi unmein madakta bhi badh gayi.. jo Vasu ko seedhe apne kaleje mein mahsoos ho rahi thi...

[color=#8000bf][size=large]"uss din toh bura laga tha na?" Vasu ne apne hath ki pakad uski hath
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Reply
11-26-2017, 02:03 PM,
#92
RE: College Sex Stories गर्ल्स स्कूल
गर्ल्स स्कूल पार्ट --50

हेलो दोस्तो गर्ल्स स्कूल का पार्ट 50लेकर आपके लिए हाजिर हूँ

लंच में अंजलि ने आते ही लड़कियों से पूचछा," स्नेहा कहाँ गयी.. उसका मूड ठीक हुआ की नही..?"

"वो तो चली भी गयी मम्मी! मोहन आया था उसको लेने.." गौरी ने खड़ी होते हुए कहा.. सबको डर था.. अब टूर शायद मुश्किल है.. सभी के मुँह पिचके हुए थे.. खास तौर से प्रिया और रिया के.. उन्हे वहाँ से जाना पॅड गया तो..

"क्याअ??? ओह माइ गॉड! मुझे स्कूल नही जाना चाहिए था.. अब मैं क्या करूँ..?" बड़बड़ाते हुए अंजलि ने फोन निकाल लिया और शमशेर के पास फोन मिलाया

"हां.. अंजलि.. मैं शाम तक पहुँच जवँगा.. टूर की तैयारी कर ली है ना?" शमशेर ने फोन उठाते ही कहा...

"ववो.. स्नेहा चली गयी.. विकी के साथ.." अंजलि ने उसकी बात पर ध्यान ना देते हुए कहा..

"व्त??? उसको पता नही था क्या..? उसको बताया नही था क्या? ये क्या हो गया..?" शमशेर विचलित सा हो गया...

"मुझे नही पता.. मेरे ख़याल से पता चल गया था उसको.. सुबह से रो रही थी..."

शमशेर ने बिना एक पल भी गँवाए टफ के पास फोन लगाया," स्नेहा चली गयी.. विकी के साथ.. तुमने उसको बताया क्यूँ नही..?"

"क्या???" लगभग वैसा ही धक्का टफ को भी लगा," पर मैने तो उसको रेकॉर्डिंग तक सुना दी थी.. फिर वो गयी क्यूँ?"

" अब ये बात सोचने का वक़्त नही है.. हमें जल्दी ही कुच्छ करना पड़ेगा...!" शमशेर की तरफ से आवाज़ आई...

" पर चिंता करने की बात नही है भाई.. मुरारी ने अपने लोगों को उसके बाहर आने तक उसको कुच्छ नही करने को कहा है.. मैं संभाल लूँगा.. साला मुरारी तो अपने पास ही है ना.. मैं संभाल लूँगा... पर विकी ने ये ठीक नही किया भाई.. वो तो पागल हो गया है.. वैसे मुरारी ने जो लोकेशन डील के लिए तय की है.. मैं वहाँ पोलीस भेज देता हूँ.. खुद भी चला जाउन्गा.. रेकॉर्डिंग में मुरारी ने खोल कर बताया था.. मैं निकल रहा हूँ.." कहकर टफ ने फोन काटा और जल्दी से बाहर निकल गया.....

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लंच के बाद मायूस अंजलि जब ऑफीस लौटी तो वासू पहले से ही उसका इंतज़ार कर रहा था..

"श्रीमती जी.. मैने आपकी सलाह पर विचार किया था.. बुरा नही है.. मैं साथ चलने को तैयार हूँ.. कहिए कब का कार्यक्रम रखें..?"

" नही वासू जी.. मैने भी आपकी बात पर गौर फरमाया था.. आप सही कह रहे थे.. इस वक़्त टूर पर जाना ठीक नही.. मैने प्रोग्राम कॅन्सल कर दिया है.." अंजलि ने कुर्सी पर बैठते ही अपना माथा पकड़ लिया....

"परंतु ये तो कोई बात नही हुई.. मैने लाख सोचने के बाद अपना मॅन बनाया.. और अब जबकि मैं जाने का इच्च्छुक हूँ तो आप मना कर रही हैं.. आपको चलना चाहिए.. और नही तो आप बच्चों से ही पूच्छ कर देख लो.. मैने भी एक आध लड़की से इस बारे में विचार किया था.. वो चलने को तैयार हैं.. आप कहें तो मैं बच्चों से पर्चियाँ डलवा लेता हूँ.. जैसा बहुमत कहे.. बोलिए?" बेचारे वासू पर तो गाज़ सी गिर पड़ी टूर कॅन्सल होने की बात सुनते ही... जाने कितने अरमान सॅंजो लिए थे उसने घंटे भर में ही....

"देखिए वासू जी.. टूर मुमकिन नही है.. आप समझने की कोशिश करें... और मेरे सिर में दर्द है.. आप कृपया मुझे अकेला छ्चोड़ दें..." अंजलि तुनक सी पड़ी थी...

वासू बिना कुच्छ बोले मुँह फुलाकर वहाँ से निकल गया.. उसने क्लास नही ली.. जाते हुए उसने छ्होटी क्लास की एक लड़की को बुलाया और उसको नीरू को मेथ की किताब लेकर स्टाफ्फरूम में भेज देने को बोल कर खुद वहीं चला गया...

"जी सर.. आपने बुलाया?" कहते हुए नीरू सीधी स्टॅफरुम में घुस गयी.. उसने अंदर आने की इजाज़त तक नही माँगी.. वो खिली हुई थी.. जाते ही उसने अपनी मेथ की किताब को टेबल पर पटका और वासू की और मुँह करके खड़ी हो गयी...," मैने पूच्छ लिया है सर.. घरवालों से.. मैं भी चलूंगी टूर पर... "

वासू बेचैनी से खड़ा होकर इधर उधर टहलने लगा," साली सारी दुनिया प्रेम की दुश्मन है..! लोग जोड़ियाँ बनते देख ही नही सकते.. सबको अपनी अपनी पड़ी है.. बताओ.. अगर चल पड़ते तो कौनसा पहाड़ टूट पड़ना था.... ?" वासू बड़बड़ा रहा था.. नीरू को बस एक ही बात ढंग से सुनाई दी.. ' सारी दुनिया प्रेम की दुश्मन है'

"क्या सर?" नीरू ने हिचकिचाते हुए पूचछा..

" अरे क्या क्या?" वासू ने नीरू के पास आकर उसको कंधों पर से पकड़ लिया.. उसका गुस्सा उसकी पकड़ की मजबूती में झलक रहा था.. नीरू अंदर तक हिल गयी.. नीचे तक.. वासू ने आवेश में बकना जारी रखा," वो क्या समझते हैं..? अगर हम घूमने नही गये तो क्या हम प्यार करना छ्चोड़ देंगे.. क्या हम यहाँ प्यार नही कर सकते.. नही नही.. ये तो विद्यालय है.." वासू ने अपने हाथ हटा लिए," क्या तुम मेरे पास घर नही आ सकती.. क्या मैं चोरी छिपे रात को दीवारें कूद कर तुम्हारे घर नही आ सकता.. क्या हमारा प्यार इतना कमजोर है कि...."

वासू जाने क्या क्या बक रहा था.. मानो भंग खा रखी हो.. नीरू हैरान थी.. अभी तक जो उस'से बात करते हुए हिचकिचा रहा था.. अब दीवारें कूदने की बात कर रहा है.. जाने कितने रंग थे उसके वासू के.. वो तो आज तक उसको समझ ही नही पाई थी...

पर वो मन ही मन खिल उठी थी.. जो वो बोल देना चाहती थी.. उसकी ज़रूरत ही ना पड़ी.. सब कुच्छ अकेले वासू ने ही बोल दिया

"तो क्या सर.. हम टूर पर नही जा रहे..?" नीरू ने लगातार अनाप शनाप बोल रहे वासू को खुद बोलकर चुप किया...

" नही.. पर तुम चिंता मत करो.. मैं तुम्हारे घर आउन्गा.. आज रात को.. आ जाउ ना?"

नीरू से कोई जवाब देते ही ना बना.. वह शर्मा गयी.. किताबें उठाई और बाहर भाग गयी.. पर जवाब तो वासू को मिल ही गया था.. उसकी मुस्कुराहट में!

विकी चुपचाप स्नेहा को लेकर अपनी मंज़िल की और चलता जा रहा था.. उसका मन उसको कचोट रहा था.. क्या वह सही कर रहा है? हां भी और नही भी.. उसके अंतर्मन में विरोधाभास गूँज रहा था.. विकी के पास सब कुच्छ था.. पर वो मंज़िल पर पहुँच कर सुसताने वालों में से नही था.. उसका लक्ष्या और आगे.. फिर और आगे बढ़ते जाना था.. जानकारों की राइ में मल्टिपलेक्स रुपायों की ख़ान था.. कहने को नेट इनकम सिर्फ़ 2 से 2.5 लाख रुपए महीना पर वास्तविकता इस-से काफ़ी अलग थी.. पहले जब कसीनो पर बॅन नही था तो उसका मालिक शहर का सबसे बड़ा अमीर था.. कारण अंडरग्राउंग फ्लोर पर कसीनो की आड़ में होने वाले हर तरह के धंधे.. करोड़ों रुपायों की पैदावार हर महीने उस 100क्ष100 की छ्होटी सी जगह से होती थी... पर पिच्छली सरकार ने सब कुच्छ बंद करवा दिया और मल्टिपलेक्स का मलिक भारी दबाव में आ गया.. पर अब.. अब अंदर की खबर ये थी की अगली सरकार आते ही उसको फिर से चालू करने जा रही है.. और यही कारण था की मुरारी और विकी में उसको लेकर तलवारें खींची हुई थी.. और चकाचौंध कर देने वाले रुपायों की खनक के सामने किसी के ज़ज्बात कुच्छ मायने नही रखते थे.. कुच्छ भी नही...

पर स्नेहा इसका शिकार क्यूँ बनी? काश वा शुरू में ही स्नेहा को सब सच बता देता.. कम से कम वो सपने तो ना पालती.. उसको आज खुद की ही नज़रों में यूँ जॅलील तो ना होना पड़ता.. जो सपने स्नेहा ने देखे हैं.. खुद उसको भी तो कभी ना कभी देखने हैं... इस'से ज़्यादा प्यार उसको करने वाली दूसरी कोई लड़की दुनिया में उसको मिल सकेगी.. सब कुच्छ पता चलने के बाद भी आ गयी..

" कमाल है.. प्यार करने वाले लोग कितने बेपरवाह होते हैं.. कितने पागल.." विकी ने एक लंबी साँस छ्चोड़ते हुए स्नेहा की और देखा.. उसके चेहरे पर कोई भाव नही था..

स्नेहा ने कोई जवाब नही दिया.. पर गर्व से अपना सिर उठा लिया.. मानो उसको अपने पागलपन पर गर्व हो.. प्यार को संजीदगी से समझने का घमंड!

" तुम किसी आख़िरी इच्च्छा की बात कर रही थी.. वही बता दो!" खिसियाए हुए से विकी ने फिर स्नेहा को टोका...

" तुम पूरी नही करोगे विकी..तुम प्यार को समझते ही नही हो.. जाने दो..!" स्नेहा ने सामने देखते हुए ही जवाब दिया...

"कहकर तो देखो! क्या पता कर भी दूँ?" विकी ने फिर पूच्छने की जुर्रत की..

"मैने राज और प्रिया दोनो से बात की थी.. दोनो एक दूसरे से बेहद प्यार करते हैं.. जैसे मैं तुम्हे कर बैठी थी.. बिना सोचे समझे.. बिना जाने.. पागल थी ना.. तुम्हारे लिए.. "

"ये प्रिया कौन है?" विकी ने उसको टोका..

" उनके सामने ही रहती है.. दोनो एक ही क्लास में पढ़ते हैं.. एक ही स्कूल में.. वो भी उसके साथ ही भाग कर लोहरू आ गयी है.. पता नही उनका क्या होगा? प्रिया ने मुझसे कहा था.." स्नेहा ने अपने आपको ज़ज्बात में बहने से रोकने की लाख कोशिश की पर अपने आपको सुबकने से ना रोक पाई.. पर वा बोलती रही.." प्रिया ने कहा था.. अपने मोहन से कहना हमारी मदद करे.. वो हमारा इंतज़ार करेंगे.. ताकि हम वापस जाकर उनकी मदद कर सकें.. मेरी तरह वो भी नादान हैं.. अगर उनके सामने कोई रुकावट आई.. तो मुझे डर है.. वो बिखर जाएँगे... मैं चाहती हूँ कि तुम उनकी मदद करो..!" स्नेहा ने अपनी बात पूरी की....

"ठीक है.. मैं कर दूँगा.. पर करना क्या है?" विकी ने बात आगे बढ़ाने की कोशिश की....

" उनको जगह देनी है.. जहाँ पर वो रह सकें.. उनको रास्ता दिखाना है.. नही रास्ता मत दिखाना.. वो 'प्यार' को तुमसे कहीं बेहतर समझते हैं.. एक बात और मानोगे...?" स्नेहा ने अपने आँसू पौच्छे...

" बोलो..."

" उन्हे कभी मत बताना की तुमने मुझे छ्चोड़ दिया.. मेरे प्यार की तौहीन होगी.. उनके सामने में हरपल तुम्हारी ही बात करती रही.. मोहन ऐसा है.. मोहन वैसा है..मोहन ने मेरे लिए ये किया.. वो किया.. वो तुम्हारी बहुत इज़्ज़त करते हैं.. तुम्हे आदर्श मान'ने लगे हैं अपना.. अगर उनको ये सब पता लग गया तो वो 'प्यार' को ही ग़लत समझने लगेंगे.. एक दूसरे पर से भी विस्वास उठ जाएगा उनका.. और मैं नही चाहती की दिल हमेशा हारे.. और दिमाग़ हमेशा जीते!...

अचानक विकी ने कच्चे रास्ते पर गाड़ी मोड़ दी.. वहाँ 3 गाड़ियाँ खड़ी थी.. जो उनके पिछे चल पड़ी..

" इनको सोन्प दोगे मुझे?" स्नेहा ने विचलित होते हुए कहा.. उसको लगा.. विकी से जुदा होने का टाइम आ गया है.. मायूसी और मजबूरी उसके हसीन चेहरे पर अचानक बिखर गयी...

" नही.. ये अपने आदमी हैं.. मेरी प्रोटेक्षन के लिए साथ आए हैं.. वो भी पूरी तैयारी के साथ आए होंगे.." विकी ने कहा...

" एक बात बताऊं विकी.. तुम्हे याद है जब हॉस्टिल से निकलने के बाद उन्न लोगों ने हमारी गाड़ी रुकवाई थी.. और मुझे ले जाने की कोशिश कर रहे थे.. तब मुझे तुमसे प्यार नही था.. मैं अपनी जान बचाने के लिए तुम्हारे सीने से जा चिपकी थी.. उस वक़्त मैं जीना चाहती थी.. अपने लिए... और जब तुमने एक हाथ से मुझे अपने अंदर समेत कर उस आदमी के मुँह पर घूँसा मारा था.. वो मेरी जिंदगी का सबसे हसीन पल था.. उसी एक पल में मुझे तुमसे प्यार हो गया.. उसी एक पल में मैं तुमको अपना मान बैठी.. उसी एक पल मैं मुझे अहसास हुआ था की प्यार क्या होता है.. दूसरे के लिए जीना क्या होता है.. और मैं तुम्हारे लिए जीने लगी थी... मुझे नही पता था वो सब नाटक था.." कहते ही स्नेहा विकी की छाती से चिपक गयी और बच्चों की तरह से रोना शुरू कर दिया.. विकी का हाथ अपने आप ही उठ कर स्नेहा की कमर पर चला गया.. और उसको सख्ती से अपनी छाती में दूबका लिया...

" मुझे वही मार देना विकी.. पैसे लेते ही.. उनको भी तो मुझे मारना ही है.. मैं तुम्हे याद करके तड़पना नही चाहती.. मैं जीना नही चाहती विकी.. प्लीज़.. मुझे मार देना जान.. मैं और जीकर क्या करूँगी.. अब हर पल मेरे लिए सज़ा के समान होगा.. मुझे क्यूँ तड़पने के लिए छ्चोड़ देना चाहते हो.. मार देना मुझे.." स्नेहा के हर शब्द में गुहार थी.. हर शब्द में अधूरी कसक थी.. उसके पूरा ना हो पाने की.. अर्धनीगीनी ना बन पाने की...

विकी से कुच्छ बोलते ना बना.. अब तो बस एक ही काम हो सकते था.. या तो स्नेहा को पूरी करना.. या अपने अरमान..

करीब 5 मिनिट और चलने के बाद वो एक टीले के पास आ गये.. वहाँ कुच्छ और गाड़ियाँ खड़ी थी... उनके ठीक सामने कुच्छ दूरी पर विकी ने गाड़ी रोक दी.. दूसरी गाड़ियाँ उसकी बराबर में आ खड़ी हुई...

विकी गाड़ी से नीचे उतर गया.. उसके उतरते ही उसकी गाड़ियों में से एक आदमी गाड़ी के बाहर स्नेहा की बगल में आ खड़ा हुआ.. पता नही क्यूँ?

कुच्छ और आदमी निकल कर गाड़ियों के पास खड़े हो गये.. लगभग सभी के हाथ में हथियार थे..

दूसरी तरफ भी कुच्छ ऐसा ही दृश्या था.. फ़र्क़ सिर्फ़ इतना ही था की इनके पास स्नेहा थी और उनके पास पैसा.. स्नेहा की कीमत!

विकी आगे गया तो उधर से बांके भी इस और चला आया.. पास आते ही बांके ने विकी की और हाथ बढ़ाया.. पर विकी के हाथ उसकी जेब से ना निकले.. या पता नही.. निकल ही नही पाए," पैसा?"

" पूरा है.. हमारे पास आकर देख सकते हो.. आओ!" बांके ने जवाब दिया...

विकी उसके साथ उनकी गाड़ियों के पास गया और दोनो सूटकेस चेक किए.. हज़ार हज़ार की गॅडडिया थी..

" चाहो तो गिन सकते हो?" बांके ने बत्तीसी दिखाते हुए कहा..

" एक नोट भी कम निकला तो तुझे पता है मैं क्या करूँगा...!" विकी ने रूखा सा जवाब दिया..

" कैसे करना है..?" बांके ने अदला बदली के बारे में पूचछा...

" तुम अपनी एक गाड़ी वहाँ भेज दो.. हम स्नेहा को उसमें बिठा देंगे.. " विकी ने एक गाड़ी को अपनी और आने का इशारा किया और उनकी गाड़ी उसकी तरफ चल पड़ी..," इधर हम अपनी गाड़ी में पैसे रखेंगे.. और उधर तुम्हारी गाड़ी में स्नेहा को बिठाएँगे.. उसके बाद हुमारी सभी गाड़ियाँ आगे निकल जाएँगी और तुम्हारी गाड़ियाँ उधर से सीधे... ठीक है?" विकी ने पूचछा...

"हां.. पर मैं पहले लड़की चेक करूँगा...!" बांके ने कहा...

" आ जाओ.." कहकर विकी स्नेहा की और चल पड़ा... बांके भी उसके पिछे पिछे आने लगा...

स्नेहा गाड़ी में सहमी हुई सी बैठी थी.. सब कुच्छ इतना आसान नही था जैसा उसने सोचा था.. दूसरे आदमी के साथ जाने की कल्पना करते हुए ही उसको डर लग रहा था.. वह तो कहीं से भी अपना नही था.. जब विकी ने ऐसा कर दिया तो.... वह रोने लगी....

बांके ने के पास आकर अंदर झाँका..," अगर मैं फोटो साथ नही लता तो कभी विस्वास नही होता की यह मुरारी जी की बेटी है.. देख ना.. कितनी गरम आइटम है.. ससूरी रोते हुए भी कितनी सेक्सी लग रही है... नही?" बांके ने फोटो निकाल कर स्नेहा का चेहरा मिलते हुए कहा...

" चुपचाप अपना काम करो.. ज़्यादा बकवास करने की ज़रूरत नही है.. वरना यहीं ठोक दूँगा.. समझा!" जाने क्यूँ विकी को बांके के मुँह से स्नेहा के शरीर की कामोत्तेजक प्रशंसा सुनकर जलन सी हुई.. उसका थोबड़ा चढ़ गया...

"हे हे हे.. इसको ज़रा नीचे उतारो.. मुरारी जी ने बोला था अच्छे से चेक करना.. आच्छे से..!" बांके स्नेहा को अपने साथ ले जाने को कुच्छ ज़्यादा ही लालायित था..

विकी ने खिड़की खोल दी," नीचे आओ स्नेहा...!"

" नही.. मैं इसके साथ नही जाउन्गि.. मुझे मत भेजो प्लीज़.. मुझे यहीं मार दो.. मैं नही जाउन्गि.." बांके का चेहरा ही कुच्छ ऐसा था.. स्नेहा अपनी सीट से चिपक गयी...

" नीचे आओ स्नेहा.. प्लीज़.. नाटक बंद करो.. मैने तुम्हे क्या कहा था.." विकी ने उसका हाथ पकड़ा तो उसने अपना हाथ च्छुडा लिया.. ," नही.. मैने कहा ना.. मैं नही जाउन्गि.. मुझे मार दो.. यहीं!" स्नेहा की कारून चीत्कार विकी के कलेजे में उतर गयी.. पर उसने अपने आपको संभाले रखा.. उसका कलेजा ही कुच्छ ऐसा था..

" इसको नीचे उतारो.. विकी ने अपने एक आदमी को इशारा किया और खुद अलग हट गया...

वो आदमी.. स्नेहा को खींच कर नीचे उतारने की कोशिश करने लगा.. पर जैसे स्नेहा को तो कोई और 'हाथ' अपने बदन पर अब गंवारा ही ना था," दूर हटो.. मैं उतर रही हूँ.." स्नेहा ने बिलखते हुए कहा.. उसकी आँखों के सामने अंधेरा सा छाया हुआ था.. जैसे मौत ही उसको पुकार रही हो.. उसको विकी की बगल में टगी माउज़र दिखाई दी.. और उसको लगा उसको रास्ता मिल गया है.. वह नीचे उतर कर विकी के साथ खड़ी हो गयी.. मौके के इंतज़ार में..

"देख लो जल्दी.. मेरे पास टाइम नही है..

" बांके गौर से स्नेहा को उपर से नीचे तक देखने लगा.. उसकी लार टपक पड़ी.. आँखों में खून वासना बनकर उतर आया.. स्नेहा का हर अंग इतना रसीला था की कपड़ों के उपर से ही किसी की भी पॅंट गीली हो सकती थी.. बांके भूल गया की वह विकी के पास खड़ा है.. ये भी की विकी ने उसको 2 मिनिट पहले ही चेतावनी दी थी..

बांके की नज़रों को इस तरह अपने बदन में चुभता हुआ देखना स्नेहा से सहन

ना हुआ.. वह लज्जित होकर विकी से जा लिपटी और अपने आपको उसमें च्छुपाने की कोशिश करने लगी.. ठीक उसी तरह जैसा पिच्छली बार नाटक के वक़्त हुआ था..

विकी को हर पल ये अहसास हो रहा था की वह दुनिया का सबसे गिरा हुआ इंसान है.. सबसे ज़्यादा लालची और धोखेबाज.. उसको ग्लानि सी होने लगी...

" वाह विकी बाबू.. जवाब नही तेरा भी.. मान गया.. एक बात तो बता.. इसका कुच्छ इस्तेमाल भी किया या मेरे लिए कुँवारी...!"

आगे बांके एक शब्द भी ना बोल पाया.. उसकी गर्दन घूम गयी.. विकी का एक जोरदार थप्पड़ उसके गालों पर पाँचों उंगलियों के निशान छ्चोड़ गया था.. गुस्से से तिलमिलाए हुए विकी का हाथ सीधा अपनी माउज़र पर गया.. और उसने माउज़र निकाल कर बांके के सीने पर तान दी.. विकी का चेहरा ज़िल्लत और गुस्से से लाल हो चुका था.. पहली बार जब उसने बांके को स्नेहा को घूरते देखा था तो उसके दिल में अजीब सी सिहरन पैदा हुई थी.. तब उसको पहली बार ये अहसास हुआ था की स्नेहा जाने अंजाने उसकी धड़कनो में समा चुकी है.. उनके सपने सांझे हो गये हैं.. स्नेहा उसको अपने लिए ज़रूरत सी लगने लगी थी.. अपनी इज़्ज़त सी लगने लगी थी.. 'अपनी' लगने लगी थी.. पर इस बार उसको यकीन हो गया.. वह स्नेहा को नही छ्चोड़ सकता.. वह उसके लिए कुच्छ भी छ्चोड़ सकता है...," उनको बोलो पैसा इधर लेकर आ जायें.. मैं 10 तक गिनूंगा बस!"

" नही.. विकी बाबू.. प्लीज़.. ववो.. मेरे आदमी नही हैं.. वो मुरारी के आदमी हैं.. सच में.. वो कभी स्नेहा को लिए बगैर पैसा नही देंगे.. भगवान की कसम.. आ.. एमेम..मैं तो मज़ाक कर रहा था.. ये तो मेरे लिए बेटी के जैसी है.. है ना?.. प्लीज़.... मुझे बखस दो..."

विकी गिनती गिनता जा रहा था और बांके की पतलून सच में ही गीली हो गयी.. बोलते बोलते... डर के मारे उसने पॅंट के अंदर ही 'कर' दी..

विकी 7 तक पहुँचा तो स्नेहा बोल पड़ी," नही.. ऐसा मत करो.. मैं चली जाती हूँ.. मैं जा रही हूँ.. " कहते हुए उसने खुद को विकी के सीने से अलग करने की कोशिश की पर तब तक विकी ने उसको अपना हाथ उसकी कमर में डाल कर मजबूती से अपने सीने से चिपका लिया था.. और इस बार वो नाटक नही था.. विकी जुड़ गया था.. स्नेहा के नाम के साथ हमेशा के लिए...

9 तक गिनते गिनते माउज़र नीचे झुक गया.. वह स्नेहा की नज़र में अब और बुरा नही बन'ना चाहता था.. उसको इंसान बनकर दिखना चाहता था.. प्यार करने वाला.. मौत बाँटने वाला नही...

"भाग जाओ यहाँ से.. इस'से पहले की मैं अपना विचार फिर से बनाउ.. मुझे यहाँ दिखाई मत देना.." विकी ने एक एक शब्द को चबाते हुए कहा...

उसके बाद तो बांके ने पिछे मुड़कर देखा ही नही... वो सब अपनी गाड़ियों में बैठे और गाड़ियाँ धूल उड़ाती हुई उनकी आँखों से औुझल हो गयी...

" चलो वापस!" विकी ने अपने साथियों से कहा.. उन्न सबकी आँखों में आँसू आ गये थे.. खुशी के.. विकी को पहली बार उन्होने इस अंदाज में देखा था.. अचानक सबने एक दूसरे की आँखों में देखा और एक साथ हवा में फाइयर कर दिया.. स्नेहा सहम कर विकी की छाती में जा दुब्कि..

" आज तू असली वाला लीडर बन गया रे विकी.. अपन तुझे सलाम करता है.." उस आदमी की आवाज़ से लगा उसका कोई करीबी ही होगा.. कोई और तो इस तरह आलिंगंबद्ध जोड़े के पास जाने की हिम्मत कर ही नही सकता था...

जब सब चले गये तो विकी ने स्नेहा को अपने बहुपाश से अलग करके उसकी आँखों में झाँका.. स्नेहा समझ नही पा रही थी की क्या बोले!

" मैं तुम्हारे लायक नही हूँ स्नेहा.. बुल्की तुम्हारे साथ खड़ा होने लायक भी नही हून.. पर मैं तुम्हारी 'वो' इच्च्छा ज़रूर पूरी कर के दिखाउन्गा.. मैं तुम्हे ग़लत साबित नही होने दूँगा.. राज और प्रिया को मिलने से कोई नही रोक सकता.. ..... अगर राज मेरे जैसा नही निकला तो... आओ तुम्हे उनके पास छ्चोड़ आउ!" विकी ने अब तक सहमी खड़ी स्नेहा को गाड़ी में बिठाया और फिर खुद गाड़ी में बैठ कर गाड़ी चला दी!

साधू सा आलाप कर लेता हूँ ,

मंदिर जाकर जाप भी कर लेता हूँ ..

मानव से देव ना बन जाऊं कहीं,,,,

बस यही सोचकर थोडा सा पाप भी कर लेता हूँ

आपका दोस्त

राज शर्मा

(¨`·.·´¨) ऑल्वेज़

`·.¸(¨`·.·´¨) कीप लविंग &

(¨`·.·´¨)¸.·´ कीप स्माइलिंग !

`·.¸.·´ -- राज

girls school--50

hello dosto girls school ka paart 50 lekar aapke liye haajir hun

Lunch mein Anjali ne aate hi ladkiyon se poochha," Sneha kahan gayi.. uska mood theek huaa ki nahi..?"

"wo toh chali bhi gayi mummy! Mohan aaya tha usko lene.." Gouri ne khadi hote huye kaha.. Sabko darr tha.. ab tour shayad mushkil hai.. sabhi ke munh pichke huye the.. khas tour se Priya aur Riya ke.. unhe wahan se jana pad gaya toh..

"kyaaa??? oh my God! mujhe school nahi jana chahiye tha.. ab main kya karoon..?" badbadate huye anjali ne fone nikal liya aur Shamsher ke paas fone milaya

"haan.. Anjali.. main sham tak pahunch jaaunga.. tour ki taiyaari kar li hai na?" Shamsher ne fone uthate hi kaha...

"wwo.. Sneha chali gayi.. Vicky ke sath.." Anjali ne uski baat par dhyan na dete huye kaha..

"whhat??? usko pata nahi tha kya..? usko bataya nahi tha kya? ye kya ho gaya..?" shamsher vichlit sa ho gaya...

"mujhe nahi pata.. mere khayal se pata chal gaya tha usko.. subah se ro rahi thi..."

Shamsher ne bina ek pal bhi gunwaye Tough ke paas fone lagaya," Sneha chali gayi.. vicky ke sath.. tumne usko bataya kyun nahi..?"

"kya???" lagbhag waisa hi dhakka tough ko bhi laga," par maine toh usko recording tak suna di thi.. fir wo gayi kyun?"

" ab ye baat sochne ka waqt nahi hai.. hamein jaldi hi kuchh karna padega...!" Shamsher ki taraf se aawaj aayi...

" par chinta karne ki baat nahi hai bhai.. Murari ne apne logon ko uske bahar aane tak usko kuchh nahi karne ko kaha hai.. main sambhal loonga.. sala Murari toh apne paas hi hai na.. main sambhal loonga... par vicky ne ye theek nahi kiya bhai.. wo toh pagal ho gaya hai.. waise Murari ne jo location deal ke liye tay ki hai.. main wahan police bhej deta hoon.. khud bhi chala jaaunga.. Recording mein Murari ne khol kar bataya tha.. main nikal raha hoon.." kahkar tough ne fone kata aur jaldi se bahar nikal gaya.....

-----------------------

Lunch ke baad mayus anjali jab office louti toh Vasu pahle se hi uska intzaar kar raha tha..

"Shrimati ji.. maine aapki salaah par vichar kiya tha.. bura nahi hai.. main sath chalne ko taiyaar hoon.. kahiye kab ka karyakram rakhein..?"

" Nahi Vasu ji.. maine bhi aapki baat par gour farmaya tha.. aap sahi kah rahe the.. iss waqt tour par jana theek nahi.. maine programme cancel kar diya hai.." Anjali ne kursi par baithte hi apna matha pakar liya....

"Parantu ye toh koyi baat nahi huyi.. maine lakh sochne ke baad apna mann banaya.. aur ab jabki main jane ka ichchhuk hoon toh aap mana kar rahi hain.. aapko chalna chahiye.. aur nahi toh aap bachchon se hi poochh kar dekh lo.. maine bhi ek aadh ladki se iss baare mein vichar kiya tha.. wo chalne ko taiyaar hain.. aap kahein toh main bachchon se parchiyan dalwa leta hoon.. jaisa bahumat kahe.. boliye?" bechare vasu par toh gaaz si gir padi tour cancel hone ki baat sunte hi... jaane kitne armaan sanjo liye the usne ghante bhar mein hi....

"Dekhiye vasu ji.. tour mumkin nahi hai.. aap samajhne ki koshish karein... aur mere sir mein dard hai.. aap kripaya mujhe akela chhod dein..." Anjali tunak si padi thi...

Vasu bina kuchh bole munh fulakar wahan se nikal gaya.. usne class nahi li.. jate huye usne chhoti class ki ek ladki ko bulaya aur usko Neeru ko math ki kitab lekar staffroom mein bhej dene ko bol kar khud wahin chala gaya...

"ji Sir.. Aapne bulaya?" kahte huye Neeru seedhi staffroom mein ghus gayi.. usne andar aane ki ijajat tak nahi maangi.. wo khili huyi thi.. jate hi usne apni math ki kitab ko table par patka aur vasu ki aur munh karke khadi ho gayi...," maine poochh liya hai Sir.. gharwalon se.. main bhi chaloongi tour par... "

Vasu bechaini se khada hokar idhar udhar tahlne laga," Saali sari duniya prem ki dushman hai..! Log jodiyan bante dekh hi nahi sakte.. sabko apni apni padi hai.. batao.. agar chal padte toh kounsa pahad toot padna tha.... ?" Vasu badbada raha tha.. Neeru ko bus ek hi baat dhang se sunayi di.. ' Sari duniya prem ki dushman hai'

"kya Sir?" Neeru ne hichkichate huye poochha..

" arey kya kya?" Vasu ne Neeru ke paas aakar usko kandhon par se pakad liya.. uska gussa uski pakad ki majbooti mein jhalak raha tha.. Neeru andar tak hil gayi.. neeche tak.. Vasu ne aawesh mein bakna jari rakha," wo kya samajhte hain..? agar hum ghoomne nahi gaye toh kya hum pyar karna chhod denge.. kya hum yahan pyar nahi kar sakte.. nahi nahi.. ye toh vidyalay hai.." Vasu ne apne hath hata liye," kya tum mere paas ghar nahi aa sakti.. kya main chori chhipe Raat ko deewarein kood kar tumhare ghar nahi aa sakta.. kya hamara pyar itna kamjor hai ki...."

Vasu jane kya kya bak raha tha.. mano bhang kha rakhi ho.. Neeru hairan thi.. abhi tak jo uss'se baat karte huye hichkicha raha tha.. ab deewarein koodne ki baat kar raha hai.. jane kitne rang the uske Vasu ke.. wo toh aaj tak usko samajh hi nahi payi thi...

Par wo man hi man khil uthi thi.. Jo wo bol dena chahti thi.. uski jarurat hi na padi.. sab kuchh akele vasu ne hi bol diya

"toh kya Sir.. hum tour par nahi ja rahe..?" Neeru ne lagataar anaap shanaap bol rahe vasu ko khud bolkar chup kiya...

" nahi.. par tum chinta mat karo.. main tumhare ghar aaunga.. aaj raat ko.. aa jaaun na?"

Neeru se koyi jawaab dete hi na bana.. wah sharma gayi.. kitaabein uthayi aur bahar bhag gayi.. par jawaab toh Vasu ko mil hi gaya tha.. uski muskurahat mein!

Vicky chupchap Sneha ko lekar apni manjil ki aur chalta ja raha tha.. uska man usko kachot raha tha.. kya wah sahi kar raha hai? haan bhi aur nahi bhi.. uske antarman mein virodhabhas goonj raha tha.. Vicky ke paas sab kuchh tha.. par wo manjil par pahunch kar sustaane walon mein se nahi tha.. uska lakshya aur aagey.. fir aur aagey badhte jana tha.. Jaankaron ki rai mein multiplex rupaiyon ki khan tha.. kahne ko net income sirf 2 se 2.5 lakh rupaiye mahina par vastavikta iss-se kafi alag thi.. pahle jab casino par ban nahi tha to uska malik shahar ka sabse bada ameer tha.. karan undergroung floor par casino ki aad mein hone wale har tarah ke dhandhe.. karodon rupaiyon ki paidawar har mahine uss 100x100 ki chhoti si jagah se hoti thi... par pichhli sarkar ne sab kuchh band karwa diya aur Multiplex ka malik bhari dabav mein aa gaya.. par ab.. ab andar ki khabar ye thi ki agli sarkaar aate hi usko fir se chalu karne ja rahi hai.. aur yahi karan tha ki Murari aur Vicky mein usko lekar talwaarein khinchi huyi thi.. aur chakachoundh kar dene wale rupaiyon ki khanak ke saamne kisi ke jajbaat kuchh mayne nahi rakhte the.. kuchh bhi nahi...

Par Sneha iska shikar kyun bani? kash wah shuru mein hi Sneha ko sab sach bata deta.. kum se kum wo sapne toh na paalti.. usko aaj khud ki hi najron mein yun jaleel toh na hona padta.. Jo sapne Sneha ne dekhe hain.. khud usko bhi toh kabhi na kabhi dekhne hain... iss'se jyada pyar usko karne wali dusri koyi ladki duniya mein usko mil sakegi.. sab kuchh pata chalne ke baad bhi aa gayi..

" Kamaal hai.. Pyar karne wale log kitne beparwah hote hain.. kitne pagal.." Vicky ne ek lumbi saans chhodte huye Sneha ki aur dekha.. uske chehre par koyi bhav nahi tha..

Sneha ne koyi jawaab nahi diya.. par garv se apna sir utha liya.. mano usko apne pagalpan par garv ho.. pyar ko sanjeedagi se samajhne ka ghamand!

" tum kisi aakhiri ichchha ki baat kar rahi thi.. wahi bata do!" khisiyaye huye se vicky ne fir Sneha ko toka...

" tum poori nahi karoge vicky..tum pyar ko samajhte hi nahi ho.. jane do..!" Sneha ne saamne dekhte huye hi jawaab diya...

"kahkar toh dekho! kya pata kar bhi doon?" Vicky ne fir poochhne ki jurrat ki..

"Maine Raj aur Priya dono se baat ki thi.. Dono ek dusre se behad pyar karte hain.. jaise main tumhe kar baithi thi.. bina soche samjhe.. bina jane.. pagal thi na.. tumhare liye.. "

"ye Priya koun hai?" Vicky ne usko toka..

" unke Saamne hi rahti hai.. dono ek hi class mein padhte hain.. ek hi School mein.. wo bhi uske sath hi bhag kar Loharu aa gayi hai.. pata nahi unka kya hoga? Priya ne mujhse kaha tha.." Sneha ne apne aapko jajbaat mein bahne se rokne ki lakh koshish ki par apne aapko subakne se na rok payi.. par wah bolti rahi.." Priya ne kaha tha.. apne Mohan se kahna hamari madad kare.. wo hamara intzaar karenge.. taki hum wapas jakar unki madad kar sakein.. meri tarah wo bhi nadan hain.. agar unke saamne koyi rukawat aayi.. toh mujhe darr hai.. wo bikhar jayenge... main chahti hoon ki tum unki madad karo..!" Sneha ne apni baat poori ki....

"theek hai.. main kar doonga.. par karna kya hai?" Vicky ne baat aage badhane ki koshish ki....

" unko jagah deni hai.. jahan par wo rah sakein.. unko raasta dikhana hai.. nahi Raasta mat dikhana.. wo 'pyar' ko tumse kahin behtar samajhte hain.. ek baat aur maanoge...?" Sneha ne apne aansoo pouchhe...

" Bolo..."

" Unhe kabhi mat batana ki tumne mujhe chhod diya.. mere pyar ki touheen hogi.. unke saamne mein harpal tumhari hi baat karti rahi.. Mohan aisa hai.. Mohan waisa hai..mohan ne mere liye ye kiya.. wo kiya.. wo tumhari bahut ijjat karte hain.. tumhe aadarsh maan'ne lagey hain apna.. agar unko ye sab pata lag gaya toh wo 'pyar' ko hi galat samajhne lagenge.. ek dusre par se bhi visvas uth jayega unka.. aur main nahi chahti ki dil hamesha haare.. aur Dimag hamesha jeete!...

achanak vicky ne kachche raaste par gadi mod di.. wahan 3 gaadiyan khadi thi.. jo unke pichhe chal padi..

" inko sonp dogey mujhe?" Sneha ne vichlit hote huye kaha.. usko laga.. vicky se juda hone ka time aa gaya hai.. mayusi aur majboori uske haseen chehre par achanak bikhar gayi...

" Nahi.. ye apne aadmi hain.. Meri protection ke liye sath aaye hain.. wo bhi poori taiyari ke sath aaye honge.." Vicky ne kaha...

" ek baat bataaoon vicky.. tumhe yaad hai jab hostel se nikalne ke baad unn logon ne hamari gadi rukwayi thi.. aur mujhe le jane ki koshish kar rahe the.. tab mujhe tumse pyar nahi tha.. main apni jaan bachane ke liye tumhare seene se ja chipki thi.. uss waqt main jeena chahti thi.. apne liye... aur jab tumne ek hath se mujhe apne andar samet kar uss aadmi ke munh par ghoonsa mara tha.. wo meri jindagi ka sabse haseen pal tha.. usi ek pal mein mujhe tumse pyar ho gaya.. usi ek pal mein main tumko apna maan baithi.. usi ek pal main mujhe ahsaas hua tha ki pyar kya hota hai.. dusre ke liye jeena kya hota hai.. aur main tumhare liye jeene lagi thi... mujhe nahi pata tha wo sab natak tha.." kahte hi Sneha Vicky ki chhati se chipak gayi aur bachchon ki tarah se rona shuru kar diya.. Vicky ka hath apne aap hi uth kar Sneha ki kamar par chala gaya.. aur usko sakhti se apni chhati mein dubka liya...

" Mujhe wahi maar dena Vicky.. paise lete hi.. unko bhi toh mujhe maarna hi hai.. main tumhe yaad karke tadapna nahi chahti.. main jeena nahi chahti vicky.. please.. mujhe maar dena jaan.. main aur jeekar kya karoongi.. ab har pal mere liye saja ke samaan hoga.. mujhe kyun tadapne ke liye chhod dena chahte ho.. maar dena mujhe.." Sneha ke har shabd mein guhaar thi.. har shabd mein adhuri kasak thi.. uske poora na ho pane ki.. ardhanigini na ban pane ki...

Vicky se kuchh bolte na bana.. ab toh bus ek hi kaam ho sakte tha.. ya toh Sneha ko poori karna.. ya apne armaan..

kareeb 5 minute aur chalne ke baad wo ek teeley ke paas aa gaye.. wahan kuchh aur gadiyan khadi thi... unke theek saamne kuchh doori par Vicky ne gadi rok di.. dusri gadiyan uski barabar mein aa khadi huyi...

Vicky Gadi se neeche utar gaya.. uske utarte hi uski gaadiyon mein se ek aadmi gadi ke bahar Sneha ki bagal mein aa khada hua.. pata nahi kyun?

kuchh aur aadmi nikal kar gadiyon ke paas khade ho gaye.. lagbhag sabhi ke hath mein hathiyar the..

Dusri taraf bhi kuchh aisa hi drishya tha.. farq sirf itna hi tha ki inke paas Sneha thi aur unke paas paisa.. Sneha ki keemat!

Vicky aage gaya toh Udhar se Baanke bhi iss aur chala aaya.. Paas aate hi Baanke ne vicky ki aur hath badhaya.. par vicky ke hath uski jeb se na nikle.. ya pata nahi.. nikal hi nahi paye," paisa?"

" poora hai.. hamare paas aakar dekh sakte ho.. aao!" baanke ne jawaab diya...

Vicky uske sath unki gadiyon ke paas gaya aur dono suitcase check kiye.. hazar hazar ki gaddiyan thi..

" chaho toh gin sakte ho?" Baanke ne batteesi dikhate huye kaha..

" Ek note bhi kum nikla toh tujhe pata hai main kya karoonga...!" Vicky ne rookha sa jawaab diya..

" kaise karna hai..?" Baanke ne adla badli ke baare mein poochha...

" tum apni ek gadi wahan bhej do.. Hum Sneha ko usmein bitha denge.. " vicky ne ek gadi ko apni aur aane ka ishara kiya aur unki gadi uski taraf chal padi..," Idhar hum apni gadi mein Paise rakhenge.. aur udhar tumhari Gadi mein Sneha ko bithayenge.. uske baad humari sabhi gadiyan aage nikal jayengi aur tumhari gadiyan udhar se seedhe... theek hai?" Vicky ne poochha...

"haan.. par main pahle ladki check karoonga...!" Baanke ne kaha...

" aa jao.." Kahkar vicky Sneha ki aur chal pada... Baanke bhi uske pichhe pichhe aane laga...

Sneha gadi mein sahmi huyi si baithi thi.. sab kuchh itna aasan nahi tha jaisa usne socha tha.. dusre aadmi ke sath jane ki kalpana karte huye hi usko darr lag raha tha.. wah toh kahin se bhi apna nahi tha.. jab vicky ne aisa kar diya toh.... wah rone lagi....

Baanke ne ke paas aakar andar jhanaka..," agar main foto sath nahi lata toh kabhi visvas nahi hota ki yah Murari ji ki beti hai.. Dekh na.. kitni garam item hai.. Sasuri rote huye bhi kitni sexy lag rahi hai... nahi?" Baanke ne foto nikal kar Sneha ka chehra milate huye kaha...

" chupchap apna kaam karo.. jyada bakwas karne ki jarurat nahi hai.. warna yahin thok doonga.. samjha!" Jane kyun Vicky ko Baanke ke Munh se Sneha ke shareer ki kamottejak prashansa sunkar jalan si huyi.. uska tohbda chadh gaya...

"he he he.. isko jara neeche utaro.. Murari ji ne bola tha achchhe se check karna.. Achchhe se..!" Baanke Sneha ko apne sath le jane ko kuchh jyada hi lalayit tha..

Vicky ne khidki khol di," Neeche aao Sneha...!"

" nahi.. main iske sath nahi jaaungi.. mujhe mat bhejo pls.. mujhe yahin maar do.. main nahi jaaungi.." Baanke ka chehra hi kuchh aisa tha.. Sneha apni seat se chipak gayi...

" Neeche aao Sneha.. pls.. natak band karo.. maine tumhe kya kaha tha.." Vicky ne uska hath pakda toh usne apna hath chhuda liya.. ," nahi.. maine kaha na.. main nahi jaaungi.. mujhe maar do.. yahin!" Sneha ki karun chitkar Vicky ke kaleje mein utar gayi.. par usne apne aapko sambhale rakha.. uska kaleja hi kuchh aisa tha..

" isko neeche utaaro.. Vicky ne apne ek aadmi ko ishara kiya aur khud alag hat gaya...

wo aadmi.. Sneha ko kheench kar neeche utaarne ki koshish karne laga.. par jaise Sneha ko toh koyi aur 'hath' apne badan par ab ganwara hi na tha," Door hato.. main utar rahi hoon.." Sneha ne bilakhte huye kaha.. uski aankhon ke saamne andhera sa chhaya hua tha.. jaise mout hi usko pukar rahi ho.. usko vicky ki bagal mein tangi mouser dikhayi di.. aur usko laga usko raasta mil gaya hai.. Wah neeche utar kar vicky ke sath khadi ho gayi.. mouke ke intzaar mein..

"dekh lo jaldi.. mere paas time nahi hai..

" Baanke gour se Sneha ko upar se neeche tak dekhne laga.. uski laar tapak padi.. aankhon mein khoon wasna bankar utar aaya.. Sneha ka har ang itna rasila tha ki kapdon ke upar se hi kisi ki bhi pant geeli ho sakti thi.. Baanke bhool gaya ki wah vicky ke paas khada hai.. ye bhi ki vicky ne usko 2 minute pahle hi chetawani di thi..

Baanke ki najron ko iss tarah apne badan mein chubhta hua dekhna Sneha se sahan

na hua.. wah lajjit hokar vicky se ja lipti aur apne aapko usmein chhupane ki koshish karne lagi.. theek usi tarah jaisa pichhli baar natak ke waqt hua tha..

Vicky ko har pal ye ahsaas ho raha tha ki wah duniya ka sabse gira hua insaan hai.. sabse jyada lalachi aur dhokhebaaj.. usko glani si hone lagi...

" wah Vicky babu.. jawab nahi tera bhi.. maan gaya.. ek baat toh bata.. iska kuchh istemaal bhi kiya ya mere liye kunwari...!"

aagey Baanke ek shabd bhi na bol paya.. uski gardan ghoom gayi.. vicky ka ek jordaar thappad uske gaalon par paanchon ungaliyon ke nishan chhod gaya tha.. gusse se tilmilaye huye Vicky ka hath seedha apni mouser par gaya.. aur wah boukhla gaya.. ,"meri mouser kahan hai?"

Tabhi goli chale ki aawaj Vicky ko apne kano ke paas sunayi di.. uske chounk kar pichhe hat'te hi khoon se lathpath Sneha Jameen par aa giri.. wo aazad ho chuki thi.. hamesha ke liye...

Vicky ko har pal ye ahsaas ho raha tha ki wah duniya ka sabse gira hua insaan hai.. sabse jyada lalachi aur dhokhebaaj.. usko glani si hone lagi...

[color=#8000bf][size=large]" wah Vicky babu.. jawab nahi tera bhi.. maan gaya.. ek baat toh bata.. iska kuchh istemaal bhi kiya ya mere l
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Reply
11-26-2017, 02:04 PM,
#93
RE: College Sex Stories गर्ल्स स्कूल
गर्ल्स स्कूल पार्ट --51

हेलो दोस्तो मैं यानी आपका दोस्त राज शर्मा एक बार फिर पार्ट-51 लेकर हाजिर हूँ

काफ़ी देर यूँही चुपचाप चलते रहने के बाद स्नेहा ने नज़रें घूमाकर विकी की और देखा.. विकी के हाव-भाव बिल्कुल बदले हुए थे.. चेहरे पर पासचताप नही गर्व था... ग्लानि नही सुकून था..

स्नेहा को समझ में ही ना आया और बात कहाँ से शुरू करे..." अब तुम्हे वो मल्टिपलेक्स कैसे मिलेगा....... विकी?"

विकी ने कोई जवाब नही दिया.. बस स्नेहा की और नज़र भर कर देखा और फिर सीधा हो गया.. कहना तो चाहता था वह.. बहुत कुच्छ.. कहना चाहता था कि मुझे अहसास हो गया है.. जिंदगी क्या होती है.. कहना चाहता था कि.. 'वो' उसके लिए दुनिया की सबसे कीमती चीज़ है.. उसके लिए वो सबकुच्छ छ्चोड़ सकता है.. अगर वो उसका हाथ फिर से पकड़ ले तो.. पर विकी को जब अपनी जिंदगी में स्नेहा की ज़रूरत का अहसास हुआ तो साथ ही साथ ये भी अहसास हो गया कि वो क्या करने जा रहा था.. उसके साथ.. और यही वजह थी कि लाख कोशिश करने के बाद भी उसके मुँह से एक शब्द तक ना निकला...

"हम कहाँ जा रहे हैं?" स्नेहा ने उसको फिर टोका...

"लोहरू! मुझे लगता है वहाँ तुम खुश रह सकती हो.. मैं शमशेर और टफ से बात करूँगा.. तुम्हारे लिए.. मुझे पता है.. स्नेहा.. मैने जो कुच्छ भी किया.. वो माफी के लायक नही.. पर प्लीज़ हो सके तो मुझे माफ़ कर देना.. हो सके तो!" विकी का गला भर आया... अपनी बात कहने के दौरान उसने काई बार स्नेहा के चेहरे की और देखा.. पर जब जब वा नज़रें मिलाने की कोशिश करती.. वह अपनी नज़रें हटा लेता.. उसमें अब स्नेहा की नज़रों का सामना करने की हिम्मत नही हो पा रही थी...

" कोई फ़र्क़ नही पड़ता... मुझे तुमसे कोई गिला नही है.. मेरी किस्मत ही ऐसी है!" स्नेहा के तन्हा दिल में अभी भी विकी के आगोश में समा जाने की तड़प थी.. पर विकी को भी उस'से प्यार हो...; तभी तो! वह तो ऐसा कुच्छ बोल ही नही रहा था.. जैसे बस उस पर दया करके ही उसको वापस ले आया हो...

दोनो असमन्झस में थे.. दोनो एक दूसरे के लिए तड़प रहे थे पर पहल करने से दोनो ही कतरा रहे थे.. इसी असमन्झस में वो यूँही आधी अधूरी बात करते हुए लोहरू पहुँच गये...

"अरे देखो.... शायद स्नेहा दीदी वापस आ गयी", खूबसूरत सी लड़की को गाड़ी से उतरते देख वाणी खुशी से उच्छलते हुए अंदर भागी और उसने सबको चौंका दिया," ब्लॅक कलर की गाड़ी में हैं.."

अंदर बैठे सभी के मुरझाए चेहरे उम्मीद की किरण के साथ ही अजीब ढंग से खिल उठे.. सभी भागते हुए बाहर की और भागे.. प्रिया ने खिड़की में से ही स्नेहा को गाड़ी के पास खड़ी होकर विकी की और देखते देख लिया.. वो खुशी से झूम उठी और भागती हुई जाकर स्नेहा को अपनी बाहों में भर लिया," मुझे विस्वास था; तुम ज़रूर आओगी.. थॅंक यू स्नेहा.. थॅंक यू!"

स्नेहा की आँखें छलक आई," शायद तुम्हारा विस्वास ही मुझे यहाँ तक ले आया प्रिया.. वरना.." गाड़ी के चलने की आवाज़ सुनते ही स्नेहा चौंक कर पलटी.. उसने चलते हुए विकी को कुच्छ बोलने का सोच रखा था.. पर.. वो अपने से दूर जा रही गाड़ी को तब तक विस्मित नेत्रों से ताक्ति रही जब तक की वो उसकी आँखों से औझल ना हो गयी..

"अब तो हम चलेंगे ना दीदी.. टूर पर.. अब तो स्नेहा दीदी भी आ गयी हैं.." वाणी प्रिया के हाथ से लिपट गयी.. वो थी ही ऐसी.. घंटा भर पहले ही वहाँ आई थी.. दिशा के साथ.. और वीरू से लेकर रिया तक.. सबके दिलो दिमाग़ पर छा चुकी थी.. सबको लग रहा था जैसे उसको वो वर्षों से जानते हैं.. वाणी अपना दिल खोल कर जो रख देती थी...

अब तक सभी स्नेहा के इर्द-गिर्द जमा हो चुके थे..

"ठहर जा.. नही तो कान के नीचे एक लगाउन्गा.. उसको अंदर तो आने दे पहले.." वीरेंदर ने वाणी का हाथ पकड़ कर एक और खींच लिया...

" आप इतने गुस्सैल क्यूँ हो.. ? सब आपसे डरते हैं.. ऐसे बोलॉगे तो मैं आपसे बात नही करूँगी हां.." वाणी ने अपनी कलाई सहलाते हुए बनावटी गुस्से से वीरू की और देखा और हंस पड़ी.. उसकी हँसी ही तो सबकी जान थी... वीरू बिना मुस्कुराए ना रह सका...

" अब भी तो आ गयी.. मैने कहा नही था? भाई के बिना दिल नही लगेगा तुम्हारा!" वीरू स्नेहा की और मुस्कुराते हुए बोला..

स्नेहा कुच्छ ना बोल सकी.. उसके चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे उसका सब कुच्छ खो गया हो.. जैसे उसको विस्वास ही नही था.. विकी उसकी दुनिया में सतरंगी सपने सजाकर यूँ भाग जाएगा.. घर के अंदर आते हुए भी वह मूड कर बार बार पिछे देखती रही.....

वस्त्र भार बन, तन से निकल जाता है

निवस्त्र यौवन, कामेन्द्रियाँ विचलित कर जाता है

चुचियों का गहरा घेरा, अधरों को ललचाता है

हो व्याकुल प्रेमी, बच्चा बन जाता है

" हां! तो लिस्ट बना लो, यहाँ से कौन कौन टूर पर जा रहे हैं?" लिविंग रूम में सबको अपने चारों और लिए बैठी गौरी ने चिल्लाकर सबको चुप किया.. वीरू एक तरफ लेटा हुआ था और राज उसके पास बैठा हुआ लड़कियों की बातें सुन रहा था...

" कौन कौन क्या? सभी चलेंगे..!" वाणी ने अपनी नज़रें घूमाकर सभी के चेहरे पर झलक आई सहमति के भाव देखे...

"क्यूँ नही? पूरे गाँव को ही उठा ले चलते हैं... क्या ख़याल है?" गौरी ने वाणी की हँसी उड़ाते हुए कहा...

" मैं तो यहाँ बैठे सभी लोगों की बात कर रही थी.. गाँव की बात थोड़े ही कर रही हूँ.." वाणी ने मुँह बनाते हुए कहा...

"अरे पगली.. हम सब तो चलेंगे ही.. पर 5-7 बच्चों से टूर थोड़े ही चला जाएगा.. कुच्छ आइडिया दो.. गाँव की ओर कौन कौन लड़कियाँ चल सकती हैं... हमारे साथ.. अगले महीने एग्ज़ॅम हैं.. स्कूल से ज़्यादा चलने को तैयार नही होंगी.." गौरी ने समझाते हुए कहा..

" नेहा!" दिशा तपाक से बोली.. उसके जहाँ में सबसे पहला नाम यही आया..," वो ज़रूर चल पड़ेगी.. अगर मैं उसको कह दूँगी तो!"

"ठीक है.. लिख लिया.. और?" गौरी ने वहाँ बैठे सभी के नाम लिख कर अगली लाइन में 'नेहा' लिख दिया!

"दिव्या! वो तो पक्का चल पड़ेगी.. लिख लो!" ये वाणी की आवाज़ थी..

" ओके!"

" निशा!" गौरी ने याद करते हुए नाम लिया..

" ना! वो नही चल सकती.. उसकी तो शादी है.. अगले हफ्ते! " दिशा ने गौरी को नाम लिखने से रोक दिया...

"सच? किसके साथ?" गौरी ने चहकते हुए पूचछा.. निशा को संजय का ख़याल हो आया.. कितना बेवफा निकला वो?

"कोई बड़ा बिज़्नेसमॅन है.. हिसार से.. सुना है लव मॅरेज है.. लड़के वालों ने खुद हाथ माँगा है.."

" छ्चोड़ो ना.. और नाम याद करो!" वाणी ने दिशा के मुँह पर हाथ रखते हुए कहा..," सरिता!" वाणी को यूँही याद आ गया.. दिव्या से राकेश और उस'से सरिता!

" चल ना! किसका नाम ले रही है.. टूर का मज़ा खराब करवाएगी क्या? " दिशा ने बिगड़ते हुए कहा..

" मत ले चलो! मुझे क्या है? मैने तो नाम याद दिलाया था बस!" वाणी ने मुँह बनाया...

" लिख लेते हैं यार.. वैसे ही बच्चे कम पड़ रहे हैं.. अगर और लड़कियाँ जाने को तैयार हो गयी तो नाम काट देंगे.. इसमें क्या है!" गौरी ने समझाते हुए कहा...

"चलो.. लिख लो! वैसे मेरी कोई दुश्मन भी नही है वो.. बस.. नेचर की अच्छि नही है.." दिशा ने सफाई देते हुए कहा..

गौरी ने नाम लिख लिया..

" सीमा दीदी.. वो भी तो चल सकती हैं..?" वाणी ने एक और नाम याद दिलाया..

" नही.. वो नही चलेंगी.. वो तो प्रेग्नेंट हैं.." दिशा ने ये नाम भी नकार दिया..

" पूच्छ तो लो दीदी.. क्या पता चल पड़ें!" वाणी ने ज़ोर देकर कहा..

" मुझे पता है च्छुटकी.. वो नही चलेंगी.. तू खाम्खा.. बहस क्यूँ कर रही है..?"

" मानसी!.. हां.. मानसी.. लिख लो दीदी.. इनकी मत सुनो! ये तो 'बस' को भरने ही नही देंगी वो पक्का चलेगी.. मेरे कहते ही!" वाणी एक बार गौरी की और मुस्कुराइ और फिर दिशा की और घूरा.. कहीं वो मना ना कर दे.. दिशा मुस्कुराने लगी.. मानसी के साथ ही उसको मनु का ख़याल आ गया था...

" लिख लिया.. और बोलो.." गौरी ने नाम लिखते हुए कहा..

"कितने हो गये दीदी..?" वाणी ने कॉपी में झाँकते हुए पूचछा...

"देखो.. दिशा.. स्नेहा.. मैं.. प्रिया.. रिया.. वाणी.. राज.. वीरेंदर... नेहा.. दिव्या.. सरिता.. मानसी.. और मम्मी... जीजा जी.. वासू सर.. " गौरी ने आख़िरी तीनो नाम लिस्ट में जोड़ते हुए कहा..

" और सुनील सर?" वाणी ने याद दिलाया..

" नही.. मम्मी ने पूचछा था.. वो नही चल पाएँगे..!" गौरी ने बताया...

वाणी जाने कब से कुच्छ सोच रही थी..," लड़कियाँ 11 और लड़के सिर्फ़ 4!"

पर किसी ने बेचारी की बात पर ध्यान नही दिया.. उसने दिशा की और देखा," दीदी!"

" हूंम्म्म!" दिशा कुच्छ सोचती हुई बोली...

वाणी को कुच्छ कहते ना बना.. उसके दिल की बात तो दिशा को सोच लेनी चाहिए थी...

" बोल!" दिशा ने उसको टोका...

" कुच्छ नही!" वाणी ने मायूस होते हुए कहा...

"विकी नही चल रहा क्या?" प्रिया और रिया स्नेहा को देखते हुए अचानक एक साथ बोल पड़ी..

स्नेहा कुच्छ ना बोली.. वो ऐसे ही बैठी रही.. गुम्सुम सी...

" दीदी! एक मिनिट इधर आना...!" वाणी ने खड़ी होते हुए दिशा का हाथ खींचा..

दिशा उठकर उसके साथ बाहर आ गयी," क्या?" उसकी आँखों में शरारत सी थी.. शायद वो समझ रही थी कि वाणी क्या कहना चाहती है..

" अगर मानसी ने मना कर दिया तो..?" वाणी ने उसकी आँखों में देखते हुए पूचछा...

"पर तू ही तो कह रही थी.. वो चल पड़ेगी.. तू फोन कर ले उसको.." दिशा अंजान बनी रही..

" नही.. मतलब... आप समझती क्यूँ नही.. अगर उसने मना कर दिया तो..?" वाणी कुच्छ और भी कहना चाहती थी..

" तो क्या?"

" जैसे अगर उसके घर वालों ने अगर ये कह दिया की हम इसको अकेली नही भेजेंगे.. तो..?" वाणी ने हल्का सा इशारा दिया...

" तो क्या? हम ज़बरदस्ती थोड़े ही ले जा सकते हैं.. नही ले जाएँगे.. नाम काट देंगे.. और क्या?" अब दिशा को इसमें कोई शक नही था कि वाणी घुमाफिरा कर मनु को साथ ले चलने को कह रही है..

वाणी पैर पटकती हुई अंदर आ गयी..," मुझे नही चलना टूर पर.. मैं नही जा रही.. मेरा नाम काट दो" कहकर वाणी वीरू के बेड के पास डाले हुए सोफे पर आकर पसर गयी...

दिशा भी उसके पीछे पीछे हंसते हुए अंदर आ गयी..

" अब क्या प्राब्लम हो गयी छम्मक छलो!" वीरू ने हंसते हुए वाणी को छेड़ा...

" आप भी मत जाओ टूर पर.. मैं भी नही जा रही.. कोई मज़ा नही आएगा टूर पर.. सब बोर ही होने हैं.. मुझे पता है.." वाणी ने और भी लोगों को प्रोटेस्ट में शामिल करने की कोशिश की..

" ठीक है.. मैं भी नही जा रहा.. मुझे तो वैसे भी पैर में दर्द है.. मैं क्या करूँगा जाकर..? घूमा तो वैसे भी नही जाना है मुझसे!" वीरू ने उसके सुर में सुर मिलाया...

रिया ने पलट कर वाणी से हाथ मिला रहे वीरू को देखा.. सीने में अंजानी सी जलन हुई," तुम्हारे लिए स्ट्रेचएर ले चलेंगे.. मैं घुमाती रहूंगी.. इस टूटी हुई टाँग को.."

" पहले खुद तो ढंग से चलना सीख ले.. मुझे घुमाएगी..!" वीरू ने ईंट का जवाब पत्थर से दिया..

" हाआआअ.. मुझे चलना नही आता..! किसने बोला है..?" रिया ने वीरू को घूरते हुए पूचछा..

" मैने देखा है.. मर्दों की तरह से चलती है तू.. लड़कियों वाली तो तुझमें बात ही नही है.. " कहते हुए वीरू ज़ोर ज़ोर से हँसने लगा...

रिया ने मुँह बनाया और उठकर अंदर चली गयी..

" क्या है ये.. हम प्लॅनिंग कर रहे हैं चलने की और तुम लोगों को लड़ाई सूझ रही है.. वाणी इधर आजा.. कुच्छ और नाम सोचते हैं..!" दिशा ने वाणी को प्यार से पुकारा..

" मैं नही चल रही.. मानसी के बगैर मैं नही जाउन्गि..." वाणी ने अपना चेहरा दूसरी और घुमा लिया...

" मतलब मानसी नही चल रही..? गौरी ने उसके नाम पर पेन रख दिया..

" चलेगी ना.. ये तो पागल है.. वाणी! मैं उसके घरवालों से बात कर लूँगी.. वो भेज देंगे उसको.. आजा तू.."

वाणी नही आई.. तभी अंजलि घर आ गयी," अरे स्नेहा.. ओह माइ गोद!" तुम आ गयी.. तुमने बताया क्यूँ नही..? मैने तो.."

" मम्मी.. हम टूर की प्लॅनिंग कर रहे हैं.. स्कूल से कितने नाम हुए?" गौरी ने अंजलि की बात पर गौर ना करते हुए पूचछा...

" पर टूर तो मैने कॅन्सल कर दिया.. 5-7 लड़कियों ने कहा था की वो घर पूच्छ कर जवाब देंगी.. पर मैने फिर उनको मना ही कर दिया.. अब तो कल ही पूच्छना पड़ेगा... मैं अजीत और शमशेर को फोन कर देती हूँ...!" अंजलि को याद आया.. वो लोग भी चिंता कर रहे होंगे...

" मैने कर दिया मा'म" स्नेहा ने अंजलि को बताया...

" ओह.. बहुत अच्च्छा किया.. पर मुझे भी बता देना चाहिए था ना.. मैं सारा दिन टेन्षन में रही..." अंजलि ने उसके पास आकर बैठते हुए प्यार से उसके गालों पर हाथ फेरा..," मेरे साथ अंदर आ एक बार..."

स्नेहा अंजलि के पिछे पिछे बेडरूम की और चल दी...

" ये क्या कर रही हो तुम?" अंजलि ज़ोर ज़ोर से हुँसने लगी.. रिया को देखकर स्नेहा भी अपनी हँसी को ना रोक पाई..

" अपनी चाल देख रही हूँ.. बाहर वो 'टूटी टाँग कह रहा है कि मुझे चलना नही आता.. मैं लड़कों की तरह चलती हूँ.. लड़कों की तरह चलती हूँ क्या मैं? और क्या अब मैं कॅट्वाक करूँ..?" रिया ने गुस्से से कहा.. वो ड्रेसिंग टेबल के सामने खड़ी होकर अपने मादक कुल्हों को मॅटकाते हुए बार बार आगे पिछे हो रही थी...

" वो तो पागल है! कौन कह सकता है कि तुम्हे चलना नही आता.. उल्टा तुम्हारी चाल तो बहुत ही... अच्छि है.. उसने देखी ही कहाँ है.. लड़कियों की चाल आज तक.. कभी देखता भी है वो लड़कियों को.. दिया होगा तो तुम्हारी ही चाल पर दिया होगा ध्यान.. या तुम्हे जलाने के लिए कह रहा होगा.. हर लड़की तुम्हारी तरह कहाँ चल पाती है रिया!" स्नेहा ने सच में ही उसकी चाल की तारीफ की थी.. मोरनी जैसी चाल कहें तो अटिस्योक्ति ना होगी...

"पर मम्मी, टूर स्कूल की तरफ से ही जाना ज़रूरी है क्या? बेवजह भीड़ इकट्ठी करने से क्या फायडा.. अब तक कुल मिलकर 10 से ज़्यादा तो हम यहीं बैठे हो गये हैं.. जिसको चलना होगा चल पड़ेगा.. फॅमिली टूर की तरह से भी तो हो सकता है.." गौरी ने स्कूल की तरफ से टूर ले जाने में आ रही दिक्कतों का हाल अंजलि को सुझाया...

" वो तो ठीक है.. पर मैने वासू जी से डिसकस किया था.. मेरे समझने पर ही वो राज़ी हुए थे.. और जब उनका मूड बन गया तो मैने टूर कॅन्सल होने की बात कह दी.. अब अगर उनको नही ले गये तो वो बुरा नही मानेंगे क्या?" अंजलि ने जवाब दिया...

"पर हम ये थोड़े ही कह रहे हैं कि किसी को लेकर ही नही चलना.. अगर वो चलना चाहें तो हमें कोई प्राब्लम नही है.. टूर जाना चाहिए बस.. कल ही!" गौरी ने अपने कहने का मतलब खोल कर समझाया...

"फिर तो उनको अभी बोलना पड़ेगा.. कल सुबह के लिए..!"

" वो मैं बोल दूँगी मा'म! आप चिंता ना करें.. कहो तो मैं अभी जाकर बोल देती हूँ.." वाणी को छेड़'ते हुए उसको मनाने में लगी दिशा ने अंजलि से मुखातिब होते हुए कहा...

" नही! मुझे भी चलना पड़ेगा.. मैं ही उनको सम्झौन्गि.. ये वाणी को क्या हो गया है? ये क्यूँ रूठी हुई लेटी है?" अंजलि ने वाणी को बार बार दिशा का हाथ अपने शरीर से झटकते देख पूचछा...

" छ्होटी सी बात पर ज़िद लगाए पड़ी है.. कह रही है.. उम्म्मह" दिशा के मुँह पर तपाक से उठकर वाणी ने हाथ रख दिया...," कुच्छ नही है मा'म.. मैं तो बस ऐसे ही लेटी हुई हूँ..." कहते हुए वाणी दिशा का हाथ पकड़ कर बाहर खींच ले गयी...

"आप तो बहुत बुरी हैं दीदी.. क्या बताने वाली थी उनको?"

" यही की तुम अब बच्ची नही रही.. बड़ी बड़ी बातें सोचने लगी हो..!" दिशा ने हुंस्ते हुए उसको और अधिक चिड़ा दिया..

" इसमें बड़ी बात क्या है.. मैं यही तो बोल रही हूँ कि..."

" मुझे सब पता है तू क्या बोल रही है.. ला! मैं मानसी के पास फोन मिलाती हूँ.. उसका नंबर. दे.."

" क्या कहोगे आप?" वाणी ने नंबर. देकर उत्सुकता से उसकी और देखा...

" यही कि घर वाले अगर उसको अकेली हमारे पास टूर पर भेज दें तो उसको शमशेर आते हुए अपने साथ ले आएगा..." दिशा ने फोन लगा कर कान से सटा लिया...

" अगर वो मना करें तो मेरे पास एक आइडिया है दीदी..." वाणी मायूसी से उसकी और देखने लगी..

" चुप कर.. फोन लग गया.. हेलो! नमस्ते आंटी जी!" फोन मानसी की मम्मी ने उठाया था...

" नमस्ते बेटी.. कौन?" उधर से आवाज़ आई...

" जी मैं वाणी की बड़ी बेहन बोल रही हूँ.. दिशा!"

" ओहो! कहो बेटा.. तुम आए नही गाँव से.. यहाँ स्कूल की छुट्टियाँ बढ़ गयी हैं.. इसीलिए क्या?"

" क्या? छुट्टियाँ बढ़ गयी हैं.. मुझे तो पता ही नही था..." दिशा के चेहरे पर सुकून की लहर दौड़ गयी.. अब मानसी को चलने के लिए मनाना उसके लिए चुटकियों का खेल था....

" वो आज ही डिक्लेर हुई हैं ना.. गर्मी कितनी पड़ रही है.... खैर मानसी तो मनु के साथ बाजार गयी है.. मनु के नंबर. पर बात कर लो.. दूँ क्या?"

" नही आंटिजी.. नंबर. तो हमारे पास है.. पर आपसे ही बात कर लेती हूँ.."

"बोलो बेटी.. बोलो!"

" वो.. हम 5-7 दिन के टूर पर नैनीताल जा रहे हैं वाणी कह रही थी.. मानसी भी चलती तो बहुत मज़ा आता..! आप भेज दो ना उसको!"

" क्यूँ नही बेटी.. वो तो ये सुनकर बहुत ही खुश होगी.. अब छुट्टियाँ भी पड़ गयी हैं.. गर्मी से तो बची रहेगी.. कब जा रहे हो?"

" जी.. आज रात का ही विचार है.. चलने का.."

" ओहो! इतनी जल्दी.. खैर.. मुझे तो कोई प्राब्लम नही है.. तुम उनसे बात कर लो!"

" ठीक है आंटिजी.. वैसे मनु भी चलना चाहे तो? हमारे साथ लड़के भी जा रहे हैं...!"

" देख बेटा.. उसका मैं कुच्छ कह नही सकती.. वो तो यहाँ शहर में ही बाहर कम निकलता है.. जब देखो.. कंप्यूटर से चिपका रहता है.. जाने क्या मिल गया है उसको.. कहता रहता है.. मुझे एक स्टोरी को इंग्लीश में ट्रॅनस्लेट करने का कांट्रॅक्ट मिला हुआ है.. पता नही क्या स्टोरी है.. राम जाने? अँधा होकर रहेगा.. अगर मान जाए तो उसको भी साथ घसीट ले जाना.. मेरी तो सुनता नही है.."

"ठीक है आंटिजी.. मैं उसके पास ही फोन कर लेती हूँ.. नमस्ते आंटिजी.." दिशा ने फोन कटा तो वाणी वहाँ से रफूचक्कर हो गयी थी.. दिशा ने अंदर जाकर देखा तो वो शरमाई हुई सी तिर्छि आँखों से उसको ही देख रही थी.. यही तो चाहती थी वो.. मनु को साथ ले जाना.. और जब दिशा ने मनु का जिकर किया तो उस'से वहाँ खड़ी ना रहा गया.. जाने क्यूँ?

"इधर आ वाणी.. जल्दी आ!" दिशा ने दरवाजे पर आकर उसको पुकारा..

"क्या है?" वाणी की खुशी च्छुपाए ना च्छूप रही थी.. वो मुँह फेर कर हँसने लगी..

"आ तो.. जल्दी.. काम है..!" कहकर दिशा बाहर निकल गयी...

वाणी ने पिछे से आकर दिशा को अपनी बाहों में भर लिया.. दिशा ने च्छुदाने की कोशिश की पर वाणी ने ना छ्चोड़ा उसको..

" देख.. अब ज़्यादा मचल कर दिखाएगी तो मैं मनु को नही बुलौन्गि हां.." दिशा ने बंदर घुड़की दी...

"उसको बुलाने को कौन बोल रहा था.. मैने तो मानसी को बुलाया था बस.." वाणी अब भी दिशा को पकड़े हुए थी..

" तो मना कर दूं.. मनु को!"

" अब कह दिया है तो चलने दो.. या तो पहले ही नही बोलना चाहिए था..." वाणी ने उसको छ्चोड़ते हुए कहा..

"अभी कहाँ बोला है? अभी तो बोलना है.. बोलो क्या करूँ?"

" आप कितनी अच्छि हो दीदी..!" वाणी ने और कुच्छ नही बोला और अंदर भाग गयी..

" मुस्कुराती हुई दिशा ने मनु का नंबर. डाइयल किया...

वासू टूर चलने की बात सुनते ही व्याकुल हो उठा.. अब क्या करें.. वो लोग तो आज रात ही जाने वाले हैं.. वासू की मनोस्थिति अजीब सी हो गयी.. वह तो नीरू के लिए ही टूर पर जाना चाह रहा था.. वरना तो ये दुनिया उसकी देखी हुई थी.. अब नीरू को खबर करे भी तो कैसे करे.. वासू के दिल में पाप था.. इसीलिए वह चाहकर भी अंजलि को नीरू के चलने के बारे में कुच्छ बोल नही पाया.. अंतत: उसने खुद ही सारा जोखिम उठाने का फ़ैसला किया..

अंजलि के वहाँ से निकलते ही उसने एक प्रेम पाती में नैनीताल जाने देने के लिए घर वालों को मनाने का संदेश लिखा और उसको जेब में डाल कर बाहर निकल गया... जैसे तैसे वो पूछ्ता हुआ नीरू के घर के पास पहुँच गया.. वहाँ एक औरत नलके पर पानी भर रही थी.. वासू घर पूछ्ने के लिए उसके पास ही पहुँच गया," देवी जी, यहाँ आसपास एक लड़की का घर है.. नीरू का.. आप कृपा करके बता देंगी कौनसा है..?"

झुक कर पानी भर रही और तपाक से सीधी खड़ी हुई और वासू को उपर से नीचे तक घूरा," रे, कौन से तू? छ्होरी के बारे में क्यूँ पूच्छ रहा से?"

वासू उस औरत के बोलने का लहज़ा सुनकर घबरा गया," जी.. आप बात को अन्यथा ना लें.. मैं वासू हूँ.. वासू शास्त्री!"

" शास्त्री वस्त्री होगा अपने घर में.. पॅलिया ये बता काम के है तनने लड़की से? शरम नही आंदी इस तरह लड़की का घर पूछ्ति हां.." ( पहले ये बता काम क्या है लड़की से.. शरम नही आती इश्स तरह लड़की का घर पूचहते हुए ), औरत तमतमा गयी थी..

" जी.. मुझे कन्या से कोई काम नही.. कन्या की माता जी से काम है.. आप कृपा करके घर बता दें बस!" वासू विचलित होते हुए बोला...

" हाए.. मेरे ते के काम होगया तंन ओहो! मुझसे क्या काम हो गया आपको..तू है कौन भाई " औरत का मिज़ाज कुच्छ नरम पड़ा...

वासू को ना निगलते बना ना उगलते.. उसकी हालत खराब हो गयी.." त्त.. तो. क्या आप उनकी माता जी हैं..?"

" और नि तो के ? मा सू मैं नीरू की.. (और नही तो क्या? मा हूँ मैं उसकी) पर तू कौन से?" औरत ने जवाब दिया..," बता के काम था?"

" ज्जई नमस्ते.. माता जी.. मैं वासू.. उनका गणित का अद्धयापक हूँ.." आगे उसको सूझा ही नही.. जो ये बोलता कि काम क्या था..! औरत ने तो उसके मुँह पर ताला ही लगा दिया था...

" ओहो.. ते मास्टर जी.. पहलया बताना था ना.. ( ओहो.. तो मास्टर जी पहले बताना चाहिए था ना) मैं तुझे कुच्छ उल्टा सीधा तो ना कहती.. मैं जाने के के सोच गी थी.. बता बेटा.. के काम था..." औरत का लहज़ा एक्दुम बदल गया...

" ज्जई.. वो.. दूध.. नही.. मतलब दूध के बारे में पूच्छना था.. नीरू ने बताया था की आपकी भैंसे दूध देती हैं..."

" आ नीरू! बाहर आइए एक बार.." औरत ने आवाज़ लगाई...

पास के ही घर से नीरू बाहर निकली और वासू को वहाँ खड़े देखकर बुरी तरह सकपका गयी.. मन ही मन सोचा," इन्होने तो रात को आने को बोला था.. ये तो दिन में ही टपक पड़ा...," नमस्ते सर!" उसने अपने आप पर काबू में किया...

" नमस्ते की बच्ची.. तनने मास्टर को झूठ क्यूँ बोला.. कौनसी भैंस दूध देवे से आपनी.. मास्टर जी.. इसके मुँह से ग़लती ते लिकड़ (निकल) गया होगा.. म्हारे घर दूध नही होता..." औरत ने आख़िरी लाइन वासू की और से देखते हुए कही थी...

" चलो कोई बात नही.. मैं और किसी से पूच्छ लूँगा.. हां नीरू.. वो.. दिशा कह रही थी.. तुम्हे बता दूँ.. आज रात ही नैनीताल के लिए टूर जा रहा है.. तुम्हे जाना हो तो.." वासू ने जिंदगी में पहली बार इशारा करने के लिए अपनी एक आँख को मटकाया.. वो भी लड़की की तरफ..

नीरू समझ गयी.. और खुश भी हो गयी..," ठीक है सर.. मैं दिशा से मिलने जा रही हूँ.. अभी.. मम्मी.. मैं टूर पर चली जाउ ना?"

" मुझे ना पता ! ये बात अपने पापा से पूच्छ लिए..."

" उन्होने तो हां कर दी थी मम्मी.. "

" तो फेर चली जाइए... मेरे ते क्यूँ पूच्छ री से....

" आजा मास्टर जी.. घर आजा.. दूध तो नही है.. पर चाय तो पीला ही देवेंगे...

" जी.. बहुत बहुत धन्यवाद.. अभी ज़रा जल्दी में हूँ.. फिर कभी.." कहकर वासू, दिशा के घर चल दी नीरू के पिछे निकल लिया.....
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Reply
11-26-2017, 02:04 PM,
#94
RE: College Sex Stories गर्ल्स स्कूल
गर्ल्स स्कूल पार्ट --52

गली में कुच्छ आगे निकल जाने के बाद नीरू ने पिछे मुड़कर देखा.. वासू उसके पिछे पिछे जैसे उसको सून्घ्ता हुआ आ रहा था.. उसने अपनी चल धीमी कर दी और लगभग वासू के साथ साथ चलने लगी," सर! आपको ऐसे नही आना चाहिए था.. मा को शक हो जाता तो?" नीरू ने दायें बायें देखते हुए वासू से कहा...

" तो क्या करता? आज रात वो टूर पर निकल जाते और हम यहीं रह जाते.." वासू ने भी बिना उसको देखे; चलते चलते जवाब दिया..

"हम क्यूँ? आप तो चले ही जाते.." नीरू ने इठलाते हुए अपने बालों को कानो से पिछे किया और वासू की और हौले से मुस्कुराइ...

"तुम्हारे बिना मैं क्या करता वहाँ?" वासू ने जवाब दिया...

नीरू पर पूरी मस्ती च्छाई हुई थी.. वासू को इस तरह अपने लिए मचलते देख वो इतरा गयी," और.. मेरे साथ क्या करेंगे वहाँ?"

"कककुच्छ नही.. मैं क्या करूँगा? म्म्मैने कभी कुच्छ किया है क्या?" वासू चलते हुए नीरू के मादक नितंबों की उठापटक में खोया हुआ था की नीरू के इस द्वियार्थी सवाल ने उसको हड़बड़ाहट में डाल दिया..

नीरू अपनी हँसी नही रोक पाई.. वासू का ये भोलापन ही तो नीरू को ले डूबा था.. वरना तो वो कब की 'जवान' हो चुकी होती..

" एक बात कहूँ..?" वासू ने मौका देखकर कहा...

" जी.. कहिए.." नीरू ने चलते हुए सरक गयी चुननी को ठीक करते हुए कहा..

" नही.. कुच्छ नही.. तुम चलोगि ना?"

" हाँ.. मैं तो पक्का चलून्गि.. पर और कौन कौन जा रहे हैं..?" नीरू ने सवाल किया...

" मुझे तो बस इतना पता है कि तुम जा रही हो.. और मैं जा रहा हूँ.. बाकी तुम उन्ही से पूछ लेना.. अच्च्छा.. चलने का समय अच्छी तरह याद रखना और टाइम से पहले पहुँच जाना.. भूल मत जाना..!" वासू बेचैनी से बोला, घर आ गया था...

" जी.." नीरू ने एक बार सरसरी निगाह वासू के प्यारे चेहरे पर डाली और उसने अपनी चल तेज कर दी..

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शाम के करीब 7 बाज चुके थे... सब अपने अपने समान की पॅकिंग में लगे थे..

" जीजू कब आ रहे हैं दीदी.." वाणी से सब्र नही हो पा रहा था.. उसका मनु जो उसके साथ आने वाला था..

" आने ही वाले होंगे.. कह रहे थे 10 मिनिट का रास्ता और..." दिशा को वाणी ने बात भी पूरी ना करने दी..

" आ गये... कहते हुए वा दरवाजे की और भागी.. पर अचानक ही दरवाजे से कुछ पहले ठिठक कर रुक गयी.. वापस भाग कर आईने के सामने गयी और खुद को उपर से नीचे तक देखा... प्यार ऐसा ही होता है.. वरना वाणी की तारफ़ कोई आईना क्या करता.. वह तो खुद दर्पण थी.. सौंदर्या का.. सन्तुस्त होने पर वह बाहर की और भागी और दरवाजे पर जाकर मायूसी से खड़ी हो गयी," ववो.. कहाँ है?"

शमशेर ने उसके पास आते हुए प्यार से उसके गालों पर थपकी दी," वो कौन वाणी?"

" वववो.. वो.. मानसी!" वाणी अपनी ज़ुबान फिसलने से मुस्किल से रोक पाई..

" इसने तो यही बताया था कि यही मानसी है.. ये मानसी नही है क्या?" शमशेर ने हंसते हुए वाणी के सामने ही खड़ी मानसी की और इशारा करते हुए कहा...

" ओह.. हाँ.. म्मुझे दिखाई नही दी थी..!" वाणी ने झेन्पते हुए मानसी को बुझे मन से गले लगाया और अंदर आ गयी.. अचानक ही उसका सारा जोश ठंडा पड़ गया..

" इनके बारे में नही पूछोगि? ये शालिनी है..! हमारे साथ टूर पर चलेगी..!" शमशेर ने वाणी का हाथ पकड़ते हुए कहा...

" मुझे नही चलना टूर पर.. मेरा सिर दर्द कर रहा है.. जाओ.. सब चले जाओ.. मुझे अकेली छ्चोड़कर..." वाणी को तो बस यही आता था.. रूठ कर अपनी आँखों से ही रूठने का मतलब समझाना और ज़िद पूरी होने तक हड़ताल पर बैठे रहना...

तभी दिशा अंदर से पानी लेकर आ गयी.. शमशेर के साथ नज़रें मिली.. दोनो ने आँखों ही आँखों में जुदाई की तड़प से एक दूसरे को अवगत कराया और हौले से मुस्कुरकर दिशा अंदर चली गयी...

" क्या हुआ वाणी? अभी तो तू फोन पर मुझे चहक चहक कर गाना गाकर सुना रही थी.. अभी अचानक क्या हो गया तुझे.." मानसी ने वाणी के सिर पर हाथ लगाकर देखा," सिर तो ठंडा है तेरा.. फिर सिरदर्द?"

" मुझे किसी से बात नही करनी.. सब टूर पर जाओ.. मज़े करो.. मैं अकेली यहाँ पड़ी रहूंगी..." वाणी ने मुँह फुलाते हुए मानसी का हाथ अपने सिर से हटा दिया..

उस'से कुच्छ दूर बैठी शालिनी उठकर उसके पास आई..," कितनी प्यारी हो तुम.. किस बात पर गुस्सा हो यार..!"

वाणी ने अपना नीचे वाला होंठ बाहर निकाल कर एक बार उसको घूरा और फिर ये सोचकर की इस बेचारी का क्या कुसूर; वह अपना दर्द उसके साथ बाँटने को राज़ी हो गयी," सभी ऐसा ही कहते रहते हैं दीदी.. पर सब मुझे सताने में लगे रहते हैं.. सब सोचते रहते हैं की कैसे वाणी को गुस्सा दिलाया जाए.. सब मुझे तंग करते हैं दीदी.. कोई मुझसे प्यार नही करता..." कहते हुए वाणी ने उसका हाथ पकड़ कर अपने साथ बैठा लिया...

उसकी मासूम शिकायत सुनकर शालिनी भी बिना मुस्कुराए ना रह सकी..," बात क्या है? बताओ तो सही?"

वाणी कुच्छ नही बोली .. यूँही अचानक वाणी की नज़र उसकी उंगलियों पर पड़ी.. और वो एक पल को सब कुच्छ भूल गयी," हाए दीदी.. कितनी प्यारी रिंग है.. कहाँ से ली?"

" पता नही.. गिफ्टेड है!" शालिनी ने जवाब दिया...

"किसने... अच्च्छा समझ गयी.." फिर शालिनी के कान के पास मुँह लाकर हौले से कहा," क्या नाम है?"

शालिनी ने भी उसके अंदाज में ही उत्तर दिया.. उसके कान में बोला," रोहित!"

" अच्च्छा! शालिनी का सीक्रेट जानकार वाणी बहुत खुश हुई.. पर अगले ही पल उसको 'अपना' सीक्रेट याद आ गया और फिर से उसका पारा चढ़ गया..," जब आप दोनो में लड़ाई होती है तो आप क्या करती हैं?" वाणी ऐसा ही कुच्छ करने का सोच रही थी..

शालिनी खिलखिलाकर हंस पड़ी और फिर उसके कान में कहा," ग़ाली देती हूँ.. और क्या?"

"क्या गाली देती हो?" कानो ही कानो में गुफ्तगू जारी थी..

" उम्म्म्ममम" शालिनी ने यूँही कोई गाली सोची और फिर उसके कान में कह दिया..," साला!"

" हूंम्म्ममम!" वाणी ने गाली रट ली... तभी मानसी के द्वारा कही गयी बात ने उसका खोया नूवर फिर से वापस ला दिया," बाहर वाले घर चलें वाणी.. मुझे भैया से कुच्छ काम है...!"

" क्याअ? कहाँ.. मनु भी आया है क्या?" वाणी खिल उठी...

" तुम तो ऐसे पूच्छ रही हो जैसे वो बिना बुलाए ही आ गया हो.. बुलाया नही था क्या?" मानसी ने मुस्कुराते हुए कहा...

" मैने नही बुलाया किसी को.. दीदी ने बुलाया होगा... चलो चलते हैं..!" सब कुच्छ भूलकर वाणी उसको बाहर खींच कर ले गयी....

"स्नेहा! देखो कौन आया है? अंजलि ने खोई खोई सी स्नेहा को एक अग्यात रोमांच से भर दिया. 'कहीं वही तो नही' सोच कर उसका दिल झूम उठा और वह अपने आप को तेज़ी के साथ पिछे मुड़ने से रोक ना सकी.. विकी अंजलि के पिछे खड़ा प्यासी निगाहों से उसको ताक रहा था.. निगाहों में तन की भूखी वासना की प्यास नही थी, बुल्की स्नेहा की आँखों में उसके लिए फिर से वही प्यार, वही ज़ज्बात देखने की प्यास थी

" मोहन!!!! सॉरी... विकी आप? आप कैसे आ गये?" भाग कर उसके गले से जा चिपकने को स्नेहा का पूरा बदन बेचैन हो उठा.. पर बीच में अंजलि खड़ी थी.. वह अवाक नेत्रों से उसको देखती रह गयी..

"तुम बातें करो! मैं आती हूँ.." स्नेहा के तन-मन में उठे उफान को भाँप कर अंजलि वहाँ से खिसक ली...

"स्नेहा!.." विकी की आँखें भर आई.. वह अब भी उसको यूँ ही एकटक देख रहा था.. बिना पलकें झपकाए..

"हूंम्म.." 2 कदम आयेज बढ़ कर स्नेहा फिर ठिठक गयी.. वा विकी को बाहें फैलाकर उसको पुकारते हुए देखना चाहती थी..

" तुम मेरे बिना रह लॉगी!" विकी ने वहीं खड़े खड़े उल्टे बाँस बरेली की तर्ज़ पर सवाल किया..

" पर तुम.." स्नेहा के मुँह से इतना ही निकला..

" मैं तुम्हारे बिना नही रह सकता सानू.. इतनी ही देर में मैने जान लिया... अब तुम्हारे बिना मन नही लगता.. लगता है जैसे सब कुच्छ खो दूँगा.... अगर तुम्हे खो दिया तो.. मुझे माफ़ कर दो ना.. मुझे तुम्हारी ज़रूरत है.. तुम मेरे पास क्यूँ नही आ जाती..." विकी बोलता चला जा रहा था.. स्नेहा के लिए अब और सहन करना मुश्किल था.. वह तो पहले ही तड़प रही थी.. जाकर विकी के शरीर से जा लिपटी.. और बच्चों की तरह बिलखने लगी," तुमने बुलाया ही कब था.. मैं तो प्यार किया था मोहन... अब तुम्ही विकी हो गये तो मैं क्या करती.. बताओ!" स्नेहा उसके सीने पर सिर रखे उसमें सिमट-ती जा रही थी...

" मुझे आज अहसास हो गया सानू! मुझमें भी ज़ज्बात हैं.. मैं अपने या अपनो के अरमानो का गला नही घोट सकता.. मुझे जीना है.. जीकर देखना है.. तुम्हारे साथ.. मैने फ़ैसला किया है.. अगर तुम मेरा साथ दोगि तो...." विकी के रुक रुक कर बोलते होंठों पर जैसे ताला लग गया.. स्नेहा ने अपने लारजते होंतों से उसकी बोलती बंद कर दी.. दोनों सब कुच्छ भूल कर एक दूसरे में खो गये.. स्नेहा ने जनम जनम उसका साथ देने का एलान कर दिया..

अचानक दरवाजे पर 'खांसने' की आवाज़ के साथ दोनो एकद्ूम छितक कर एक दूसरे से दूर हो गये.. बेडरूम के दरवाजे पर खड़ी नीरू बाहर देखते हुए मुस्कुरा रही थी..

"सॉरी! मुझे पता नही था कि...." नीरू के चेहरे पर शरारती मुस्कान थी..," मैं आ गयी.. कब चलना है?" उन्न दोनो को इतनी आत्मीयता से एक दूसरे में खोए देखकर नीरू के पूरे बदन में साँप सा रेंग गया...

" वो.. हमें क्या पता.. म्मै तो इनकी आँख से कुच्छ निकाल रही थी.. बाहर किसी को पता होगा.." स्नेहा ने हड़बड़ते हुए कहा...

"अंधेरे में ही?" हंसकर नीरू बाहर निकल गयी.. दोनो ने एक दूसरे की आँखों में देखा.. हंस पड़े और फिर एक दूसरे से चिपक गये...

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वाणी ने दनदनाते हुए गौरी के घर प्रवेश किया.. मासूम सा गुस्सा झल्काती उसकी आँखें कुच्छ ढूँढ रही थी.. और जब वो उसको दिख गया तो पल भर के लिए उस'से नज़रें चार की और अपनी गर्दन मॅटकाते हुए वापस बाहर जाकर खड़ी हो गयी...

मनु उसके चेहरे पर इतने गरम तेवर देखकर सकपका गया.. साथ बैठे अमित को 'एक मिनिट' बोल कर वा उसके पिछे बाहर निकल गया.. वहाँ वाणी और मानसी.. दोनो खड़ी थी..

" हाई वाणी!" मनु ने झिझकते हुए बोला..

वाणी अपने कंधे उचका कर थोडा सा और घूम गयी.. उस'से दूसरी ओर...," क्या है?"

"कुच्छ नही.. बस 'ही' बोल रहा हूँ.. तुम कुच्छ गुस्से में लग रही हो.. क्या बात है.. मुझे आना नही चाहिए था क्या?" मनु ने अपनी मानसी की और देखते हुए बत्तीसी निकाली.. ताकि मानसी को कोई शक ना हो.. कि मामला गंभीर है...

" नही .. तुम्हे बिल्कुल नही आना चाहिए था.. क्यूँ आ गये तुम.. हम पर तो बहुत बड़ा अहसान कर दिया ना!" वाणी ने व्यंगया बानो की बौछर कर दी.. दूसरी और देखते हुए ही..

मनु ने मानसी की और देख कर अपनी बत्तीसी निकाल दी.. ताकि मानसी को शक़ ना हो.. की मामला गड़बड़ है..

पर इशक़ और मुश्क़ भी कभी छिपने से छिपे हैं क्या.. चाहे कोई कितना ही बड़ा तुर्रमखाँ क्यूँ ना हो.. और यहाँ तो दोनो अनाड़ी थे.. मानसी हतप्रभ सी बार बार दोनो की आँखों में देखती रही.. विस्मित सी.. कि क्या.. जो वो सोच रही है.. सच है? हां.. सच ही तो है... दोनो की ही आँखों में उसको प्रेम के डोरे तैरते दिखाई दिए.. वाणी के गुस्से में भी असीम प्यार था तो मनु की 'बत्तीसी' दिखाने का अंदाज भी बिल्कुल नया था.. जैसे पकड़े जाने के डर से खिसिया गया हो..

" मैं आती हूँ.. " कहकर मानसी ने अंदर जाते हुए मनु की तरफ शरारत से आँखें मटकाई और दोनो को फ़ुर्सत के चंद लम्हे देते हुए वहाँ से अलग हो गयी....

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साधू सा आलाप कर लेता हूँ ,

मंदिर जाकर जाप भी कर लेता हूँ ..

मानव से देव ना बन जाऊं कहीं,,,,

बस यही सोचकर थोडा सा पाप भी कर लेता हूँ

आपका दोस्त

राज शर्मा

(¨`·.·´¨) Always

`·.¸(¨`·.·´¨) Keep Loving &

(¨`·.·´¨)¸.·´ Keep Smiling !

`·.¸.·´ -- raj

girls school--52

Gali mein kuchh aage nikal jane ke baad Neeru ne pichhe mudkar dekha.. Vasu uske pichhe pichhe jaise usko soonghta hua aa raha tha.. usne apni chal dheemi kar di aur lagbhag Vasu ke sath sath chalne lagi," Sir! aapko aise nahi aana chahiye tha.. Maa ko shak ho jata toh?" Neeru ne dayein bayein dekhte huye Vasu se kaha...

" Toh kya karta? aaj Rat wo tour par nikal jate aur hum yahin rah jate.." Vasu ne bhi bina usko dekhe; chalte chalte jawab diya..

"hum kyun? aap toh chale hi jate.." Neeru ne ithlate huye apne balon ko kaano se pichhe kiya aur Vasu ki aur houle se Muskurayi...

"Tumhare bina main kya karta wahan?" Vasu ne jawab diya...

Neeru par poori masti chhayi huyi thi.. Vasu ko iss tarah apne liye machalte dekh wo itra gayi," aur.. mere Sath kya karenge wahan?"

"kkkuchh nahi.. main kya karoonga? mmmaine kabhi kuchh kiya hai kya?" Vasu chalte huye Neeru ke madak nitambon ki uthapatak mein khoya hua tha ki Neeru ke iss dwiarthi sawaal ne usko hadbadahat mein daal diya..

Neeru apni hansi nahi rok payi.. Vasu ka ye bholapan hi toh Neeru ko le dooba tha.. warna toh wo kab ki 'jawan' ho chuki hoti..

" ek baat kahoon..?" Vasu ne mouka dekhkar kaha...

" Ji.. kahiye.." Neeru ne chalte huye sarak gayi chunni ko theek karte huye kaha..

" nahi.. kuchh nahi.. tum chalogi na?"

" Haan.. main toh pakka chaloongi.. par aur koun koun ja rahe hain..?" Neeru ne sawal kiya...

" Mujhe toh bus itna pata hai ki tum ja rahi ho.. aur main ja raha hoon.. baki tum unhi se poochh lena.. achchha.. chalne ka samay achchi tarah yaad rakhna aur time se pahle pahunch jana.. bhool mat jana..!" Vasu bechaini se bola, ghar aa gaya tha...

" Ji.." Neeru ne ek baar sarsari nigah Vasu ke pyare chehre par dali aur usne apni chal tej kar di..

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Sham ke kareeb 7 baj chuke the... sab apne apne saman ki packing mein lage the..

" Jiju kab aa rahe hain didi.." Vani se sabra nahi ho pa raha tha.. uska Manu jo uske sath aane wala tha..

" aane hi wale honge.. kah rahe the 10 minute ka rasta aur..." Disha ko Vani ne baat bhi poori na karne di..

" aa gaye... kahte huye wah darwaje ki aur bhagi.. par achanak hi darwaje se kuchh pahle thithak kar ruk gayi.. wapas bhag kar aaine ke saamne gayi aur khud ko upar se neeche tak dekha... pyar aisa hi hota hai.. warna Vani ki taaraf koyi aaina kya karta.. wah toh khud darpan thi.. soundarya ka.. santust hone par wah bahar ki aur bhagi aur darwaje par jakar mayusi se khadi ho gayi," wwo.. kahan hai?"

Shamsher ne uske paas aate huye pyar se uske Gaalon par thapki di," Wo Koun Vani?"

" Wwwo.. wo.. Manasi!" Vani apni juban fisalne se muskil se rok payi..

" Isne toh yahi bataya tha ki yahi Manasi hai.. Ye Manasi nahi hai kya?" Shamsher ne hanste huye Vani ke Samne hi khadi Manasi ki aur ishara karte huye kaha...

" oh.. haan.. mmujhe dikhayi nahi di thi..!" Vani ne jhenpte huye Manasi ko bujhe man se gale lagaya aur andar aa gayi.. achanak hi uska sara josh thanda pad gaya..

" Inke baare mein nahi poochhogi? ye Shalini hai..! hamare sath tour par chalegi..!" Shamsher ne Vani ka hath pakadte huye kaha...

" Mujhe nahi chalna tour par.. mera sir dard kar raha hai.. jao.. sab chale jao.. mujhe akeli chhodkar..." Vani ko toh bus yahi aata tha.. rooth kar apni aankhon se hi roothne ka matlab samjhana aur jid poori hone tak hadtaal par baithe rahna...

Tabhi Disha andar se pani lekar aa gayi.. Shamsher ke sath najarein mili.. dono ne aankhon hi aankhon mein judayi ki tadap se ek dusre ko awagat karaya aur houle se muskurakar Disha andar chali gayi...

" Kya hua Vani? abhi toh tu fone par mujhe chahak chahak kar gana gakar suna rahi thi.. abhi achanak kya ho gaya tujhe.." Manasi ne Vani ke sir par hath lagakar dekha," Sir toh thanda hai tera.. fir Sirdard?"

" Mujhe kisi se baat nahi karni.. sab tour par jao.. maje karo.. main akeli yahan padi rahungi..." Vani ne munh fulate huye Manasi ka hath apne sir se hata diya..

uss'se kuchh door baithi shalini uthkar uske paas aayi..," kitni pyari ho tum.. kis baat par gussa ho yaar..!"

Vani ne apna neeche wala hont bahar nikal kar ek baar usko ghoora aur fir ye sochkar ki iss bechari ka kya kusoor; wah apna dard uske sath baantne ko razi ho gayi," Sabhi aisa hi kahte rahte hain didi.. par sab mujhe sataane mein lage rahte hain.. sab sochte rahte hain ki kaise Vani ko gussa dilaya jaye.. sab mujhe tang karte hain didi.. koyi mujhse pyar nahi karta..." Kahte huye vani ne uska hath pakad kar apne sath baitha liya...

Uski masoom shikayat sunkar Shalini bhi bina muskuraye na rah saki..," Baat kya hai? batao toh sahi?"

Vani kuchh nahi boli .. yunhi achanak Vani ki najar uski ungaliyon par padi.. aur wo ek pal ko sab kuchh bhool gayi," Haye Didi.. kitni pyari ring hai.. kahan se li?"

" pata nahi.. Gifted hai!" Shalini ne jawab diya...

"Kisne... achchha samajh gayi.." fir Shalini ke kaan ke paas munh lakar houle se kaha," Kya Naam hai?"

Shalini ne bhi uske andaj mein hi uttar diya.. uske kaan mein bola," Rohit!"

" Achchha! Shalini ka secret jaankar Vani bahut khush huyi.. par agle hi pal usko 'apna' secret yaad aa gaya aur fir se uska para chadh gaya..," jab aap dono mein ladayi hoti hai toh aap kya karti hain?" Vani aisa hi kuchh karne ka soch rahi thi..

Shalini khilkhilakar hans padi aur fir uske kaan mein kaha," Gali deti hoon.. aur kya?"

"Kya gali deti ho?" kano hi kano mein guftgoo jari thi..

" Ummmmmm" Shalini ne yunhi koyi gali sochi aur fir uske kaan mein kah diya..," Sala!"

" Hummmmmm!" Vani ne Gali rat li... tabhi Manasi ke dwara kahi gayi baat ne uska khoya noor fir se wapas la diya," bahar wale ghar chalein Vani.. Mujhe bhaiya se kuchh kaam hai...!"

" kyaaa? kahan.. Manu bhi aaya hai kya?" Vani khil uthi...

" tum toh aise poochh rahi ho jaise wo bina bulaye hi aa gaya ho.. bulaya nahi tha kya?" Manasi ne muskurate huye kaha...

" maine nahi bulaya kisi ko.. didi ne bulaya hoga... chalo chalte hain..!" Sab kuchh bhulakar Vani usko bahar kheench kar le gayi....

"Sneha! dekho koun aaya hai? Anjali ne khoyi khoyi si Sneha ko ek agyaat romanch se bhar diya. 'kahin wahi toh nahi' soch kar uska dil jhoom utha aur wah apne aap ko teji ke sath pichhe mudne se rok na saki.. Vicky Anjali ke pichhe khada pyasi nigahon se usko taak raha tha.. Nigahon mein Tan ki bhookhi Wasna ki pyas nahi thi, bulki Sneha ki aankhon mein uske liye fir se wahi pyar, wahi jajbat dekhne ki pyas thi

" Mohan!!!! sorry... Vicky aap? Aap kaise aa gaye?" Bhag kar uske gale se ja chipakne ko Sneha ka poora badan bechain ho utha.. par beech mein Anjali khadi thi.. wah awak netron se usko dekhti rah gayi..

"Tum baatein karo! main aati hoon.." Sneha ke tan-man mein uthe ufaan ko bhanp kar Anjali wahan se khisak li...

"Sneha!.." Vicky ki aankhein bhar aayi.. Wah ab bhi usko yun hi ektak dekh raha tha.. bina palkein jhapkaye..

"Hummm.." 2 kadam aage badh kar Sneha fir thithak gayi.. wah Vicky ko baahein failakar usko pukarte huye dekhna chahti thi..

" Tum mere bina rah logi!" Vicky ne wahin khade khade ulte baans bareli ki tarz par sawaal kiya..

" Par tum.." Sneha ke munh se itna hi nikla..

" Main tumhare bina nahi rah sakta Sanu.. itni hi der mein maine jaan liya... ab tumhare bina man nahi lagta.. lagta hai jaise sab kuchh kho doonga.... agar tumhe kho diya toh.. mujhe maaf kar do na.. mujhe tumhari jarurat hai.. tum mere paas kyun nahi aa jati..." Vicky bolta chala ja raha tha.. Sneha ke liye ab aur sahan karna mushkil tha.. wah toh pahle hi tadap rahi thi.. jakar Vicky ke shareer se ja lipti.. aur bachchon ki tarah bilakhne lagi," tumne bulaya hi kab tha.. Main toh pyar kiya tha Mohan... ab tumhi Vicky ho gaye toh main kya karti.. batao!" Sneha uske seene par sir rakhe usmein simat-ti ja rahi thi...

" Mujhe aaj ahsaas ho gaya Sanu! Mujhmein bhi jajbat hain.. main apne ya apno ke armaano ka gala nahi ghot sakta.. mujhe jeena hai.. jikar dekhna hai.. tumhare sath.. Maine faisla kiya hai.. agar tum mera sath dogi toh...." Vicky ke ruk ruk kar bolte honton par jaise tala lag gaya.. Sneha ne apne larjate honton se uski bolti band kar di.. donon sab kuchh bhool kar ek dusre mein kho gaye.. Sneha ne janam janam uska sath dene ka elaan kar diya..

Achanak darwaje par 'khansne' ki aawaj ke sath dono ekdum chhitak kar ek dusre se door ho gaye.. Bedroom ke darwaje par khadi Neeru bahar dekhte huye muskura rahi thi..

"sorry! Mujhe pata nahi tha ki...." Neeru ke chehre par shararati Muskaan thi..," Main aa gayi.. kab chalna hai?" unn dono ko itni aatmiyata se ek dusre mein khoye dekhkar Neeru ke poore badan mein saanp sa reng gaya...

" wo.. hamein kya pata.. mmain toh inki aankh se kuchh nikal rahi thi.. bahar kisi ko pata hoga.." Sneha ne hadbadate huye kaha...

"Andhere mein hi?" Hanskar Neeru bahar nikal gayi.. dono ne ek dusre ki aankhon mein dekha.. hans pade aur fir ek dusre se chipak gaye...

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Vani ne dandanate huye Gouri ke ghar pravesh kiya.. Masoom sa gussa jhalkati uski aankhein kuchh dhoondh rahi thi.. aur jab wo usko dikh gaya toh pal bhar ke liye uss'se najarein char ki aur apni gardan matkate huye wapas bahar jakar khadi ho gayi...

Manu uske chehre par itne garam tewar dekhkar sakpaka gaya.. Sath baithe Amit ko 'ek minute' bol kar wah uske pichhe bahar nikal gaya.. wahan Vani aur Manasi.. dono khadi thi..

" Hi Vani!" Manu ne jhijhakte huye bola..

Vani apne kandhe uchaka kar thoda sa aur ghoom gayi.. uss'se dusri aur...," kya hai?"

"kuchh nahi.. bus 'hi' bol raha hoon.. tum kuchh gusse mein lag rahi ho.. kya baat hai.. Mujhe aana nahi chahiye tha kya?" Manu ne apni Mansi ki aur dekhte huye batteesi nikali.. taki Manasi ko koyi shak na ho.. ki maamla gambheer hai...

" nahi .. tumhe bilkul nahi aana chahiye tha.. kyun aa gaye tum.. hum par toh bahut bada ahsaan kar diya na!" Vani ne vyangya bano ki bouchhar kar di.. dusri aur dekhte huye hi..

Manu ne Manasi ki aur dekh kar apni batteesi nikal di.. taki Manasi ko shaq na ho.. ki maamla gadbad hai..

par ishaq aur mushq bhi kabhi chhipane se chhipe hain kya.. chahe koyi kitna hi bada turramkhan kyun na ho.. aur yahan toh dono anadi the.. Mansi hatprabh si baar baar dono ki aankhon mein dekhti rahi.. vismit si.. ki kya.. jo wo soch rahi hai.. sach hai? haan.. sach hi toh hai... dono ki hi aankhon mein usko prem ke dore tairte dikhayi diye.. Vani ke gusse mein bhi aseem pyar tha toh Manu ki 'batteesi' dikhane ka andaj bhi bilkul naya tha.. jaise pakde jaane ke dar se khisiya gaya ho..

" Main aati hoon.. " kahkar Manasi ne andar jate huye Manu ki taraf shararat se aankhein matkayi aur dono ko fursat ke chand lamhe dete huye wahan se alag ho gayi....

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Reply
11-26-2017, 02:04 PM,
#95
RE: College Sex Stories गर्ल्स स्कूल
गर्ल्स स्कूल पार्ट --53

वो.. मैं तुम्हारी खातिर ही तो आया हूँ.. तुम मुँह फुलाए क्यूँ खड़ी हो..?" मानसी के जाते ही मनु वाणी के आगे नतमस्तक होता हुआ सा बोला...

" मेरे लिए क्यूँ आए हो? तुम तो गौरी के लिए आए हो.. तभी तो यहीं पर रुक गये.. सीधे घर नही आ सकते थे क्या?" वाणी ने अपने दर्द को सीने से बाहर निकाला..

"क्या? मैं.. और गौरी के लिए.. मुझे उस'से क्या मतलब है.. मैं तो सीधा वहीं आना चाहता था.. पर जब वो.. विकी जी यहाँ उतरे तो अमित ने मुझे भी यहीं उतार लिया... मुझे जाने ही नही दिया.. फिर मैं क्या कहता.. नही.. मुझे तो वाणी के पास जाना है.. ये?"

" अमित भी आया है क्या? पर उसको किसने बुलाया?" वाणी हैरान होकर मनु की और मूडी..

" किसी ने नही.. जब मैने उसको ये बताया की मैं टूर पर जा रहा हूँ तो पूच्छने लगा की कौन कौन जा रहे हैं... फिर गौरी का नाम लेते ही ज़िद पकड़ गया.. मुझे भी चलना है.. मैने दिशा से पूछा और उन्होने हाँ कर दी.."

" चलो अच्च्छा हुआ.. अब तुम और गौरी आपस में बात नही करोगे..."

" मैं कब करता हूँ उस'से बात.. तुम तो यूँही..." मनु मन ही मन मुस्कुरा रहा था.. लड़की के प्यार की पहचान उसकी जलन से ही तो होती है...

" बात नही की तो क्या? तुम उस दिन उसकी तरफ देख रहे थे.. केयी बार देखा था.. मुझे पता है.. अब की बार देखा तो मैं तुमसे बात नही करूँगी हाँ!"

"ओफ्फो.. पता नही किन किन बातों को लेकर बैठ जाती हो.. चलो.. अब अंदर चलें.. खम्खा लोग जाने क्या क्या सोचेंगे...?" मनु ने उसको अंदर चलने का इशारा किया...

वाणी ने 2 पल उसकी आँखों में आँखें डाली और मुस्कुरा पड़ी.. मनु तो आँख बंद करके विस्वास करने लायक था.. वो तो बस यूँही....

वाणी उसके पिछे पिछे चल पड़ी...

" तुम भी आ गये अमित! पहले कहाँ थे.." वाणी ने जाते ही अमित से सवाल किया..

" हाँ आ तो गया हूँ.. पर शायद किसी को दिखाई ही नही दे रहा.." अमित ने पास से गुजर रही गौरी को देख कर कॉमेंट किया.. पता नही क्या वजह थी.. पर गौरी उस'से जानबूझ कर नज़रे चुरा रही थी.. या फिर तरसा रही थी.. भगवान जाने.. पर जब से अमित वहाँ बैठा हुआ था.. गौरी रह रह कर इठलाती हुई उसके सामने से गुजर रही थी.. पर उस पर ध्यान ना देने का नाटक कर रही थी...

तभी वहाँ पर वासू जी का आगमन हुआ.. गौरी, दिशा, वाणी आदि ने जब उनको प्रणाम किया तो सब लड़कों ने भी खड़े होकर हाथ जोड़ लिए...

" नमस्कार जी सबको मेरा नमस्कार.. हो गयी तैयारियाँ या अभी कुच्छ बाकी है..." वासू की नज़रें अंदर आते ही नीरू को ढूँढने लगी...

" हां.. सर.. सभी आ गये हैं.. बस अब चलते ही होंगे.. लीजिए आप पानी लीजिए.." गौरी ने वासू की तरफ ट्रे बढ़ाते हुए कहा...

वासू का माथा ठनका..," क्या? सब आ गये? नीरू.. ववो.. मतलब नीर का सेवेन तो मैं ठहर कर करूँगा.. सब आ गये हैं ना...!" वासू ने खुद को संभाला..

" हां.. लगभग सभी आ गये हैं सर.. बस गाँव से कुच्छ लड़कियाँ रहती हैं.. वो भी आती ही होंगी.." वासू के 'नीरू' कहने से गौरी को याद आया.. नीरू, नेहा, सरिता, दिव्या, रेणु, आरज़ू और सोनिया अभी आई नही हैं....

गौरी ने मुश्किल से अपनी बात पूरी की ही थी की उन्न सभी लड़कियों ने अपने अपने बॅग लिए घर में कदम रखा...

" अर्रे.. यहाँ तो बड़ी रौनक लगी हुई है... मैने तो सोचा था कि 5-7 लड़कियाँ ही जा रही हैं बस.. यहाँ तो.." सरिता ने आते ही एक एक करके सभी लड़कों की और कामुक नज़रों से देखते हुए कहा.. उसकी तो ऐश हो गयी.. वहाँ का माहौल देखते ही...

उसकी इस अदा पर लड़कियाँ तो लड़कियाँ लड़के भी बग्लें झाँकने लगे... उसकी आँखों के साथ उसके हाव भाव से सॉफ पता चल सकता था कि वो 'खेली खाई' लड़की है..

वासू की आँखें नीरू को देखते ही चमक उठी," अब चला जाए.. यहाँ बैठे बैठे क्या करेंगे.. बहुत लंबा रास्ता है...

" जी अभी मैं उनको फोन करती हूँ.. बस आई क्यूँ नही... अभी तक!" दिशा ने शमशेर का नंबर. डाइयल किया और अंदर कमरे में निकल गयी...

कमरे में हर तरफ जोश और उमंग की लहरें उठती दिखाई दे रही थी.. सिर्फ़ कमरे में खड़ी आरज़ू, सोनिया और रेणु को छ्चोड़ कर.. आरज़ू और सोनिया को नेहा ज़बरदस्ती ले आई थी और रेणु सरिता के कहने से वहाँ आई थी.. इन सबका इस तरह घर से बाहर निकलने का पहला मौका था.. लड़कों को देखकर ही इनकी जान सी निकली जा रही थी.. कहीं घर वालों को पता लग गया की उनके साथ टूर पर लड़के भी गये थे तो उनकी खैर नही.....

" कितना टाइम लगेगा जीजू, नैनीताल तक जाने में...?" वाणी ने बस के आते ही खुश होकर शमशेर से पूचछा...

" 8-10 घंटे तो लग ही जाएँगे.. क्यूँ?" शमशेर ने उसका बॅग पकड़ते हुए कहा...

" नही कुच्छ नही.. यूँही पूच्छ रही थी.. आ जाओ.. सब चढ़ जाओ बस में.." वाणी ने चिल्लाकर सबको आवाज़ दी...

" लाओ.. तुम्हारा बॅग मैं पकड़ लेती हूँ.." रिया लपक कर वीरू के बॅग के पास पहुँची...

" क्यूँ? राज मर गया है क्या? राज! ये ले.." वीरू ने एक नज़र रिया को घूरा और राज को पुकार कर अपने बॅग की ओर इशारा किया...

" ले चलने दो यार.. बेचारी को.. कितने प्यार से तो कह रही है.." राज ने रिया के अचानक मायूस हो गये चेहरे की और देखते हुए कहा...

" हुन्ह.. बेचारी! तुम्हे बेचारी लगती है ये.. दोपहर से मुझे 'टूटी टाँग' कह कर बुला रही है.. अगर दूसरों क घर ना होता तो इसको बताता की टूटी टाँग कहते किसे हैं.." वीरू बनावटी गुस्से से बोला..

" तो.. तुम भी तो मुझको कह रहे थे की मैं लड़कों की तरह से चलती हूँ.. मैं कुच्छ भी ना बोलूं...?" रिया गुस्से से चिल्ला सी पड़ी...

" चलो चलो.. अपना रास्ता नापो.. मैं राज नही हूँ समझी!" वीरू ने उसको चिडाने में कोई कसर नही छोडी थी..

"मुझे बीच में क्यूँ घसीट रहे हो भाई.. लाओ बॅग इधर दो.." कहते हुए राज ने बॅग उठाया और बाहर निकलने लगा..

"टूटी टाँग.. टूटी टाँग.. टूटी टाँग.." रिया ने कहा और ज़ोर ज़ोर से हंसते हुए बाहर की और भागी...

वीरू जाने क्यूँ दरवाजे की और कुच्छ पल एकटक देखता रहा.. रिया के उसकी आँखों से औझल हो जाने के बाद भी.. और फिर अपने आप ही हँसने लगा," पागल है!"

" कौन पागल है भैया!" स्नेहा ने तैयार होकर बेडरूम से निकलते हुए कहा...

" आअ.. हां.. कुच्छ नही.. वो ऐसे ही.. अब तो बड़ी खुश लग रही हो.. क्या बात है?" वीरू ने बात पलट दी..

स्नेहा और भी खिल उठी.. विकी के उसकी जिंदगी में वापस आते ही उसके चेहरे पर सदा कायम रहने वाला नूर वापस आ गया था," चलो भी अब!"

" हां हां.. जा रहा हूँ.." वीरू ने कहा और बाहर निकल गया...

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सरिता, नेहा और दिव्या जो पिच्छली बार के टूर का कामुक अनुभव याद करके एक बार फिर उसी तरह का आनंद उठाने को तत्पर थी, उनके अरमानो पर पानी सा फिर गया.. वासू जो किसी के बिना कहे ही टूर का प्रायोजक और मार्गदर्शक बन बैठा था, सबसे पहले बस में सवार होकर हर-एक को उसकी सीट बताने लगा था.. नीरू बस में चढ़ने लगी तो उसने उसको रोक दिया," तुम रूको अभी!"

और नीरू शर्मिंदा सी होकर बाहर ही खड़ी रह गयी.. वह तो सबसे पहले चढ़ कर वासू के साथ वाली सीट कब्जा लेना चाहती थी..

बस में चढ़ने वाले लड़कों को उसने पिछे का रास्ता दिखाना शुरू कर दिया.. आगे वाली सीटो में से एक शमशेर और दिशा के लिए रख छोडी और दूसरी अंजलि मेडम और गौरी के लिए.. दूसरे नंबर. की सीटो में से एक तरफ वाली उसने अपने और विकी के लिए रख छ्चोड़ी थी.. और उसके बराबर वाली पता नही किसके लिए.. पर उसस्पर उसने किसी को बैठने ना दिया..

बाकी आने वाली लड़कियों को उसने तीसरी पंक्ति से बिठाना शुरू कर दिया...

" श्रीमान जी.. आप यहाँ आइए!" विकी के बस में चढ़ते ही वासू ने विकी के लिए रिज़र्व रख छ्चोड़ी सीट की और इशारा किया..

"ओह! थॅंक्स शास्त्री जी.." विकी खुश होकर उस पर बैठ गया.. उसने सोचा साथ वाली सीट उसकी स्नेहा के लिए होगी..

उसके बाद बस में चढ़े शमशेर और दिशा को भी उसने उनके लिए निर्धारित सीट बता दी..

" आप क्यूँ कास्ट उठा रहे हैं, वासू जी..? अपने आप ही बैठ जाएँगे सब.. कोई बच्चे थोड़े ही ना हैं.." शमशेर ने मुस्कुराते हुए कहा...

" अजी, इसमें कास्ट की क्या बात है.. इस कार्यक्रम का सारा उत्तर्दयित्तव अंजलि जी ने मुझ पर ही तो डाला हुआ है.. आप दोनो साथ साथ बैठिए.." वासू ने शमशेर की मुश्कूराहट का जवाब दोगुने जोश के साथ दिया..

अंजलि बिना कहे ही शमशेर की बराबर वाली सीट पर आ जमी... और उसके बाद गौरी..

स्नेहा, जो सबसे बाद में आने वालों में से थी, ने उपर चढ़ते ही विकी की और देखा..

" ये मेरे लिए है देवी! आप यहाँ बैठ जाइए.. " बराबर वाली सीट की और इशारा करते हुए वासू ने कहा..

स्नेहा ने मायूस होकर विकी की तरफ देखा तो विकी ने अपना माथा पकड़ लिया.. जाने क्यूँ वासू उनके बीच दीवार बना हुआ था..

कुच्छ जवाब ना पाकर स्नेहा ने वही सीट पकड़ ली जो वासू ने उसको दिखाई थी... विकी के बराबर वाली...

" ओहो.. तुम रह ही गयी थी.. आओ.. उपर आ जाओ!" वासू ने नीचे खड़ी होकर उसके इशारे का इंतज़ार कर रही नीरू को देख कर इश्स प्रकार का नाटक किया जैसे उसको पता ही ना हो की वो नीचे खड़ी है..."

नीरू उपर आ गयी और वासू की और देखने लगी...

"उम्म्म्म.. आप यहाँ बैठ जाइए.. ये सीट खाली ही है.." वासू ने स्नेहा के बराबर वाली सीट की और इशारा करते हुए कहा.. या दूसरे शब्दों में.. अपने बराबर वाली सीट...

" नीरू जब अपने चेहरे पर मुस्कुराहट आने से रोक ना सकी तो उसने अपने मुँह पर हाथ रख लिया..

' तो ये सारा अरेंज्मेंट मेरे लिए ही था..' नीरू ने मन ही मन सोचा और खिल उठी.. उसके मन की मुराद पूरी हो गयी थी... वासू धम्म से अपनी सीट पर जाकर बैठ गया...," चलो चालक महाशय!"

"आ सोना.. ये लड़के कौन हैं यार...?" आरज़ू ने सोनिया के कान के पास अपने होंठ लाते हुए पूचछा... वो दोनो लड़कियों में सबसे पीछे बैठी थी...

" क्या ख्याल है राज़ो? कोई पसंद आ गया क्या?" सोनिया ने हंसते हुए धीरे से उसके कान में ही सवाल का जवाब सवाल से दिया...

"हुन्ह.. मुझे क्यूँ पसंद आएगा.. मैं ऐसी लड़की नही हूँ.. मुझसे ऐसी बकवास तू ना ही कर...!" आरज़ू एक दम भभक उठी....

" यार, इसमें बुरा मान'ने वाली क्या बात है.. मैं तो बस मज़ाक कर रही थी.. तुझे बुरा लगा तो सॉरी... वैसे...!" कहकर सोनिया चुप हो गयी...

कुच्छ देर तक उसके आगे बोलने का इंतज़ार करती रहने के बाद आरज़ू से रहा ना गया," वैसे क्या?"

" कुच्छ नही.. तू खम्खा बुरा मान जाएगी..." सोनिया ने धीरे से कहकर अपना सिर सीधा कर लिया.. उसको पता था.. ना तो वो आगे बोलने से रुक सकती है.. और ना ही आरज़ू उसकी आधी छोडी गयी बात को पूरा सुने बिना मान'ने वाली है... लड़कियाँ होती ही ऐसी हैं... फिर भी वह चुप बैठी रही..

" बता ना.. क्या कह रही थी तू.. मुझे तेरी ये आदत बिल्कुल अच्छि नही लगती.. शुरू की है तो पूरी बात कह.. मुझे बुरा लगे या अच्च्छा.. चल बोल..." आरज़ू से रहा ना गया...

" कुच्छ नही.. मैं कह रही थी.. खिड़कियाँ भी नही खुलती इस बस की तो.. तुम्हे गर्मी नही लग रही..." सोनिया ने बात को जान बूझ कर खा लिया...

" झूठी.. तू लड़कों के बारे में कुच्छ बोल रही थी.. मुझे पता है.. और वैसे भी एसी बस में गर्मी लग ही नही सकती.. वो भी रात के टाइम... जल्दी बता क्या बोल रही थी.. मेरा दिमाग़ गरम ना कर..." आरज़ू ने सोनिया को प्यार से झिड़का.. शायद ये तरकीब काम कर जाए...

" अरे यार.. तू ये नही कह रही थी की मुझे तो लड़के वैसे भी अच्छे नही लगते.. बस इसी बात पर... मैं कहने वाली थी की हम जैसी जवान लड़कियों को लड़के पसंद नही आएँगे तो क्या पसंद आएगा.. बस मज़ाक में.. अपने उपर मत ले जाना बात को....

" तू भी ना... धात!" कहकर आरज़ू शर्मा गयी...

" इसमें ग़लत बात क्या है? सही तो कह रही है ये..." अमित आगे वाली सीट पर सिर टिकाए ध्यान से उन्न दोनो की बात ध्यान से सुन रहा था... अचानक बीच में टपाक पड़ा..

अमित की बात सुनकर दोनो सीट से उच्छल सी पड़ी.. तुरंत ही आरज़ू ने संभालते हुए अमित पर ही मोर्चा खोल दिया.. पर हौले हौले," ये ईडियट हमारी बात सुन रहा है..!"

"मैं तो जनम जात ईडियट हूँ जी... सीखा दो ना 'कुच्छ' मुझे भी..." कहकर अमित खिलखिला उठा... दोनो लड़कियाँ झेंप गयी...

" तू भी यार.. जहाँ देखो शुरू हो जाता है.. आराम से नही बैठ सकता क्या..?" मनु ने उसको डांटा.. वो उसके साथ ही बैठा अपनी वाणी को देख रहा था.. वो भी रह रह कर सबसे नज़रें बचाकर उसकी और देख लेती... और अपनी हसीन स्माइल पास कर देती.. मनु की और...

" मैने क्या कहा है.. अब ये मुझे ईडियट कह रही है तो इसको ज़रूर 'कुच्छ कुच्छ' आता होगा.. मैने तो यही बोला है की...." अमित भी एक नंबर. का बेशर्म था...

" चुप कर यार.. तू सारे टूर का मज़ा खराब करेगा..." मनु ने उसको बीच में ही टोक दिया...

" तुझे मज़े लेने आते भी हैं... उल्लू की तरह देखते रहना बस उसकी और.... मुझे तो डर है की.. वो कहीं तुझे 'वो' ना समझ ले.." अमित ने जान बूझ कर ये बात मनु के साथ साथ उन्न दोनो को भी सुना दी.. और फिर से हँसने लगा...

" चुप हो जा यार.. तेरे हाथ जोड़ता हूँ.. !" मनु ने आख़िरकार हार मान ही ली...

" देख ये भी तो लड़का है... कितनी शराफ़त से बात कर रहा है.. मुझे तो ऐसे ही लड़के पसंद हैं...." आरज़ू ने कनखियों से मनु की और देखा...

" इसकी शराफ़त का तो तब पता लगेगा.. जब तुम्हारे गाँव में बारात आएगी इसकी... 'शराफ़त से बात कर रहा है..'" अमित ने आरज़ू की नकल उतारते हुए कहा...," और हां.. मैं भी आऊंगा.. बारात में.. चेहरा देख लो.. अच्छि तरह...!"

" देख लिया.. बंदर जैसा है.." आरज़ू ने हौले से पिछे बात सुनाई और सोनिया और वो दोनो खिलखिला कर हंस पड़ी...

" हां.. बंदर से याद आया.. एक बार एक बंदर ने कुतिया से प्यार कर लिया.. पता है क्या पैदा हुआ?" अमित ने कहा तो मनु ने अपने दोनो हाथों से अपना मुँह जाकड़ लिया.. नही जकड़ता तो ऐसा ठहाका गूँजता की सारी बस में तमाशा बन जाता.. और फिर जवाब देना भी मुश्किल हो जाता की हंसा तो हंसा किस बात पर...

" बदतमीज़!" आरज़ू ने अपने चेहरे से निकालने वाली हँसी को जैसे तैसे अपने आप पर काबू करके गाली की शकल दे दी.. पर सोनिया अपने आप को हँसने से ना रोक सकी.. उसने पिछे मुड़कर अपने मुँह को हाथों में दबोचे मनु की और देखा.. उसको उसकी बड़ी दया आई..

मनु और सोनिया की नज़रें मिलनी थी और वाणी का पिछे देखना हो गया.. दोनो की आँखों में.. बुल्की चारों की आँखों में हँसी की झलक पाते ही वाणी तिलमिला उठी....
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11-26-2017, 02:04 PM,
#96
RE: College Sex Stories गर्ल्स स्कूल
गर्ल्स स्कूल पार्ट --54

बस ने मोहन नगर टी-जंक्षन से दायें मुड़कर गाज़ियाबाद ट्रॅफिक लाइट की और हाइवे नंबर. 24 की और बायें टर्न लिया....

" मानसी.. तू मनु को अपने पास बुला ले ना.. मैं पिछे चली जाती हूँ..!" जल भुन कर रख हो गयी वाणी ने अपने साथ बैठी मानसी से कहा...

" क्यूँ क्या हुआ..?" मानसी को वाणी की बात अटपटी सी लगी.. उसने पीछे मुड़कर मनु को देखा.. वाणी की नज़रों की भाषा समझ कर मनु की हालत ऐसी हो गयी थी जैसे बिना जहर वाले साँप को किसी ने बिल में घुसते देख उसकी पूंच्छ से पकड़ लिया हो.. शकल तो उसकी शरीफ पहले ही थी..

" क्यूँ कह रही है तू ऐसा.. क्या हुआ.. बताओ ना..?" मानसी ने फिर से वाणी पर नज़रें जमाकर कहा...

" कुच्छ नही.. बस तू उसको यहाँ बुला ले.. अगर मेरी बात माननी है तो.." कहकर वाणी उठकर पिच्छली सीट पर चली गयी.. वहाँ दिव्या अकेली बैठी हुई थी...

कुच्छ देर सोचने के बाद मानसी ने मनु को आवाज़ दी," भैया.. इधर आना.."

" ले मैं कह रहा था ना सा.. तू मेरी बॅंड बजवाएगा.. बाजवा दी ना.." बड़बड़ाता हुआ मनु वहाँ से उठकर अँगारे बरसाती हुई वाणी से महज एक सेकेंड के लिए नज़रे मिलाता हुआ मानसी के पास जा बैठा..," क्या हुआ मानी?"

" कुच्छ नही.. आप यहीं बैठे रहो.. बस!" मानसी ने धीरे से मनु से कहा..

" आख़िर कुच्छ हुआ भी होगा? मैं वहाँ ठीक तो बैठा था.. आराम से.. मैं तो कुच्छ बोल भी नही रहा था किसी से..!" मनु ने ये सफाई मानसी को नही बुल्की उसके पिछे बैठकर उसकी शर्ट खींच रही वाणी को देनी ज़रूरी समझी...

"वाणी खाँसी तो मनु ने पिछे मुड़कर देखा.. वाणी उसकी और आँखें निकाले हुए दाँत पीस रही थी.. बेचारा मनु मन मार कर रह गया.. ये टाइम उस'से ज़्यादा खुलकर सफाई देने का था भी तो नही...

" मैं वापस जाउ?" मनु की एक आँख मानसी पर और दूसरी वाणी पर थी..

मानसी ने पिछे मुड़कर वाणी को देखा.....

" मेरी तरफ क्यूँ देख रही हो.. मेरी तरफ से तो चाहे कोई भाड़ में जाए.. मुझे क्या..?" वाणी अब भी उसकी शर्ट को पकड़ कर खींचे हुए थी...

"ठीक है.. मैं यहीं बैठ जाता हूँ.. वैसे भी पीछे नही बैठना चाह रहा मैं..." और बेचारा मनु.....

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विकी काफ़ी देर से शमशेर को कुच्छ कहने का सोच रहा था.. पर वासू के पास 3 घंटे से ज़्यादा बैठने के बाद उसको ऐसा लग रहा था जैसे किसी आश्रम में बैठा हो... उसके प्रवचन सुन सुन कर उसके कान पक गये थे... आख़िरकार उस'से रहा ना गया..," शमशेर भाई.. एक मिनिट पिछे आओगे..!"

" हां.. बता ना.. क्या बात है? यहीं बोल दे...!" शमशेर ने पिछे घूमते हुए कहा...

" नही यार.. एक बार पिछे आ जा...!"

"चल!" शमशेर खड़ा हो गया और दोनो जाकर बस की पिच्छली सीटो पर बैठ गये..," क्या बात है..?"

" बात क्या है यार.. तुमने सुना नही क्या?" ये कैसे कैसे अध्यापक.. ओह माइ गॉड! मैं भी उसकी भाषा बोलने लग गया.. ये कैसे टीचर को साथ ले आया तू भी.. लगता है जैसे मौज मस्ती के लिए नही.. तीर्थ यात्रा पर जा रहे हों... सारे.. तीर्थ.. सारे श्लोक.. सारे मन्त्र.. मुझे सुना दिए इसने.. कुच्छ कुच्छ तो मुझे याद हो भी गया.. सुनाऊं.. ओम विश्वाणी देव: सवीतूर, दुरीतानी परा शुव: यद भद्रम आसुव:...."

" यार ये क्या पागलपन है.. मुझे क्यूँ सुना रहा है ये सब.. बात क्या है.. वो बता ना..." शमशेर ने हंसते हुए कहा..

" देख ले.. तुझसे एक छन भी नही सुना गया.. तू सोच.. मैने पूरे हवन के मन्त्र कैसे झेले होंगे यार.. कैसे झेला होगा इस.. इसको 3 घंटे से ज़्यादा..." विकी ने बेचारा सा मुँह बनाते हुए कहा," अच्च्छा भला.. स्नेहा के पास बैठ रहा था.. वहाँ से भी मना कर दिया.." विकी रो तो नही रहा था.. पर हालत उस'से भी कहीं ज़्यादा गयी गुज़री थी.....

" तो क्या करना है.. स्नेहा के साथ बैठना है अभी...!" शमशेर ने मतलब की बात पर आते हुए कहा...

" नही भाई... अब.. स्नेहा के पास बैठने से भी क्या होगा.. इस कम्बख़त ने तो बातों ही बातों में मेरी इज़्ज़त सी लूट ली है.. मुझे कुच्छ भी याद नही.. सिवाय उसके प्रवचनो के..!" विकी का बुरा हाल था...

" हा हा हा हा.. नही यार.. वो मस्त आदमी है.. बस बातें कुच्छ ज़्यादा करता है.. तू बता.. क्या चाहिए तुझे अब..?" शमशेर हँसना तो और भी चाहता था.. पर विकी की रोनी सूरत देख कर उसको रहम आ गया...

" दारू! दारू चाहिए भाई.. अभी के अभी.. वरना मैं पागल हो जाउन्गा..!"

" यहाँ तो ठीक नही है विकी.. समझा कर...!" शमशेर ने उसको समझाने की कोशिश की..

" तो ऐसा करो.. मुझे यहीं उतार दो.. मैं वापस चला जवँगा.. ये उपकार तो कर ही सकते हो.. मेरे भाई.." विकी की शकल सच में ही देखने लायक थी...

" चल.. मैं देखता हूँ.. थोड़ा आगे चलकर खाना खाएँगे.. तब देखते हैं.. ओके?"

"कितनी दूर और चलना पड़ेगा...?" विकी के चेहरे पर हल्की सी रौनक लौट आई..

" यहाँ से बाबुगारह करीब 15 काइलामीटर और है.. वहाँ से 50 काइलामीटर है गजरौला.. वहाँ पर खाएँगे......" शमशेर ने उसको थपकी देते हुए कहा...

"ठीक है भाई.. पर मैं वापस उसके पास नही जाउन्गा.. यहीं बैठा रहूँगा तब तक...." विकी ने मुरझाए हुए चेहरे से कहा..

" तू चल ना यार.. आ.. मैं स्नेहा को तेरे साथ बैठवाने का जुगाड़ करता हूँ.. दिशा से कहकर.... आजा!"

"आ रिया! देख ना, राज स्लीवलेशस टी-शर्ट में कितना क्यूट लग रहा है!" प्रिया ने नज़रें घूमाकर एक बार फिर से राज पर निगाह डाली...

" और वीरू? वो जाग रहा है क्या?" रिया ने पिछे नही देखा.. बस उसी से पूच्छ लिया..

"हूंम्म.. मुझसे क्यूँ पूच्छ रही है.. तुझे आँखें नही दी क्या भगवान ने?" प्रिया ने चटखारे लेते हुए कहा...

" मुझे नही देखना उसको! मचकर्चॅड!" रिया ने कहते हुए अपनी आँखें बंद कर ली.. कहीं आँखों से उसके दिल की बात ना पता चल जाए..

" उम्म? क्या बोला तूने? मचकर्चॅड? हा हा हा!" प्रिया पिछे मुड़कर वीरू के चेहरे पर उग्ग रही हुल्की मूँछहों पर गौर करते हुए हंस पड़ी.. वीरू ने एक पल को उस'से नज़रें मिलाई और फिर अपना चेहरा दूसरी और कर लिया..

" और क्या? जब ये मुझसे बात नही करता तो दिल करता है अपने नाखूनओ से इसकी मून्छे उखाड़ डालूं.. पता नही क्या समझता है अपने आपको.. तूने भी तो प्रोमिस किया था ना.. मेरे लिए बात करेगी.. अब तो भूल गयी होगी तू.. तेरा काम तो बन ही गया है..." रिया ने मुँह फुलाते हुए कहा..

" नही यार.. ऐसी बात नही है... तेरी तरह मुझे भी उस'से बात करते हुए डर लगता है.. पर मैं राज को बोलकर देखूँगी.. मौका मिलने दे..!" प्रिया ने रिया को शंतवना दी..

" देख ले.. तेरी मर्ज़ी है.. वरना मैने तो ऐसा प्लान सोच रखा है कि बस.. बाद में मुझे मत कहना ये क्या कर दिया...!" रिया ने भी उसको अलटिमेटम दे डाला..

" क्या? ऐसा क्या करेगी तू?" प्रिया ने संभावित आसचर्या में पहले ही अपना मुँह खोल लिया...

" वो तो बस तभी पता चलेगा.. अगर तूने उसके मुझसे ढंग से बात करने के लिए राज़ी नही किया तो.. अब तू देख ले..." रिया ने राज को राज ही रखा..

" देख रिया.. कुच्छ उल्टा सीधा करने की मत सोचना.. मैं कह रही हूँ ना.. मैं बात करूँगी..... आ.. वो देख.. स्नेहा विकी वाली सीट पर चली गयी.. हाए.. काश! मैं भी राज के साथ बैठ सकती..." प्रिया ने बोलते बोलते अचानक रिया का ध्यान आगे की और खींचा..

" और देख.. वो 'सर' उस लड़की के साथ बैठ गये.. उनका भी कुच्छ चक्कर है क्या?" रिया ने वासू की और इशारा किया...

" धात! पागल.. अब स्नेहा उसकी सीट पर जाएगी तो वो क्या वहीं बैठे रहेंगे.. इसीलिए नीरू के पास जाकर बैठ गये होंगे.. 'वो' तो 'सर' हैं उसके!" प्रिया ने रिया के मन का 'मैल' निकालने की कोशिश की...

" बेशक सर हों.. पर तू चाहे शर्त लगा ले.. कुच्छ ना कुच्छ बात ज़रूर है.. अभी देखा नही तूने.. दोनो एक दूसरे से नज़रें मिलकर कैसे खिल उठे थे.. हां.. कुच्छ ना कुच्छ चक्कर ज़रूर मिलगे इनका भी!" रिया अपनी बात पर अड़ गयी..

"चल ना.. तू तो पागल है.. अब चुप कर ये बातें.. कोई सुन लेगा!" कहते हुए प्रिया ने एक बार और राज को और वीरू की 'मूँछहों' को देखा और सीधी बैठ गयी...

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"तुम ठीक तो हो ना.. नीरू! उल्टियाँ वग़ैरह तो नही आने वाली हैं ना...!" अपने वासू ने क्या टॉपिक ढूँढा था.. बात शुरू करने के लिए.. वा!

नीरू ने गर्दन नीचे करके अपना सिर 'ना' में हिला दिया.. वासू की जांघें उसकी जांघों के साथ सटा'ते ही उसके बदन में वासनात्मक सुगबुगाहट सी शुरू हो गयी थी... इस 'मस्ती' को और बढ़ाने के लिए उसने अपनी जांघें थोड़ी सी खोल कर वासू से और ज़्यादा चिपका दी...

" श.. क्षमा करना! मैने जान-बूझ कर ऐसा नही किया.." कहते हुए वासू ने सरकते हुए अपने को नीरू से थोड़ा अलग कर लिया.. उस लल्लू को ये लगा की नीरू का भरी बस में उसके साथ साथ कर बैठना अच्च्छा नही लगा होगा...

बेचारी नीरू क्या बोलती! खून का घूँट पीकर रह गयी.. अब ऐसे 'दिलजले' से यारी की है तो भुगतना तो पड़ेगा ही..

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"थॅंक्स विकी!" स्नेहा ने चुपके से विकी के कान में कहते हुए अपना सिर उसके कंधे पर टीका दिया...

विकी ने अपना हाथ स्नेहा की गर्दन के पिछे से ले जाते हुए दूसरी तरफ उसके कंधे पर रख लिया..

" तुम मुझसे अभी भी प्यार करती हो ना.. सानू!" विकी ने हौले से ये बात स्नेहा के कान में कहकर उसको अंदर तक गुदगुदा दिया..

" पता नही.." कहकर स्नेहा ने उसको कोहनी मारी..

" बता ना.. मैं सीरियस्ली पूच्छ रहा हूँ.." विकी ने फिर से उसके कान में कहा..

" सीरियस्ली?" स्नेहा ने सवाल किया..

" हां.. यार सीरियस्ली.."

स्नेहा ने अपना चेहरा थोड़ा सा उपर उठाया और उसके कान के पास अपने होंठ ले गयी..," मेरा 'प्यार' करने का बहुत दिल कर रहा है.. मैं मरी जा रही हूँ.. तुम्हारी बाहों में आने के लिए.. कब पहुँचेंगे नैनीताल?"

विकी को जवाब मिल गया.. वा और उसका दिल, दोनो झूम उठे..," थॅंक्स सानू! मैं भी तुम्हारे लिए अब उतना ही तड़प रहा हून.." कहते हुए विकी ने स्नेहा के कंधे को दबाकर अपने से सटा लिया..

" मैं.. तुम्हारी गोद में सिर रख लूँ..?" स्नेहा ने अपनी गरम साँसें विकी के कानो के पास छ्चोड़ी तो विकी का 'सब कुच्छ' अकड़ गया..

" यहाँ? अभी? सबके सामने? सबको अजीब नही लगेगा क्या?"

" लगने दो.. यहाँ मुझे कौन जानता है.. और जो जानते हैं.. उनका पता ही है कि मैं तुम्हारी ही हूँ.. क्या फ़र्क़ पड़ता है..?" स्नेहा उसके थोड़ा और करीब आकर बोली..

" ठीक है.. आ जाओ.. मुझे भी कोई प्राब्लम नही है..?" विकी ने उस'से थोड़ा दूर हटकर स्नेहा के उसकी गोद में सिर रखने का रास्ता सॉफ कर दिया..

स्नेहा ने एक पल को झिझकते हुए अपने बायें देखा और फिर आँखें बंद करके विकी की गोद में सिर टीका दिया...

पर उनको देखने की फ़ुर्सत किसके पास थी.. सब या तो 'अपने अपनों' पर नज़र रखे हुए थे या फिर सो चुके थे... सिवाय आरज़ू को छ्चोड़कर.. उसका कोई ऐसा 'अपना' तो बस में था नही.. और नींद उसकी उड़ा ही दी थी.. अमित ने.. 'बंदर और कुतिया' वाली बात कहकर.. जाने अंजाने.. काफ़ी देर तक उसका ध्यान इसी बात पर टीका रहा.. और जब उस बात से ध्यान हटा तो 'विकी' पर आकर टिक गया...

विकी और स्नेहा की चुहलबाज़ियाँ उसके तन-मन में गुदगुदी सी पैदा कर रही थी.. और जैसे ही स्नेहा झुक कर विकी की गोद में लेटी.. 'कल्पना शक्ति' की डोर उसको विकी की जांघों के बीच ले गयी..और अनायास ही उसकी जांघें कसकर एक दूसरी से सॅट गयी.. जाने कैसा अहसास था.. पर जो भी था.. आरज़ू के चेहरे पर बड़े ही कामुक भाव उजागर हो गये.. 'इस्स्श्ह्ह'

" ये क्या है? तुम तो अभी से तैयार हो?" स्नेहा ने जैसे ही विकी की गोद में सिर रखा.. एक 'जानी-पहचानी 'चीज़' उसके गालों से आकर सॅट गयी.. वो कहते हुए शरारत से मुस्कुरा पड़ी..

विकी कुच्छ नही बोला.. बस मुस्कुराया और उसके चेहरे पर प्यार से हाथ फेरने लगा...

" मुझे नही पता.. मुझे सिर रखने में दिक्कत हो रही है.. इसको ठीक करो पहले.." स्नेहा ने शरारती तरीके से अपने गाल और उस 'चीज़' के बीच अपना हाथ रखते हुए धीरे से कहा.. हाथ का स्पर्श जीन के उपर से पाते ही 'वो' और भी अकड़ गया.. और भी सीधा हो गया.. और भी लंबा..

" देखो.. मैं पहले ही बोल रही हूँ... वरना...!" स्नेहा ने जैसे कुच्छ ठान ही लिया था..

"मैं क्या करूँ.. अयाया" बोलते बोलते विकी की सिसकी निकल गयी.. स्नेहा ने अपने दाँतों से जीन का वो उभरा हुआ भाग काट खाया था..

विकी की सिसकी सुनकर स्नेहा की हँसी छ्छूट गयी.. वो कहते हैं ना.. 'चोरी चोरी प्यार में है जो मज़ा!'

गर्ल'स स्कूल--55

बस ने मोहन नगर टी-जंक्षन से दायें मुड़कर गाज़ियाबाद ट्रॅफिक लाइट की और हाइवे नंबर. 24 की और बायें टर्न लिया....

" मानसी.. तू मनु को अपने पास बुला ले ना.. मैं पिछे चली जाती हूँ..!" जल भुन कर रख हो गयी वाणी ने अपने साथ बैठी मानसी से कहा...

" क्यूँ क्या हुआ..?" मानसी को वाणी की बात अटपटी सी लगी.. उसने पीछे मुड़कर मनु को देखा.. वाणी की नज़रों की भाषा समझ कर मनु की हालत ऐसी हो गयी थी जैसे बिना जहर वाले साँप को किसी ने बिल में घुसते देख उसकी पूंच्छ से पकड़ लिया हो.. शकल तो उसकी शरीफ पहले ही थी..

" क्यूँ कह रही है तू ऐसा.. क्या हुआ.. बताओ ना..?" मानसी ने फिर से वाणी पर नज़रें जमाकर कहा...

" कुच्छ नही.. बस तू उसको यहाँ बुला ले.. अगर मेरी बात माननी है तो.." कहकर वाणी उठकर पिच्छली सीट पर चली गयी.. वहाँ दिव्या अकेली बैठी हुई थी...

कुच्छ देर सोचने के बाद मानसी ने मनु को आवाज़ दी," भैया.. इधर आना.."

" ले मैं कह रहा था ना सा.. तू मेरी बॅंड बजवाएगा.. बाजवा दी ना.." बड़बड़ाता हुआ मनु वहाँ से उठकर अँगारे बरसाती हुई वाणी से महज एक सेकेंड के लिए नज़रे मिलाता हुआ मानसी के पास जा बैठा..," क्या हुआ मानी?"

" कुच्छ नही.. आप यहीं बैठे रहो.. बस!" मानसी ने धीरे से मनु से कहा..

" आख़िर कुच्छ हुआ भी होगा? मैं वहाँ ठीक तो बैठा था.. आराम से.. मैं तो कुच्छ बोल भी नही रहा था किसी से..!" मनु ने ये सफाई मानसी को नही बुल्की उसके पिछे बैठकर उसकी शर्ट खींच रही वाणी को देनी ज़रूरी समझी...

"वाणी खाँसी तो मनु ने पिछे मुड़कर देखा.. वाणी उसकी और आँखें निकाले हुए दाँत पीस रही थी.. बेचारा मनु मन मार कर रह गया.. ये टाइम उस'से ज़्यादा खुलकर सफाई देने का था भी तो नही...

" मैं वापस जाउ?" मनु की एक आँख मानसी पर और दूसरी वाणी पर थी..

मानसी ने पिछे मुड़कर वाणी को देखा.....

" मेरी तरफ क्यूँ देख रही हो.. मेरी तरफ से तो चाहे कोई भाड़ में जाए.. मुझे क्या..?" वाणी अब भी उसकी शर्ट को पकड़ कर खींचे हुए थी...

"ठीक है.. मैं यहीं बैठ जाता हूँ.. वैसे भी पीछे नही बैठना चाह रहा मैं..." और बेचारा मनु.....

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विकी काफ़ी देर से शमशेर को कुच्छ कहने का सोच रहा था.. पर वासू के पास 3 घंटे से ज़्यादा बैठने के बाद उसको ऐसा लग रहा था जैसे किसी आश्रम में बैठा हो... उसके प्रवचन सुन सुन कर उसके कान पक गये थे... आख़िरकार उस'से रहा ना गया..," शमशेर भाई.. एक मिनिट पिछे आओगे..!"

" हां.. बता ना.. क्या बात है? यहीं बोल दे...!" शमशेर ने पिछे घूमते हुए कहा...

" नही यार.. एक बार पिछे आ जा...!"

"चल!" शमशेर खड़ा हो गया और दोनो जाकर बस की पिच्छली सीटो पर बैठ गये..," क्या बात है..?"

" बात क्या है यार.. तुमने सुना नही क्या?" ये कैसे कैसे अध्यापक.. ओह माइ गॉड! मैं भी उसकी भाषा बोलने लग गया.. ये कैसे टीचर को साथ ले आया तू भी.. लगता है जैसे मौज मस्ती के लिए नही.. तीर्थ यात्रा पर जा रहे हों... सारे.. तीर्थ.. सारे श्लोक.. सारे मन्त्र.. मुझे सुना दिए इसने.. कुच्छ कुच्छ तो मुझे याद हो भी गया.. सुनाऊं.. ओम विश्वाणी देव: सवीतूर, दुरीतानी परा शुव: यद भद्रम आसुव:...."

" यार ये क्या पागलपन है.. मुझे क्यूँ सुना रहा है ये सब.. बात क्या है.. वो बता ना..." शमशेर ने हंसते हुए कहा..

" देख ले.. तुझसे एक छन भी नही सुना गया.. तू सोच.. मैने पूरे हवन के मन्त्र कैसे झेले होंगे यार.. कैसे झेला होगा इस.. इसको 3 घंटे से ज़्यादा..." विकी ने बेचारा सा मुँह बनाते हुए कहा," अच्च्छा भला.. स्नेहा के पास बैठ रहा था.. वहाँ से भी मना कर दिया.." विकी रो तो नही रहा था.. पर हालत उस'से भी कहीं ज़्यादा गयी गुज़री थी.....

" तो क्या करना है.. स्नेहा के साथ बैठना है अभी...!" शमशेर ने मतलब की बात पर आते हुए कहा...

" नही भाई... अब.. स्नेहा के पास बैठने से भी क्या होगा.. इस कम्बख़त ने तो बातों ही बातों में मेरी इज़्ज़त सी लूट ली है.. मुझे कुच्छ भी याद नही.. सिवाय उसके प्रवचनो के..!" विकी का बुरा हाल था...

" हा हा हा हा.. नही यार.. वो मस्त आदमी है.. बस बातें कुच्छ ज़्यादा करता है.. तू बता.. क्या चाहिए तुझे अब..?" शमशेर हँसना तो और भी चाहता था.. पर विकी की रोनी सूरत देख कर उसको रहम आ गया...

" दारू! दारू चाहिए भाई.. अभी के अभी.. वरना मैं पागल हो जाउन्गा..!"

" यहाँ तो ठीक नही है विकी.. समझा कर...!" शमशेर ने उसको समझाने की कोशिश की..

" तो ऐसा करो.. मुझे यहीं उतार दो.. मैं वापस चला जवँगा.. ये उपकार तो कर ही सकते हो.. मेरे भाई.." विकी की शकल सच में ही देखने लायक थी...

" चल.. मैं देखता हूँ.. थोड़ा आगे चलकर खाना खाएँगे.. तब देखते हैं.. ओके?"

"कितनी दूर और चलना पड़ेगा...?" विकी के चेहरे पर हल्की सी रौनक लौट आई..

" यहाँ से बाबुगारह करीब 15 काइलामीटर और है.. वहाँ से 50 काइलामीटर है गजरौला.. वहाँ पर खाएँगे......" शमशेर ने उसको थपकी देते हुए कहा...

"ठीक है भाई.. पर मैं वापस उसके पास नही जाउन्गा.. यहीं बैठा रहूँगा तब तक...." विकी ने मुरझाए हुए चेहरे से कहा..

" तू चल ना यार.. आ.. मैं स्नेहा को तेरे साथ बैठवाने का जुगाड़ करता हूँ.. दिशा से कहकर.... आजा!"

"आ रिया! देख ना, राज स्लीवलेशस टी-शर्ट में कितना क्यूट लग रहा है!" प्रिया ने नज़रें घूमाकर एक बार फिर से राज पर निगाह डाली...

" और वीरू? वो जाग रहा है क्या?" रिया ने पिछे नही देखा.. बस उसी से पूच्छ लिया..

"हूंम्म.. मुझसे क्यूँ पूच्छ रही है.. तुझे आँखें नही दी क्या भगवान ने?" प्रिया ने चटखारे लेते हुए कहा...

" मुझे नही देखना उसको! मचकर्चॅड!" रिया ने कहते हुए अपनी आँखें बंद कर ली.. कहीं आँखों से उसके दिल की बात ना पता चल जाए..

" उम्म? क्या बोला तूने? मचकर्चॅड? हा हा हा!" प्रिया पिछे मुड़कर वीरू के चेहरे पर उग्ग रही हुल्की मूँछहों पर गौर करते हुए हंस पड़ी.. वीरू ने एक पल को उस'से नज़रें मिलाई और फिर अपना चेहरा दूसरी और कर लिया..

" और क्या? जब ये मुझसे बात नही करता तो दिल करता है अपने नाखूनओ से इसकी मून्छे उखाड़ डालूं.. पता नही क्या समझता है अपने आपको.. तूने भी तो प्रोमिस किया था ना.. मेरे लिए बात करेगी.. अब तो भूल गयी होगी तू.. तेरा काम तो बन ही गया है..." रिया ने मुँह फुलाते हुए कहा..

" नही यार.. ऐसी बात नही है... तेरी तरह मुझे भी उस'से बात करते हुए डर लगता है.. पर मैं राज को बोलकर देखूँगी.. मौका मिलने दे..!" प्रिया ने रिया को शंतवना दी..

" देख ले.. तेरी मर्ज़ी है.. वरना मैने तो ऐसा प्लान सोच रखा है कि बस.. बाद में मुझे मत कहना ये क्या कर दिया...!" रिया ने भी उसको अलटिमेटम दे डाला..

" क्या? ऐसा क्या करेगी तू?" प्रिया ने संभावित आसचर्या में पहले ही अपना मुँह खोल लिया...

" वो तो बस तभी पता चलेगा.. अगर तूने उसके मुझसे ढंग से बात करने के लिए राज़ी नही किया तो.. अब तू देख ले..." रिया ने राज को राज ही रखा..

" देख रिया.. कुच्छ उल्टा सीधा करने की मत सोचना.. मैं कह रही हूँ ना.. मैं बात करूँगी..... आ.. वो देख.. स्नेहा विकी वाली सीट पर चली गयी.. हाए.. काश! मैं भी राज के साथ बैठ सकती..." प्रिया ने बोलते बोलते अचानक रिया का ध्यान आगे की और खींचा..

" और देख.. वो 'सर' उस लड़की के साथ बैठ गये.. उनका भी कुच्छ चक्कर है क्या?" रिया ने वासू की और इशारा किया...

" धात! पागल.. अब स्नेहा उसकी सीट पर जाएगी तो वो क्या वहीं बैठे रहेंगे.. इसीलिए नीरू के पास जाकर बैठ गये होंगे.. 'वो' तो 'सर' हैं उसके!" प्रिया ने रिया के मन का 'मैल' निकालने की कोशिश की...

" बेशक सर हों.. पर तू चाहे शर्त लगा ले.. कुच्छ ना कुच्छ बात ज़रूर है.. अभी देखा नही तूने.. दोनो एक दूसरे से नज़रें मिलकर कैसे खिल उठे थे.. हां.. कुच्छ ना कुच्छ चक्कर ज़रूर मिलगे इनका भी!" रिया अपनी बात पर अड़ गयी..

"चल ना.. तू तो पागल है.. अब चुप कर ये बातें.. कोई सुन लेगा!" कहते हुए प्रिया ने एक बार और राज को और वीरू की 'मूँछहों' को देखा और सीधी बैठ गयी...

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"तुम ठीक तो हो ना.. नीरू! उल्टियाँ वग़ैरह तो नही आने वाली हैं ना...!" अपने वासू ने क्या टॉपिक ढूँढा था.. बात शुरू करने के लिए.. वा!

नीरू ने गर्दन नीचे करके अपना सिर 'ना' में हिला दिया.. वासू की जांघें उसकी जांघों के साथ सटा'ते ही उसके बदन में वासनात्मक सुगबुगाहट सी शुरू हो गयी थी... इस 'मस्ती' को और बढ़ाने के लिए उसने अपनी जांघें थोड़ी सी खोल कर वासू से और ज़्यादा चिपका दी...

" श.. क्षमा करना! मैने जान-बूझ कर ऐसा नही किया.." कहते हुए वासू ने सरकते हुए अपने को नीरू से थोड़ा अलग कर लिया.. उस लल्लू को ये लगा की नीरू का भरी बस में उसके साथ साथ कर बैठना अच्च्छा नही लगा होगा...

बेचारी नीरू क्या बोलती! खून का घूँट पीकर रह गयी.. अब ऐसे 'दिलजले' से यारी की है तो भुगतना तो पड़ेगा ही..

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"थॅंक्स विकी!" स्नेहा ने चुपके से विकी के कान में कहते हुए अपना सिर उसके कंधे पर टीका दिया...

विकी ने अपना हाथ स्नेहा की गर्दन के पिछे से ले जाते हुए दूसरी तरफ उसके कंधे पर रख लिया..

" तुम मुझसे अभी भी प्यार करती हो ना.. सानू!" विकी ने हौले से ये बात स्नेहा के कान में कहकर उसको अंदर तक गुदगुदा दिया..

" पता नही.." कहकर स्नेहा ने उसको कोहनी मारी..

" बता ना.. मैं सीरियस्ली पूच्छ रहा हूँ.." विकी ने फिर से उसके कान में कहा..

" सीरियस्ली?" स्नेहा ने सवाल किया..

" हां.. यार सीरियस्ली.."

स्नेहा ने अपना चेहरा थोड़ा सा उपर उठाया और उसके कान के पास अपने होंठ ले गयी..," मेरा 'प्यार' करने का बहुत दिल कर रहा है.. मैं मरी जा रही हूँ.. तुम्हारी बाहों में आने के लिए.. कब पहुँचेंगे नैनीताल?"

विकी को जवाब मिल गया.. वा और उसका दिल, दोनो झूम उठे..," थॅंक्स सानू! मैं भी तुम्हारे लिए अब उतना ही तड़प रहा हून.." कहते हुए विकी ने स्नेहा के कंधे को दबाकर अपने से सटा लिया..

" मैं.. तुम्हारी गोद में सिर रख लूँ..?" स्नेहा ने अपनी गरम साँसें विकी के कानो के पास छ्चोड़ी तो विकी का 'सब कुच्छ' अकड़ गया..

" यहाँ? अभी? सबके सामने? सबको अजीब नही लगेगा क्या?"

" लगने दो.. यहाँ मुझे कौन जानता है.. और जो जानते हैं.. उनका पता ही है कि मैं तुम्हारी ही हूँ.. क्या फ़र्क़ पड़ता है..?" स्नेहा उसके थोड़ा और करीब आकर बोली..

" ठीक है.. आ जाओ.. मुझे भी कोई प्राब्लम नही है..?" विकी ने उस'से थोड़ा दूर हटकर स्नेहा के उसकी गोद में सिर रखने का रास्ता सॉफ कर दिया..

स्नेहा ने एक पल को झिझकते हुए अपने बायें देखा और फिर आँखें बंद करके विकी की गोद में सिर टीका दिया...

पर उनको देखने की फ़ुर्सत किसके पास थी.. सब या तो 'अपने अपनों' पर नज़र रखे हुए थे या फिर सो चुके थे... सिवाय आरज़ू को छ्चोड़कर.. उसका कोई ऐसा 'अपना' तो बस में था नही.. और नींद उसकी उड़ा ही दी थी.. अमित ने.. 'बंदर और कुतिया' वाली बात कहकर.. जाने अंजाने.. काफ़ी देर तक उसका ध्यान इसी बात पर टीका रहा.. और जब उस बात से ध्यान हटा तो 'विकी' पर आकर टिक गया...

विकी और स्नेहा की चुहलबाज़ियाँ उसके तन-मन में गुदगुदी सी पैदा कर रही थी.. और जैसे ही स्नेहा झुक कर विकी की गोद में लेटी.. 'कल्पना शक्ति' की डोर उसको विकी की जांघों के बीच ले गयी..और अनायास ही उसकी जांघें कसकर एक दूसरी से सॅट गयी.. जाने कैसा अहसास था.. पर जो भी था.. आरज़ू के चेहरे पर बड़े ही कामुक भाव उजागर हो गये.. 'इस्स्श्ह्ह'

" ये क्या है? तुम तो अभी से तैयार हो?" स्नेहा ने जैसे ही विकी की गोद में सिर रखा.. एक 'जानी-पहचानी 'चीज़' उसके गालों से आकर सॅट गयी.. वो कहते हुए शरारत से मुस्कुरा पड़ी..

विकी कुच्छ नही बोला.. बस मुस्कुराया और उसके चेहरे पर प्यार से हाथ फेरने लगा...

" मुझे नही पता.. मुझे सिर रखने में दिक्कत हो रही है.. इसको ठीक करो पहले.." स्नेहा ने शरारती तरीके से अपने गाल और उस 'चीज़' के बीच अपना हाथ रखते हुए धीरे से कहा.. हाथ का स्पर्श जीन के उपर से पाते ही 'वो' और भी अकड़ गया.. और भी सीधा हो गया.. और भी लंबा..

" देखो.. मैं पहले ही बोल रही हूँ... वरना...!" स्नेहा ने जैसे कुच्छ ठान ही लिया था..

"मैं क्या करूँ.. अयाया" बोलते बोलते विकी की सिसकी निकल गयी.. स्नेहा ने अपने दाँतों से जीन का वो उभरा हुआ भाग काट खाया था..

विकी की सिसकी सुनकर स्नेहा की हँसी छ्छूट गयी.. वो कहते हैं ना.. 'चोरी चोरी प्यार में है जो मज़ा!'
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Reply
11-26-2017, 02:04 PM,
#97
RE: College Sex Stories गर्ल्स स्कूल
गर्ल्स स्कूल पार्ट --55

"आ.. ये क्या.. सबको पता चल जाएगा.." विकी ने सिसक'ते हुए झुक कर धीरे से कहा...

" अच्च्छा.. अब नही करूँगी.. पर बाद में तुम्हे छ्चोड़ूँगी नही.. देख लेना!" स्नेहा ने विकी की आँखों में झँकते हुए शरारत से अपनी आँखें मत्कायि.. और नीचे ही नीचे अपने हाथों से 'उस' को सहलाने लगी.. विकी पर प्यार करने की खुमारी चढ़ती जा रही थी...

आरज़ू बड़े गौर से पल पल बदलते विकी के चेहरे के भावों को देख रही थी.. उसको पूरा यकीन था की नीचे 'कुच्छ' ना 'कुच्छ' हो रहा है...

" सोना! तूने कुच्छ देखा क्या?" आरज़ू सोनिया के कान में फुसफुसाई..

" क्या?" सोने की तैयारी कर रही सोनिया ने आरज़ू के चेहरे की और देखते हुए कहा..

" मेरी तरफ क्या देख रही है? उधर देख.. सामने!" आरज़ू ने सोनिया को कोहनी मारी..

सोनिया ने बस में आगे की तरफ नज़रें दौड़ाई, पर उसकी नज़रें वो नही देख पाई जो आरज़ू देख रही थी.. या फिर देख कर भी समझ नही पाई," क्या देखूं?"

" अरे.. वो लड़की.. स्नेहा उसकी गोद में सिर रखे लेटी है... दिखता नही क्या तुझे?"

" एयेए हां.. पर मैं देखु क्या?" सोनिया अभी भी अंजान थी..

" तू तो बिल्कुल बुद्धू है.. कभी 'वैसी' मूवी नही देखी क्या?"

" सोनिया 'वैसी मूवी' का मतलब तुरंत समझ गयी," मैं.. मैं क्यूँ देखूँगी.. वैसी मूवी.. पर तू कहना क्या चाह रही है...?" सोनिया ने आरज़ू के कान में फुसफुसाया...

" ओहो.. तू तो जैसे बिल्कुल ही भोली है.. सुन.. इधर आ" आरज़ू ने कहा और सोनिया उसके चेहरे की और झुक गयी..," क्या?"

" मैने देखी है एक बार... उसमें एक अँग्रेजन किसी अंग्रेज का 'वो' मुँह में लेकर चूस रही थी.."

सोनिया ने आरज़ू को बीच में ही टोक दिया..," धात! ऐसी बातें क्यूँ कर रही है..?"

" अरे.. मैं ऐसी बात ऐसे ही नही बोल रही.. तू सुन तो सही.. जब वो ऐसा कर रही थी तो वो अंग्रेज भी ऐसे ही सिसक रहा था.. जैसे ये..."

"मतलब... स्नेहा.. हे भगवान.." और सोनिया ने आसचर्या और शरम में अपने हाथ से अपना मुँह ढक लिया..

"तू ध्यान से देख.. तुझे अपने आप समझ आ जाएगा..."

" पर.. वो ऐसा क्यूँ कर रही है..? शरम नही आती उसको.." सोनिया का चेहरा शरम से लाल हो गया था..

" मज़े भी तो आ रहे होंगे.." आरज़ू ने सोनिया के सामानया ज्ञान में इज़ाफा किया..

"मज़े?? इस काम में कैसे मज़े?" बेशक सोनिया ये सवाल कर रही थी.. पर अब तक उसकी मांसल जांघों के बीच उसको भी तरलता का अहसास होने लगा था... कुदरतन!

"अब मैं तुझे करके दिखाउ क्या? तू सच में नही समझती क्या ये सब.." सोनिया ने पीछे मुड़कर देखा.. अमित नींद के आगोश में पड़ा सो रहा था..

" नही.. कसम से.. मैने कभी नही किया ऐसा कुच्छ" सोनिया ने भोली बनते हुए कहा...

" एक बात बताऊं.. किसी को बोलेगी तो नही ना..? आरज़ू ने उसका हाथ पकड़ते हुए कहा..

" मैने तेरी कभी कोई बात किसी को बताई है क्या?" कहते हुए सोनिया मन ही मन वो नाम याद करने लगी थी जिस जिस को वो आरज़ू का 'राज' बता कर अपना पेट हूल्का कर सकेगी.. आख़िर लड़की थी भाई

" मैने है ना.. एक बार.. देख तुझे मेरी कसम है.. किसी को बोलना मत.." सोनिया कहते कहते रुक गयी..

" अरे बोल ना बाबा.. नही बताउन्गि.. प्रोमिस!"

" ठीक है.. एक बार मुझे एक 'गंदी' मूवी घर पर मिली थी.. मैं अकेली ही थी.. मैने मूवी चला ली... उसमें .. मैने अभी बताया था ना तुझे...?" आरज़ू ने अपना चेहरा सोनिया से दूर करते हुए उसके मनो भावों को पढ़ने की कोशिश की..

" हां.. हां.. तू बता ना.. जल्दी" सोनिया ने कामुकता से अपनी जांघों को कसकर भीच लिया.. अजीब सी गुदगुदी हो रही थी.. उसके बदन में...

" उसमें लड़की 'उसको' मुँह में लेकर चूस रही थी.. और वो 'बहुत' बड़ा हो गया था.." आरज़ू ने अपने अंगूठे और उंगलियों को एक दूसरे से दूर फैलाते हुए 'उसका' साइज़ समझाने की कोशिश की," और फिर बाद में 'वो' भी 'उसकी' चाट रहा था..."

सोनिया का हाथ स्वतः: ही उसकी गोद से नीचे चला गया था.. शायद चिपचिपी हो गयी पॅंटी को दुरुस्त करने के लिए.. या फिर 'उस' मीठे अहसास को हाथों से महसूस करने के लिए...," हाए राअं! फिर..?"

" फिर क्या? फिर वो प्यार करने लगे..." आरज़ू ने अपनी आँखों को फैलाते हुए कहा..

" प्यार? ये प्यार कैसे होता है अजजु!" सोनिया के बदन में आग सी लग गयी.. उसको 'ये' बातें सुनकर इतना मज़ा आ रहा था की उसने अपनी एक जाँघ को दूसरी के उपर चढ़ा लिया...

सोनिया का भी लगभग वैसा ही हाल था.. अब वो दोनो विकी और स्नेहा से अपना ध्यान हटाकर एक दूसरी का हाथ मसल्ने में लगी हुई थी.. और शायद उनमें से किसी को इसकी खबर भी ना हो.. सब कुच्छ अपने आप हो रहा था..," प्यार.. 'उसको' 'उसमें' डाल कर करते हैं.." सोनिया हर अंग के लिए 'उस' और 'वो' सर्वनाम का प्रयोग कर रही थी... चाहे वो पुरुष का हो या स्त्री का..

" ये उसको उसमें क्या लगा रखा है.. खुल के बोल ना.. मुझे समझ नही आ रहा" समझ तो सोनिया को सब आ रहा था.. पर वो भी क्या करती.. मरी जा रही थी.. 'उसको' 'उसमें' का नाम आरज़ू के मुँह से सुन'ने को....

" तुझे समझना है तो समझ ले.. मैं नाम नही लूँगी.. इतनी बेशर्म नही हूँ में..." आरज़ू किनारे पर रह कर ही 'काम-नदी' में तैरने का अहसास सोनिया को करना चाहती थी...

" अच्च्छा चल बोल.. मैं कुच्छ कुच्छ समझ रही हूँ.. पर उसमें मज़े क्या आते होंगे.. लड़की को दर्द नही हो रहा होगा.. इतना बड़ा... " सोनिया ने भी हाथ से 'उसकी' लंबाई मापते हुए कहा...

" वही तो मैं देखना चाहती थी.. घर पर मैं अकेली तो थी ही.. मैने सोचा.. देखूं तो सही.. क्या मज़ा आता है.. फिर मैने.. देख किसी को बताना मत!" आरज़ू पशोपेश में थी.. बताए कि नही...

सोनिया ने मौखिक जवाब नही दिया.. बस अपने हाथ से उसका हाथ कसकर दबा दिया..

"फिर मैने.. अपनी सलवार निकाल कर देखी.. 'मेरी वो' लाल हो गयी थी.. और उसमें से पानी टपक रहा था..."

"हाए.. फिर.." सोनिया ने एक बार उसका हाथ छ्चोड़ कर 'अपनी' की सलामती चेक की.. और फिर से उसका हाथ पकड़ लिया... और सहलाने लगी.. उसकी आँखें बंद होने लगी थी.. कामुकता से...

"फिर मैने 'उसको' हाथ लगा कर देखा.. बहुत गरम हो रखी थी.. हाथ लगाने में बड़ा मज़ा आया.. उस वक़्त.. पता नही क्यूँ.. ? उस वक़्त मेरी आँखों के सामने 'कविश' का चेहरा घूम रहा था.. हमारे पड़ोस में जो रहता है.. मुझ पर लाइन मारता है अभी तक.."

"फिर.. तूने उसको बुला लिया क्या?" सोनिया ने आसचर्या से अलग हट'ते हुए आरज़ू के चेहरे को देखा...

" नही यार.. तू सुन तो सही.. फिर पता नही मुझे क्या सूझी.. मैं उंगली से 'इसको' कुरेदने लगी.. और अचानक पूरी उंगली इसके अंदर घुस गयी..

" फिर..." सोनिया का चेहरा तमतमा उठा...

" फिर क्या? इतना दर्द हुआ की पूच्छ मत.. मेरी तो चीख ही निकलने को हो गयी थी.. 'वहाँ' से खून बहने लगा.. मैं रोने लगी..!"

"पर वो तो आता ही है.. पहली बार.. मैने सुना है..." सोनिया कामवेस में भूल ही गयी की वो नादान बन'ने का नाटक कर रही है...

" हां.. पर 'वो' मुझे तब नही पता था ना.. मैं छ्होटी थी.. पर मैने उसी दिन फ़ैसला कर लिया था.. ये काम में किसी के साथ नही करूँगी.. चाहे कविश हो या कोई और... ये लड़की किसी के हाथ नही आएगी.." ( )

" फिर क्या हुआ? बता ना.. पूरी बात बता..." सोनिया का हाथ आरज़ू की जाँघ पर लहराने लगा..

" और क्या बताऊं? हो तो गयी पूरी बात..." आरज़ू ने उसका हाथ परे झटकते हुए कहा.. बातों ही बातों में वो भी कब की बहकर 'होश' में आ चुकी थी..

" क्या तू सच में ही किसी को कभी भी हाथ नही लगाने देगी अजजु?"

" नही.. अब सोच रही हूँ.. लगाने दूँगी.. अब तो 'वो' भी बड़ी हो गयी होगी ना.." कहकर आरज़ू ने बत्तीसी निकाल दी..

रोहित सबसे अलग थलग चुप चाप आँखें बंद किए बैठा शालिनी के ख्यालों में खोया हुआ था. 3 साल से एक दूसरे की आँखों में बसे थे दोनो.. बे-इंतहा प्यार करते थे एक दूसरे से.. और दोनो को ही इस का अहसास था.. पर दोनो के बीच झिझक ज्यों की त्यों कायम थी.. सिर्फ़ एक मौका ऐसा आया था जब रोहित उसके रूप यौवन को देख कर बहक सा गया था.. बाली उमर थी दोनो की, शालिनी इकरार करने के बाद सातवी बार उस'से मिलने आई थी.. अकेली.. टिलैयर लेक पर.. और दोनो वहाँ पायदों की झुर्मुट में जा बैठे थे.. एकांत में माहौल ही ऐसा बन गया था की रोहित उसके ग्रे टॉप में छुपे मादक उभारों को देख अपनी सुध बुध खो बैठा..

" तुम मुझसे प्यार करती हो ना शालिनी...?" रोहित से रहा ना गया तो उसने उसको छूने की इजाज़त के रूप में ये सवाल पूच्छ ही लिया...

शालिनी कितनी ही देर से उसकी आँखों में झाँक रही थी.. पर वो नादान रोहित के लड़कपन में छिपि जवान लड़की के प्रति उसकी मर्दानी प्यास को ताक ना सकी थी.. रोहित के सवाल पूछ्ते ही उसने अपनी नज़रें हसीन अंदाज में झुकाई और उसकी काली ज़ुल्फो में से एक लट उसकी आँखों के सामने आ गिरी.. मानो वो कोई परदा हो.. हया का परदा.. कुच्छ देर यूँही चुप रहने के बाद उसने शरमाते हुए लंबी साँस लेते हुए कहा..," कितनी.. बार पूछोगे?"

" जब तक तुम्हारा जवाब 'हां' में मिलता रहेगा तब तक.. जब जब तुम मेरे सामने आओगी.. तब तब.. तुम्हे नही पता शालु.. तुम्हारे चेहरे पर ये हया की लाली तभी आती है , जब मैं तुमसे ये सवाल पूछ्ता हूँ.. और तुम्हारी इसी अदा पर में जान देता हूँ.." आज रोहित को वो कुच्छ ज़्यादा ही सेक्सी लग रही थी..

" हां.. करती हूँ.. आइन्दा मत पूच्छना वरना मैं मना कर दूँगी हां..." शालिनी के चेहरे पर वही मुस्कान उभर आई.. जिसने पहली नज़र में ही रोहित को उसका दीवाना बना दिया था....

" तुम इश्स दुनिया की सबसे हसीन खावहिश हो शालु.. तुमको पाकर तो में पागल ही हो जवँगा..."

"वो तो तुम अब भी हो.. पागल! हे हे.." और स्नेहा ने फिर से रोहित की आँखों में आँखे डाल ली...

" तुम्हारी आँखें कितनी प्यारी हैं शालु.. मन करता है.. इन्हे देखता ही रहूं.."

" और कोई काम नही है क्या?" शालिनी ने मुस्कुराते हुए उसको चिड़या....

"है ना.. तुम्हारे होंठ कितने प्यारे हैं.. मन करता है.. इनको चूम लूँ..."

"धात.. तुम तो सच में पागल हो.. " शालिनी ने अपने होंठो को उसकी नज़र से बचाने के लिए अपनी जीभ निकाल दी.. तब भी बात नही बनी तो असहज होकर नज़रें झुकाती हुई बोली..," ऐसे मत देखो प्लीज़!"

" क्यूँ ना देखूं.. सब कुच्छ मेरा ही तो है ये.. तुम सिर से पाँव तक सारी मेरी हो ना शालु.. मैं जो चाहे कह सकता हूँ.. जहाँ चाहे देख सकता हूँ.. जो चाहे छू सकता हूँ.. है ना?" रोहित अधीर हो उठा था...

शालिनी शर्मा कर दूसरी और घूम गयी.. रोहित के इन्न शब्दों ने उसकी पवित्रता को चुनौती सी दी थी.. उसके अरमानो को हवा सी दी थी..

रोहित ने अपना कांपता हुआ हाथ उसकी कमर पर रख दिया.. ये उसका भी पहला मौका था.. कुँवारी लड़की के तपते जिस्म को छूने का...

स्पर्श पाते ही शालिनी का पूरा जिस्म लरज सा गया.. उसकी कमर ने यूँ झटका खाया मानो किसी नाव की पतवार टूट गयी हो," नही प्लीज़...!"

" छूने दो ना मुझे.. छूकर देखने दो ना.. तुम.. अंदर से कैसी हो.." रोहित की साँसें उखाड़ने लगी थी..

" नही.. !" शालिनी अपनी कमर को झटका सा देते हुए उसकी और घूम गयी.. और उसका हाथ पकड़ लिया..," मैं मर जाउन्गि.. ऐसे मत बोलो प्लीज़.."

तभी अचानक दोनो ठगे से रह गये.. एक पोलीस वाला जाने कहाँ से निकल कर उनके सामने आ गया..," क्या हो रहा है?"

दोनो सकपका कर एकद्ूम उठ खड़े हुए.. ," कुच्छ नही.. बस.. बातें कर रहे थे..!" जवाब रोहित ने दिया था.. शालिनी उन्न दोनो से कुच्छ दूर जाकर मुँह फेर कर खड़ी हो गयी...

" हुम्म.. मुझे सब पता है.. यहाँ कैसी बातें होती हैं.. जानते नही क्या यहाँ रंडीपने पर रोक है...!" पोलीस वाले ने शालिनी को उपर से नीचे तक देखते हुए कहा..," चलो.. साहब के पास चलो..."

रोहित का खून खौल गया.. पर वा बात को बढ़ाना नही चाहता था..," मेरे पास ये 200 रुपए हैं...!"

पोलीस वाले ने बिना देर किए दोनो नोट लपक लिए..," आइन्दा कभी आओ तो पहले मुझसे मिल लेना.. समझे.. मैं वहाँ गेट के पास ही मिलता हूँ.. चलो ऐश करो!" कहते हुए पोलीस वाला वहाँ से गायब हो गया...

" आओ शालु.. बैठ जाओ.. अब कोई डर नही है.. कुत्ता हड्डी लेकर चला गया..!" रोहित शालिनी के पास आकर खड़ा हो गया...

" नही.. चलो यहाँ से.. मैं यहाँ नही रुक सकती.." शालिनी पलटी तो उसकी आँखों में आँसू थे.. पोलीस वाले ने बात ही ऐसी कही थी.. 'रंडीपना'

उसके बाद दोनो वहाँ से चल दिए.. रोहित ने उस'से बात करने की कोशिश की पर वह सामान्य नही हो सकी.. अंत में भी दोनो बिना बोले ही एक दूसरे से अलग हो गये...

'वो' दिन था और आज का दिन.. रोहित और शालिनी के प्यार को फिर कभी शारीरिक जज्बातों के पंख नही लग पाए.. वो आज भी ऐसे ही थे.. जैसे पहले दिन.. एक दूसरे से बे-इंतहा प्यार करते थे.. पर आँखों ही आँखों में.. कभी हाथ तक नही पकड़ा था.. दोनो ने एक दूसरे का...

रोहित ने आँखें खोल कर शालिनी को देखा... वह सोई हुई थी.. उस'से 2 सीट आगे
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11-26-2017, 02:05 PM,
#98
RE: College Sex Stories गर्ल्स स्कूल
गर्ल्स स्कूल पार्ट --56



मनु ने नज़रें घूमाकर पिछे बैठी वाणी को देखा, वह मनु की सीट के पिछे सिर रख कर सो चुकी थी.. मानसी भी सोई हुई थी.. 'अमित' के पास चला जाए' ऐसा सोचकर जैसे ही वह उठने को हुआ, उसको हूलका सा झटका लगा और वाणी एकदम से उठ गयी.. एक हाथ से आँखें मलते हुए मनु को घूरा.. वह वापस ही बैठ गया..

वाणी के दूसरे हाथ में अब भी मनु की शर्ट का कोना था जो उसने मजबूती से पकड़ा हुआ था.. आँखों को एक खास तेवर से मतकाते हुए उसने आँखों ही आँखों में पूचछा," कहाँ भाग रहे हो बच्चू!"

"कुच्छ नही.. पर मेरी शर्ट तो छ्चोड़ दो.. फट जाएगी..." मनु ने कुच्छ बात धीरे से बोलकर और कुच्छ बात इशारों में कही...

वाणी ने अपने दोनो हाथ उठाकर एक मादक सी अंगड़ाई ली.. सचमुच उसका कोई जवाब नही था.. मनु ने वाणी के अंगड़ाई लेते हुए हर पल का भरपूर आनंद लिया.. वाणी ने जमहाई सी लेते हुए अपने मुँह पर हाथ रखा और सोई सोई सी आवाज़ में बोली," कहाँ आ गये हम.. और कितनी दूर रह गया नैनीताल...

मनु के जवाब ना दे पाने पर वह उठी और सबसे आगे वाली सीट के पास पहुँच गयी.. दिशा शमशेर की छ्चाटी पर सिर टिकाए आराम से सोई हुई थी..

"जीजू!" वाणी ने शमशेर का कंधा पकड़ कर हिलाया.. शमशेर तुरंत उठ गया," हां वाणी? क्या हुआ?"

" और कितनी देर लगेगी? मुझे भूख लगी है..." वाणी ने पिछे बैठकर उसको टकटकी लगाकर देख रहे मनु की और देखते हुए कहा..

शमशेर ने शीशे पर अपने हाथ लगाकर उनके बीच अपनी आँखें जमा कर बाहर देखते हुए अंदाज़ा लगाने की कोशिश की ही थी कि ड्राइवर ने अचानक ब्रेक लगा दिए.. बस में बैठे सभी लोगों की झटके के साथ ही आँख खुल गयी.. अगर वाणी ने सीट को अच्छे से ना पकड़ा होता तो वह आगे की और गिर ही गयी थी बस!

"क्या हुआ?" शमशेर ने वाणी को संभाला और झल्लाते हुए ड्राइवर से पूचछा...

"अचानक कोई बस के आगे आ गया साहब.. परदेशी लगते हैं.. उनके साथ कोई में साब भी हैं...हाथ दे रहे हैं..." ड्राइवर के बोलते बोलते बस की खिड़की पर थपकियाँ लगनी शुरू हो गयी थी....

शमशेर, वासू और विकी ने एक दूसरे की और देखा और वासू सबसे पहले बोल पड़ा.." बिठा लेते हैं बेचारों को.. पिछे जगह तो है ही... वैसे भी अगर आदमी आदमी के काम नही आएगा तो फिर हम'मे और जानवरों में अंतर ही क्या रहेगा? हर धर्म यही......"

" खोल रहा हूँ प्रभु.. खोल रहा हूँ.." विकी में अब और प्रवचन सहन करने की ताक़त नही बची थी.. वह उठा और झट से बस की खिड़की खोल दी," हां.. क्या बात है..."

खिड़की के सामने खड़ा गोरा चिटा युवक कोई 22-23 साल का रहा होगा.. कद करीब करीब 5'9".. उसके पिछे सिर से पाँव तक परदा किए खड़ी युवती का कद उस्स'से इंच भर ही कम था..

युवक ने बात करने में समय जाया नही किया और उपर ही आ चढ़ा... युवती की फुर्ती भी देखते ही बन रही थी.. वह भी साथ साथ ही उपर आ चढ़ि और अपना घूँघट उतार फैंका," हा हा हा हा हा..."

" ऊई मुम्मय्ययी... मूँछहों वाली आंटी!" वाणी की आसचर्या से चीख निकल गयी....

"चुप कर.. लूटेरे हैं... " सहमी हुई दिशा ने वाणी का हाथ पकड़ कर पिछे खींच लिया... इस दौरान वासू ने अपनी मुत्ठियाँ कस ली थी.. उनको सबक सिखाने के लिए...

" नही जी बेहन जी.. हम क्या आपको लूटेरे लगते हैं... हम तो नैनीताल जा रहे थे. बाइक ट्रिप पर.. बाइक हमारी रास्ते में ही खराब हो गयी और .. पैसे हो गये ख़तम.... दोनो के.. कोई लिफ्ट दे ही नही रहा था.. माफ़ करना.. हमें ये रास्ता इकतियार करना पड़ा.. हे हे हे..." युवक ने बत्तीसी निकालते हुए शमशेर की और देखा.. जो अब तक हँसने लगा था...," अब इसकी साडी तो उतरवा दो.. बड़ा बेहूदा लग रहा है ये नौटंकी बाज..."

"हमें ले तो चलोगे ना.. भाई साहब! " सदी वाले लड़के ने शमशेर की और हाथ जोड़ते हुए कहा....

" चलो ड्राइवर... " शमशेर ने कहा और उनसे मुखातिब हुआ," वैसे कौनसी जगह है ये.. ?"

" गजरौला यहाँ से 5 काइलामीटर आगे है... ये जगह कौनसी है.. ये हमें नही पता.. हमारी सीट कौनसी है..? साडी को उतारकर बॅग में रखते हुए उसने कहा..

" हमारे सिर पर बैठ जाओ! पीछे सीट नही दिख रही क्या?" विकी ने झल्लाते हुए कहा.. कम्बख़्तों ने उसके और स्नेहा के रंग में भंग डाल दिया था...

बस रुकते ही सब एक एक करके उतरने लगे.. राज ने उठते हुए वीरू के कंधे पर हाथ रखा और कहा," तुम यहीं रहो.. मैं तुम्हारे लिए खाना यहीं ले आता हूँ..बेवजह तकलीफ़ होगी..."

"कोई ज़रूरत नही है भाई.. मुझे भूख नही है.. तुम जाकर खा लो.. मेरे लिए बस पानी ले आना.." वीरू ने काफ़ी देर से घुटने से मूडी हुई टाँग को सीधी करके बराबर वाली सीट पर फैला दिया...

"चल ठीक है.. मैं खाना पॅक करवा लाता हूँ.. बाद में दोनो इकट्ठे ही खा लेंगे.."

"अरे कहा ना.. मुझे भूख नही है... तुम खा लो यार.."

"चल ठीक है.. तुम आराम करो.." कहते हुए राज भी दूसरों के साथ बस से उतर गया...

नये मुसाफिर चुपचाप अपनी सीटो पर बैठे थे.. विकी उनके पास आया और बोला..," तुम्हे भूख नही है क्या?"

"भूख तो बहुत जोरों की लगी है.. बड़े भैया.. पर हमारे पास पैसे नही हैं.. पहले बता देना अच्च्छा होता है.. है ना?" साडी वाले छैला ने कहा...

" चलो उठो... खाना खा लो..." विकी ने कहा और नीचे उतर गया.. वो दोनो भी उसके पिछे पिछे हो लिए...

"अब बोल शमशेर भाई.. अब तो तेरा गजरौला भी आ गया..." विकी ने शमशेर को एक तरफ बुलाते हुए कहा...

" छ्चोड़ ना यार.. अब तो वासू जी से तेरा पिछा छ्छूट गया ना.. क्यूँ टेन्षन लेता है.. नैनीताल चलकर मैं भी तेरे साथ पीऊँगा... प्रोमिस!"

"और आपके पिच्छले प्रोमिस का क्या हुआ.. नही भाई.. मैं अब नही मान'ने वाला.. तूने यहाँ तक सब्र रखने के लिए बोला था.. मैने रख लिया.. अब और सहन नही होगा.. यहाँ से तो टंकी फुल करके ही चलूँगा.. तुम्हे साथ ना देना हो ना सही.. मैं अकेला ही गम हल्का कर लूँगा.." कहकर विकी बार की तरफ बढ़ने लगा...

"अच्च्छा रुक तो सही.. मैं वासू जी को बोल देता हूँ.. वो बच्चों को संभाल लेंगे... वासू जी!" शमशेर ने वासू को आवाज़ लगाई...

" आइए ना शमशेर जी.. कब से पेट में चूहे नाच रहे हैं.." वासू ने पास आते ही कहा..

" वो क्या है कि.. हम थोड़ी देर में हाज़िर होते हैं.. ज़रा बच्चों का ख़याल रखिएगा.." शमशेर ने वासू को कहा...

"पर क्यूँ.. आप कहाँ जा रहे हैं..?" वासू ने तुरंत सवाल किया...

" कहीं नही.. पहले बच्चे खा लें.. हम तब तक यहीं बैठ जाते हैं.. बार में.. इसी बहाने मूड भी फ्रेश हो जाएगा.. विकी भाई का.. क्यूँ विकी जी..?" शमशेर ने विकी की और देखते हुए कहा...

विकी ने काई बार अपनी गर्दन को 'हां' में हिलाया..

"छ्हि.. छि.. छि.. पढ़े लिखे होकर भी आप.. वो देखिए वहाँ विग्यपन के उपर कितने बड़े बड़े अक्षरों में लिखा है.. 'शराब स्वास्थया के लिए हानिकारक है.. और फिर..." वासू को इस बार विकी ने बीच में ही रोक दिया..

" शास्त्री जी, स्वास्थ की फिकर वो लोग करते हैं.. जिनके स्वास्थ में कोई प्राब्लम हो.. हमें अपने उपर कोई शक नही है.. पूरे हत्ते कत्ते मर्द हैं.. फिर क्यूँ ना जिंदगी का मज़ा लें.. क्यूँ ना खा पीकर जियें? ये टिप्पणी सिर्फ़ कमजोर और बीमार लोगों के लिए होती है.. उनको इस'से बचकर रहना चाहिए..!"

"खूब कहा आपने.. इसका अर्थ तो ये हुआ कि अगर मैं शराब नही पीता तो मैं कमजोर आदमी हूँ.. मैं मर्द नही हूँ क्या?" और वासू ने कहते हुए अपनी आस्तीन उपर चढ़ा ली... "चलिए.. मैं भी चलता हूँ आपके साथ.. देखूं तो सही कौनसी मर्दानी दवा लेते हैं आप?"

शमशेर ने वासू को टालना चाहा पर विकी ने वासू को जैसे ललकार ही दिया," आप रहने ही दें तो अच्च्छा है.. अंदर गंध बड़ी तेज होती है.. आपका कोमल शरीर सहन नही कर पाएगा...."

"नही नही.. मैं भी साथ ही चलता हूँ.. देखते हैं किसका शरीर कोमल है.. किसको होता है नशा.. मैं ज़रा अंजलि जी को बोल आता हूँ.. बच्चों का ध्यान रखने के लिए..."कहकर वासू तेज़ी से अंजलि की और बढ़ गया.. होटेल के बाहर खड़े सभी उनका इंतजार कर रहे थे..

"क्या है विकी.. तुझे पीनी थी तो पी लेता चुपचाप.. तमाशा हो जाएगा.. पता है.. उसने कभी पी नही है..!" शमशेर ने विकी पर बिगड़ते हुए कहा..

" तभी तो मज़ा आएगा.. इसी ने तो मेरे आधे रास्ते की मा-बेहन की थी.. तू मत बोलना भाई.. सफ़र में थोडा बहुत तमाशा हो भी गया तो चलेगा.. तौर पर आख़िर आते किसलिए हैं.. मस्ती करने के लिए ही ना..." कहते हुए विकी ने बत्तीसी निकाल दी... "ओये.. तुम लोग क्या बातें सुन रहे हो... चलो खाना खाओ!" विकी ने अचानक पिछे पलट'ते हुए कहा.. वो दोनो वहीं खड़े थे.. विकी के पिछे पिछे आकर..

"भाई.. वो क्या है की.. पैसे तो हमारे पास नही हैं.. पर हम सोच रहे हैं कि लगे हाथ हम भी अपनी मर्दानगी चेक कर लें.. हे हे हे!" युवक धीरे धीरे उंगली पकड़ कर कलाई तक आ गया था...

विकी ने शमशेर को देखा.. उसकी तरफ से कोई प्रतिक्रिया ना मिलने पर खुद ही बोल पड़ा," पहले पी तो रखी होगी ना.. कभी कभार..!"

" कभी कभार..? हां.. पी रखी है.. कभी कभार..!" दोनो एक साथ बोल पड़े..

"फिर ठीक है.. ठीक है ना शमशेर भाई.. अब तो ये भी हमसफर ही हैं.. ओये.. तुम लोग अपने अपने नाम तो बता दो..!"

"मैं हूँ मानव.. और ये है रोहन.. " साडी वाले ने इंट्रोडक्षन करवाई..

तब तक वासू भी आ गया था..," चलो.. देखते हैं.. मैं बोल आया मेडम को.."

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प्रिया, रिया, राज और स्नेहा एक ही टेबल पर बैठे थे..

" मैं वीरू को पानी दे आता हूँ.. " कहकर राज जैसे ही उठने लगा, रिया ने उसको रोक दिया," मुझे भी भूख नही है राज! लाओ.. मैं ले जाती हूँ.. पानी.."

रिया ने उसके हाथ से पानी ले लिया..

"पर उसने मुझको बोला था", राज को वीरू के व्यवहार का पता था...

" मेरे छ्छूने से क्या ये जहर हो जाएगा...?" रिया ने बनावटी गुस्से से उसको देखा...

"नही, मेरा ये मतलब नही था.. पर..." राज की बात बिना सुने ही रिया वहाँ से निकल गयी... रिया ने बस के बाहर खड़े होकर देखा.. बाहर रोशनी होने की वजह से बस के अंदर का कुच्छ दिखाई नही दे रहा था.. उसने 'लंबी' साँस लेकर हिम्मत जुटाई और बस में चढ़ गयी...

"ये लो पानी..!" रिया ने हाथ आगे बढ़कर वीरू से कहा...

" राज कहाँ मर गया है.. मैने उसको कहा था.. पानी लाने के लिए..!"

" तो क्या हुआ.. मुझे भी भूख नही थी.. मुझे आना था.. इसीलिए मैं ले आई.. वो खाना खा रहा है.." रिया ने हाथ आगे किए हुए ही कहा.. वीरू का प्यारा चेहरा देखकर उसका मॅन हो रहा था की एक चुम्मि तो ले ही ले..

वीरू ने अपना हाथ बढ़कर उस'से पानी ले लिया.. उसके बाद भी जब रिया वहीं खड़ी रही तो वीरू बौखला सा गया," अब यूँ टुकूर टुकूर क्या देख रही हो.. जाओ!"

"पर मुझे भूख नही है.. मैं जाकर क्या करूँगी वहाँ.." रिया ने कोमल आवाज़ में कहते हुए अपना हाथ वीरू के सामने वाली सीट पर रख लिया..

" तो मत जाओ.. मेरे सामने क्यूँ खड़ी हो.. जाकर अपनी सीट पर क्यूँ नही बैठती.."

"लो बैठ गयी!" कहते हुए रिया वीरू के सामने वाली सीट पर जा बैठी.. जिसपर पहले से ही वीरू का पैर रखा हुआ था.. जाने- अंजाने उसकी कमसिन जांघें उसकी जीन के उपर से वीरू का पैर छ्छू रही थी....

प्रिया, रिया, राज और स्नेहा एक ही टेबल पर बैठे थे..

" मैं वीरू को पानी दे आता हूँ.. " कहकर राज जैसे ही उठने लगा, रिया ने उसको रोक दिया," मुझे भी भूख नही है राज! लाओ.. मैं ले जाती हूँ.. पानी.."

रिया ने उसके हाथ से पानी ले लिया..

"पर उसने मुझको बोला था", राज को वीरू के व्यवहार का पता था...

" मेरे छ्छूने से क्या ये जहर हो जाएगा...?" रिया ने बनावटी गुस्से से उसको देखा...

"नही, मेरा ये मतलब नही था.. पर..." राज की बात बिना सुने ही रिया वहाँ से निकल गयी... रिया ने बस के बाहर खड़े होकर देखा.. बाहर रोशनी होने की वजह से बस के अंदर का कुच्छ दिखाई नही दे रहा था.. उसने 'लंबी' साँस लेकर हिम्मत जुटाई और बस में चढ़ गयी...

"ये लो पानी..!" रिया ने हाथ आगे बढ़कर वीरू से कहा...

" राज कहाँ मर गया है.. मैने उसको कहा था.. पानी लाने के लिए..!"

" तो क्या हुआ.. मुझे भी भूख नही थी.. मुझे आना था.. इसीलिए मैं ले आई.. वो खाना खा रहा है.." रिया ने हाथ आगे किए हुए ही कहा.. वीरू का प्यारा चेहरा देखकर उसका मॅन हो रहा था की एक चुम्मि तो ले ही ले..

वीरू ने अपना हाथ बढ़कर उस'से पानी ले लिया.. उसके बाद भी जब रिया वहीं खड़ी रही तो वीरू बौखला सा गया," अब यूँ टुकूर टुकूर क्या देख रही हो.. जाओ!"

"पर मुझे भूख नही है.. मैं जाकर क्या करूँगी वहाँ.." रिया ने कोमल आवाज़ में कहते हुए अपना हाथ वीरू के सामने वाली सीट पर रख लिया..

" तो मत जाओ.. मेरे सामने क्यूँ खड़ी हो.. जाकर अपनी सीट पर क्यूँ नही बैठती.."

"लो बैठ गयी!" कहते हुए रिया वीरू के सामने वाली सीट पर जा बैठी.. जिसपर पहले से ही वीरू का पैर रखा हुआ था.. जाने- अंजाने उसकी कमसिन जांघें उसकी जीन के उपर से वीरू का पैर छू रही थी....

वीरू ने एक नज़र रिया की और देखा और अपना पैर वापस खींच लिया.. अपनी टाँग को वापस सीट के नीचे से लंबा करते हुए वा सीधा होकर बैठ गया..

"एक बात पूच्छू?" रिया ने हुल्की आवाज़ में वीरू को टोका...

"क्यूँ?" वीरू ने अजीब तरीके से उसको घूरा.. जैसे उसको मालूम हो की वो क्या पूच्छने वाली है..

"रहने देती हूँ.. पर तुम बात बात पर ऐसे फदक क्यूँ जाते हो?.. तुम्हे तो मेरा पास बैठना भी नही सुहाता.. आराम से ही तो पूचछा था.." रिया ने अपना मुँह पिचकाते हुए कहा...

"तो क्या अब डॅन्स करने लग जाउ? तुम कोई रिया सेन हो जो तुम्हारे पास बैठने से ही मैं पागल हो जाउन्गा.. यहाँ बैठो, वहाँ बैठो.. मुझे क्या फरक पड़ता है.." वीरू ने बिगड़ते हुए कहा और बोतल खोल कर अपने होंठो से लगा ली..

"तुम्हे रिया सेन बहुत पसंद है क्या?" रिया ने उसकी बात आगे बढ़ने से उत्साहित होते हुए कहा..

"नही.. बहुत घटिया लगती है मुझे.. थर्ड क्लास.. मुझे तो इश्स नाम से ही नफ़रत है...तुम्हे कोई प्राब्लम है..?" वीरू ने जान बूझ कर उसको चिड़ाया..

"नही.. मुझे क्या प्राब्लम होगी भला" रिया सहम सी गयी..," मुझे पानी पीना है.."

"तो पी लो जाकर.. मुझसे पूच्छ कर करती हो क्या हर काम..."

"इसी मैं से थोड़ा दे दो ना.. मैं जाकर और ले आउन्गि.. बाद में.." रिया ने अपनी सुरहिदार गर्दन को खुजलाते हुए कहा..

"नही.. ये मैने झूठी कर दी.. तुम नीचे जाकर पी लो..!" वीरू टस से मस ना हुआ..

"मुझे कोई प्राब्लम नही है.. तुम्हारा झूठा पीने में.." रिया ने अपनी नज़रें वीरू की आँखों में गाड़ा दी...

" पर मुझे है.. मैं क्यूँ किसी को.." वीरू की बात अधूरी ही रह गयी.. रिया ने बोतल को धोखे से उसके हाथों से झटकने की कोशिश की.. दोनो के हाथ बोतल पर बँधे हुए थे अब..

"छ्चोड़ो इसे.. मैं पहले ही कह रहा हूँ.. छ्चोड़ो नही तो एक दूँगा कान के नीचे.." वीरू ने कहते हुए महसूस किया.. उसका विरोध रिया के कोमल हाथों के स्पर्श से पिघलता जा रहा है.. वीरू के हाथ रिया के हाथों के उपर थे.. कहते कहते उसकी पकड़ ढीली होती गयी.. और अंतत: बोतल उसके हाथों से छ्छूट कर रिया के हाथों में थी...

रिया उसकी और विजयी भाव लेकर शरारती ढंग से मुस्कुराइ और अपने गुलाबी होंठो को खोल कर गोल करके बोतल का मुँह उनमें फँसा लिया.. और मुँह उपर करके उसमें से पानी गटक'ने लगी..

वीरू हतप्रभ सा उसको देखता रह गया.. बोतल के मुँह पर ठीक उसी जगह उसके होंठ चिपके हुए थे.. उसको ऐसा महसूस हो रहा था जैसे रिया पानी नही बल्कि उसको पी रही है... अपने होंठो से.. अंजाने में ही वीरू के दिल से एक 'आह' सी निकली और उसके सारे शरीर में हुलचल सी मच गयी..

रिया इतनी हसीन थी की वीरू उसको अपलक निहारता रहा.. कभी उसकी आँखों में.. कभी उसके होंठो को.. और कभी गर्दन से नीचे.. पहली बार! पहली बार उसने रिया को इतने गौर से देखा..

"क्या देख रहे हो? ये लो.. अगर झूठा नही पीना तो बोल दो.. मैं और ले आती हूँ.." रिया ने बोतल उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा...

ठगे से अपनी सीट पर बैठे वीरू ने बिना कुच्छ बोले रिया के हाथों से बोतल ले ली.. और ले क्या ली.. उसको अपने होंठो से लगा कर सारा पानी गतगत पी गया.. रिया की साँसों की महक उसमें से अब भी आ रही थी शायद.. पानी ख़तम हो गया था.. पर बोतल अब भी उसके होंठो से ही लगी थी.. जाने कौन क्षण कामदेव ने उसको भी अपनी चपेट में लपेट लिया..

"हे हे हे.. पानी ख़तम हो गया.. और लेकर आऊँ?" रिया ने उसकी आँखों में आँखें डाल पूचछा..

वीरू ने बिना कुच्छ बोले ही बोतल उसकी और बढ़ा दी.. वह भी कुच्छ बोलना चाहता था.. पर उस मनहूस को मालूम नही था की कैसे बोले..

"पानी लाउ क्या? और.." रिया ने जैसे उसको बेहोशी से जगाया..

"उम्म.. हाँ.. ले आओ!" आख़िरकार वीरू बोला...

"मैं ही लेकर आऊँ या.. राज को भेजू?" रिया शायद वीरू के बहकने को पहचान गयी थी..

" उम्म.. तुम ही.. राज को भेज देना चाहे.. तुम्हारी मर्ज़ी है.."

रिया की आँखों में नयी चमक थी.. वीरू पर हुए असर का सुरूर उसकी आँखों में भी था.. उसकी चाल में भी.. वह लगभग मटक'ती हुई बस से नीचे उतर गयी.........

" और पी कर दिखाऊँ?" वासू ने बड़ी मुश्किल से अपना सिर टेबल से उपर उठाया और अपने गिलास को अपने सिर से भी उपर ले जाकर लहराने लगा... उसकी आँखें रह रह कर बंद हो जा रही थी...

"ये तो गया यार.. मैने पहले ही बोला था.." शमशेर अपना माथा पकड़े हुए था...

"कौन गया? कोई नही जाएगा इधार्ररर से.. कोई.. मरर्रर्ड नही जाएगा.. सिरररफ लॅडिस जाएँगी.." वासू उचक कर उठ बैठा और अपने दाँत निकाल कर फिर से ढेर हो गया.. टेबल पर...

"हा हा हा.. मर्द!" विकी ने दूसरी बोतल का ढक्कन खोल डाला...

"अब बस कर यार.. रहने दे और..." शमशेर ने उसके हाथों से बोतल लेने की कोशिश की..

"तुझे पता है ना भाई.. कुच्छ नही होगा मुझे.. तुझे पता है ना.. देख आज मुझे पी लेने दे.. क्या पता कल हो ना हो!" विकी ने शमशेर के हाथों से बोतल छ्चीन'ते हुए कहा और अपनी बत्तीसी निकाल दी...," तुम्हे और लेनी है क्या बच्चा लोग!"

"लेनी है भाई.. लेनी है.. हम आपको अकेला कैसे छ्चोड़ेंगे.. आख़िर तक साथ निभाएँगे आपका.." मानव ने गिलास खाली करके पनीर का टुकड़ा मुँह में डालते हुए कहा...

" तुम लोग भी मुझे पुर पियाक्कड़ लगते हो.. सालो.. आधी बोतल तो तुम दोनो ने अकेले ही खाली कर दी... मुझे क्या खाक नशा होगा..?" विकी ने उनके गिलास में शराब डालते हुए कहा," भाई, तुम भी लो ना.. ऐसे मज़ा नही आ रहा..!"

"सत्यानाश तो होना ही है अब.. चल बना दे मेरा भी.. देखा जाएगा.." शमशेर ने एक और गिलास सीधा कर दिया..

"भाई.. आपको दिशा से डर लगता है ना.. बोल दो लगता है.. मुझे तो वैसे भी पता है..?" विकी ने शरारती ढंग से मुस्कुराते हुए कहा..

"इसमें डर वाली कौनसी बात है..? हां.. पर अब मैं नही पीता.. उसी के कहने से.." शमशेर हँसने लगा...

"ये दिशा कौन है भाई..?" रोहन काफ़ी देर से चुपचाप बैठा था.. लड़की का नाम सुनते ही चौकन्ना हो गया...

"तुम्हारी भाभी है बे.. ऐसे आँखें क्यूँ फैला रहा है..." विकी ने जवाब दिया," वो भी साथ ही है.. बस में.. भाई साहब उसी के डर से नही पी रहे थे.. मुझे पता है.. वैसे एक और भी भाभी है तुम्हारी बस में... मेरे वाली..." विकी ने चमकते हुए कहा...

"इसमें बताने वाली बात क्या है भाई.. आपकी भाभी है तो हमारी भी भाभी ही हुई ना...!" मानव ने खीँसे निपोरी....

"आबे ढक्कन, तुम्हारी 2 भाभियाँ हैं और मेरी एक.. दूसरे वाली मेरी जान है.. मेरी होने वाली पत्नी.. स्नेहा!" विकी भाव-विहल हो उठा..

"हां.. तो इसमें बताने वाली बात क्या है.. आपकी जान है तो हमारी भी जा.." मानव की बात अधूरी ही रह गयी.. रोहन ने उसके सिर पर एक धौल जमाया," साले.. तेरे को इतनी भी अकल नही बची.. पीकर.. भाई की जान हमारी जान नही भाभी हुई.. समझा..!"

"चलो ठीक है.. पर जब सबकी जान हैं तो हमारी जान किधर हैं.. मुझे ये समझ नही आ रहा...!" मानव बहकी बहकी बातें कर रहा था..

"कितनी उमर है तेरी..?" विकी ने मानव से पूचछा... शमशेर चुपचाप उनकी बात सुन रहा था..

"22 साल भाई.. इसकी भी.."

"तो जल्दी से अपनी जान ढूँढ ले.. एक बार दुनियादारी के झमेले में फँस गया ना तो समझ ले गया काम से.. उसके बाद कुच्छ याद नही रहता.. सिवाय खाने कमाने के.. समझ गया ना तू...!" विकी ने दार्शनिक अंदाज में कहा...

"भाई.. बस में एक लड़की है.. बुरा ना मानो तो...!" रोहन ने हिचक कर दोनो की और देखा...

" आबे बोल बोल.. आज सब कुच्छ माफ़ है.. खुल कर बोल.. मुझे भाई बोला है ना.. जा किसी को हाथ लगा दे.. मैं बात कर दूँगा.. पर देख उमर भर के लिए.. ठीक कह रहा हूँ ना भाई.." विकी ने शमशेर की और देखा...

"यार! मैं बोर हो रहा हूँ.. तुम्हारी बाते सुनकर... कुच्छ और नही है क्या? बात करने के लिए...

"तू बोल.. कौनसी पसंद है तुझे.. बोल.. बता ना.." विकी ने शमशेर की बात को नज़र-अंदाज करते हुए रोहन से पूचछा...

"वो.. गौरी चित्ति सी.. जो इन सर के पास बैठी थी.. बहुत प्यारी है..." रोहन ने वासू को हाथ लगाते हुए कहा...

"ओइईई.. तेरी तो... वो तेरी भाभी है... " वासू चौंक कर उठ बैठा और रोहन का गला पकड़ लिया...

शमशेर और विकी ने चौंक कर एक दूसरे की आँखों में देखा.. बात कुच्छ कुच्छ उनकी समझ में आ गयी.. वो मुस्कुराने लगे...

" पर भाई.. मैने तो सुना था की गर्ल'स स्कूल से टूर जा रहा है.. यहाँ तो सारी बस में भाभियाँ ही भाभियाँ भरी पड़ी हैं.. कोई वेली नही है क्या?" रोहन ने मायूस होते हुए कहा...

"हा हा हा.. सभी सेट हैं बीरे.. इसीलिए तो कहता हूँ.. कल करे सो आज कर.. आज करे सो अब.. चलो.. जल्दी से ये ख़तम करो.. मूड फ्रेश हो गया है.." विकी ने सबके आख़िरी पैग बनाते हुए कहा...

पानी लेकर जब रिया दोबारा बस में चढ़ि तो वीरू सीट की एक तरफ बैठ गया था.. शायद इस इंतज़ार में की क्या पता रिया वहीं बैठ जाए.. उसके पास.. पर बदक़िस्मती से ऐसा नही हुआ

"ये लो, पानी..!" रिया ने पास आकर उसको पानी देते हुए कहा...

" हुम्म.. थॅंक्स... बैठ जाओ!" वीरू की आवाज़ अब निहायत ही शरीफ़ना थी..

रिया उसके साथ वाली दूसरी सीट पर बैठ गयी.. और चुपचाप उसको देखने लगी.. इतनी हिम्मत तो उसमें आ ही गयी थी.. वीरू की टोन बदल'ने पर...

"तुम मुझे जैसा समझती हो.. मैं वैसे नही हूँ रिया.. !" वीरू ने अपनी इमेज सुधारने के लिए भूमिका बाँधी...

"कैसा समझती हूँ मैं.. मैने तो कभी भी तुम्हे कुच्छ नही कहा.. उल्टा तुम ही मुझे धमका देते हो.. जब भी मैं तुमसे बात करने की कोशिश करती हूँ..."

"हुम्म.. वही.. मैं वही कह रहा हूँ.." वीरू ने 2 घूँट पानी पिया और बोलना जारी रखा," मुझे तुमसे कोई प्राब्लम नही है.. बट.. बेसिकली लड़कियों से मुझे चिड है.. जाने क्या समझती हैं अपने आपको.. बात करने की कोशिश करो तो समझती हैं कि... खैर.. 2 मीठी बात करते ही सिर पर चढ़ कर बैठ जाती हैं.. अपनी क्लास की लड़कियों को ही देख लो.. राज जब क्लास में आया तो कैसे उसका मज़ाक बना'ने की कोशिश कर रही थी.. हर नये लड़के के साथ वो ऐसा ही करती हैं.. भला ये कोई अच्च्ची बात है...?"

"पर मज़ाक करने में क्या बुराई है वीर..एंदर.. बाद में तो सब अच्च्चे दोस्त हो जाते हैं ना... ऐसे तो मैं भी हँसी थी.. जब मेडम ने मज़ाक किया था तुम दोनो के साथ..."

"वो मज़ाक था.. गे बोला था मेडम ने हमको.. समझती भी हो गे क्या होता है..?" वीरेंदर आवेश में आ गया..

रिया को मालूम था क्या होता है गे.. इसीलिए तो नज़र झुका कर बग्लें झाँकने लगी... वीरू ने स्थिति को भाँपा और बात सुधारते हुए बोला," गाली होती है ये.. चलो.. मेडम को तो हम कुच्छ नही कह सकते.. पर लड़कियों से चिड होगी कि नही.. ऐसे अनप शनाप बातों पर बत्तीसी निकाल कर हँसेंगी तो..."

"सॉरी वीरेंदर.. आगे से कम से कम मैं ऐसा नही करूँगी..."

"अरे नही नही.. मैने ऐसे तो नही बोला.. लो.. पानी पियो..!" वीरेंदर उसको अब और नाराज़ देखने के मूड में नही था...

"नही.. मुझे प्यास नही है.. क्या हम अच्छे दोस्त नही बन सकते वीरेंदर... क्या हम प्यार से नही रह सकते.. जैसे राज और प्रिया रहते हैं..." रिया ने भावुक होते हुए कहा...

"वो... तुम्हे पता है.. वो तो एक दूसरे से.. " बात को अधूरी छ्चोड़कर वीरू ने रिया की आँखों में झाँका.. उधर भी वैसी ही बेशबरी थी...," हम भी क्या..?" और वीरू ने बात को फिर अधूरा छ्चोड़ दिया...

"क्या?" रिया के गालों पर हया की लाली तेर गयी.. यही तो वो सुन'ना चाहती थी.. यही तो वो कहना चाहती थी.. जाने कब से?"

"तुम मुझे अच्च्ची लगने लगी हो रिया!" वीरू ने उसकी सीट के उपर रखा रिया का हाथ पकड़ लिया..

रिया को जैसे झटका सा लगा.. वीरू की स्वीकारोक्ति के बाद उसको उस स्पर्श में अजीब सी गर्माहट महसूस हुई.. ना चाहते हुए भी उसने अपना हाथ खींच लिया.. और नज़रें झुका कर अपनी उंगलियाँ मटकाने लगी...

"क्या हुआ? तुम्हे बुरा लगा..." वीरू ने भी अपना हाथ हिचकिचाकर वापस खींच लिया...

क्या कहती रिया आख़िर.. पिच्छले एक साल से उसके ही सपने देखकर नित यौवन में इज़ाफा करती आ रही रिया के लिए ये सब एक सपने जैसा ही था.. उसके सपने का साकार हो जाना.. पर उसको मालूम नही था.. अपने 'प्यार' को छ्छूने भर से जो असहनीया आनंद मिलता है.. यौवन के उस पड़ाव पर 'स्पर्श' को सिर्फ़ 'स्पर्श' तक कायम रखने की कोशिश में जान निकल जाती है.. आगे बढ़ कर चिपक जाने को मन करता है.. लिपट जाने को मन करता है.. चूम लेने को मन करता है.. उस प्यार को.. और जब ऐसा मुमकिन ना हो तो वापस हटना ही बहार होता है.. ठीक वैसा ही रिया ने किया था.. क्यूंकी 'यार' के आगोश की लत पड़'ने में वक़्त नही लगता.. पर जमाना लग जाता है, उस मीठे अहसास की टीस को दिल से निकालने में.. अगर वो स्पर्श 'स्पर्श' से आगे ना बढ़ पाए..

"सॉरी.. मुझे ऐसा नही करना चाहिए था.. पर मुझे लगा.. खैर.. बस एक आख़िर बात.. अगर किसी से ना कहो तो.." वीरू ने उसकी झुकी हुई आँखों में देखते हुए कहा..

रिया ने पलकें उठाकर वीरू से एक पल के लिए नज़रें मिलाई.. उसकी नज़रों में ही एक 'वादा' था.. किसी से कुच्छ भी ना कहने का..

"तुम मुझसे प्यार करती हो क्या?" वीरू ने बात कहने के बाद भी अपना मुँह खुला ही रखा.. मानो उसको जवाब होंठो से सुन'ना हो.. कानो से नही..

रिया हड़बड़ा गयी.. उसकी समझ में कुच्छ नही आया की क्या बोले.. क्या ना बोले.. अब ये भी कोई कहने की बात होती है.. समझ लेनी चाहिए थी वीरू को.. काफ़ी पहले ही.. रिया ने खंगार कर अपना गला सॉफ किया," मैं.. एक बार नीचे जा रही हूँ.. तुम्हारे लिए कुच्छ और लाना है क्या..?"

"नही.. !" वीरू ने सपाट सा जवाब दिया.. नाराज़गी भरा...

रिया सीट से खड़ी हो गयी.. जाने के लिए.. पर कदमों ने साथ नही दिया.. या शायद वो ही जाना नही चाह रही थी.. एक बार और 'वीरू' के मुँह से वही बात सुन'ना चाहती थी.. शायद इश्स बार 'हाँ' निकल सके..

"जाओ अब! यहाँ क्यूँ खड़ी हो..?" वीरू ने उसके चेहरे की और देखते हुए कहा..

"नही.. मुझे नही जाना.. तुम समझते क्या हो अपने आपको.. जब देखो सींग पीनाए तैयार रहते हो.. टक्कर मारने के लिए... चेहरा देखो तुम्हारा, कैसा हो गया है.." रिया ने अपने आपको वापस सीट पर पटक दिया...

"सॉरी बोला ना.. मैं तो बस ऐसे ही पूच्छ रहा था..." वीरू सहमा हुआ सा उसकी और देखने लगा..

"ऐसे ही पूच्छ रहा था.." रिया ने मुँह बनाकर उसकी नकल उतारी," मुझसे ही क्यूँ पूचछा.. किसी और से क्यूँ नही.."

"कोई और मुझे अच्छि ही नही लगी आज तक.. किसी और से पूछ्ता क्यूँ?" वीरू ने तपाक से जवाब दिया..

"हुम्म.. जैसे मैं तुम्हे सबसे प्यारी लगती हूँ..!" रिया अपने हल्क नीले कमीज़ के कोने को मुँह में लेकर चबाने लगी..

" हाँ.. लगती हो.. और कैसे कहूँ..." वीरू ने हाथ बढ़ा कर उसका हाथ पकड़ लिया..

और रिया जैसे बिना वजन की गुड़िया की तरह उसके आगोश में आ गिरी और सुबकने लगी..

वीरू ने उसका चेहरा अपने हाथों में लेकर उपर उठाया," रो क्यूँ रही हो?"

"पहले क्यूँ नही बोला..." कहकर रिया ने अपनी जवानियाँ उसके सीने में गाड़ा दी.. उसकी आँखों से भले ही आँसू टपक रहे थे.. पर उसके चेहरे पर खास चमक उभर आई थी.. आँखों में भी.. बिना कुच्छ कहे ही उसने सब कुच्छ बोल दिया.. वीरू ने अपना हाथ उसकी कमर से चिपकाया और हौले से उसके कान में गुदगुदी सी कर दी," आइ लव यू, रिया!"

रिया ने जैसे तैसे खुद को संभाला और अपने आँसू पुंचछते हुए बोली," मैं खाना लेकर आ रही हूँ.. खाओगे ना.. मेरे साथ!"

वीरू ने सहमति में सिर हिलाया और मुस्कुराने लगा," मेरा बात का जवाब तो तुमने दिया ही नही..."

"कौनसी बात का?" रिया ने उसकी आँखों में देखा और मुस्कुराने लगी..

"तुम मुझसे प्यार करती हो या नही.." वीरू भी मुस्कुराया..

"नही.. बिल्कुल नही.. क्यूंकी तुम एकदम गधे हो.." कहकर रिया एक बार फिर उस'से लिपट गयी...

बस में बैठे सभी बेशबरी से शमशेर, विकी, वासू, मानव और रोहन के आने का इंतज़ार कर रहे थे.. तभी रिया और प्रिया बस में चढ़ि. रिया के हाथ में खाना था जिसे वो पॅक करवा कर लाई थी.. राज जाकर वीरू के पास बैठने लगा तो रिया ने उसको टोक दिया," तुम मेरी जगह बैठ जाओ राज... हम यहाँ खाना खा लेंगे..!"

[color=#8000bf][size=large]राज का मुँह खुला का खुला रह गया," वीरू तुम्हारे साथ खाना खाएगा?" राज
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Reply
11-26-2017, 02:05 PM,
#99
RE: College Sex Stories गर्ल्स स्कूल
गर्ल्स स्कूल पार्ट --57

हेल्लो दोस्तों मैं यानिआप्का दोस्त राज शर्मा पार्ट 57 लेकर हाजिर हूँ अब आप कहानी का मजा लीजिये

"क्या है?" वाणी की कोहनी अपने पेट में लगते ही मनु उच्छल पड़ा.. करीब 15 मिनिट से वो दोनो साथ साथ ही बैठे थे, पर चुपचाप!

"क्या है क्या? मैने क्या बोला है?" वाणी ने मनु को घूरते हुए कहा.. तभी वासू उनके पास से गुजरा और दोनो शांत हो गये.. कुच्छ ही पल बाद बस की लाइट्स ऑफ हो गयी. वो दोनो तब तक चुपचाप ही बैठे रहे जब तक वासू वापस पिछे नही चला गया!

उसके जाने के बाद मनु बोला," कोहनी क्यूँ मारी मुझे?"

"अच्च्छा! एक तो बैठने के लिए सीट दे दी.. उपर से नखरे दिखा रहे हो.. मेरी तो आदत है.. नींद में हाथ पैर चलाने की..." वाणी ने धीरे से कहा..

"ठीक है.. मैं पिछे चला जाता हूँ.. अमित के पास" कह कर मनु जैसे ही उठने लगा, वाणी ने उसकी शर्ट पकड़ कर वापस खींच लिया.. ज़रा सा भी प्रतिरोध ना करते हुए मनु वापस सीट पर जम गया, मानो वो भी नाटक ही कर रहा हो.. उठने का!

"अब क्या है?" मनु ने वापस बैठते ही मंद मंद मुस्कुराते हुए वाणी से सवाल किया..

"चुपचाप यहीं बैठे रहो.. समझे ना! मुझे पता है तुम्हे वहाँ जाने की क्यूँ लगी है..?" शायद वाणी सच में ही गुस्सा थी, अब की बार..

"तुम तो पागल हो..!" मनु वाणी की और देखकर मुस्कुराने लगा.. हालाँकि अंधेरे में चेहरे सॉफ नज़र नही आ रहे थे.. पर चेहरे के भाव तो पढ़े ही जा सकते थे..

"तुम्हे हँसी आ रही है? म्मै.. तुम्हारा सिर फोड़ दूँगी.. चलो एक बार.. तुम्हे तो में अच्छि तरह देख लूँगी..." वाणी ने भूंभूनाते हुए मनु की तरफ घूरा...

"पर तुम नाराज़ क्यूँ हो? बताओ तो सही.. मैने किया क्या है ऐसा...?" मनु ने फिर से मुस्कुराते हुए वाणी की भावनाओ की खिल्ली उड़ाई...

" मुझे नही करनी तुमसे बात.. जाओ जहाँ जाना है, मुझे पता है तुम किसके साथ बैठना चाहते हो!" अपने मीठे गुस्से का असर मनु पर ना होता देख वाणी बिदक कर रुन्वसि सी हो गयी...

मनु ने अपना हाथ वाणी की तरफ लेजाकार उसके कंधे के पास उसकी बाजू पर रख दिया.. वाणी को मानो असीम सुख की अनुभूति हुई.. इश्स बेबाक स्पर्श से.. उसने अपनी आँखें बंद करते हुए अपनी गर्दन पिछे सीट पर टीका ली.. लेशमात्र भी प्रतिरोध ना करते हुए.. पर अभी भी वह चुपचाप थी!

"समझा करो यार प्ल्स!" मनु ने हौले से बुदबुडाया," आगे मानी लेटी है..."

"मैं तो नासमझ हूँ.. उसी को समझाओ जाकर.. छोटी वाली को, तुम्हे तो वहीं बैठना अच्च्छा लगता है ना!" वाणी ने बिगड़ते हुए मनु का हाथ अपने कंधे से झटक दिया..

"उस्स'से मुझे क्या मतलब है? और तुम ऐसी छ्होटी छ्होटी बातों को दिल पर क्यूँ लेती हो..? अब शांत भी हो जाओ, मानी सुन लेगी.. हम चल कर बात कर लेंगे ना!" मनु ने फिर से अपना हाथ वाणी के कंधे के पास उसकी कोमल गुदाज बाजू पर रख दिया..

"तब तो तुम्हे मानी नही दिखी जब पिछे बैठकर दाँत निकाल रहे थे.." वाणी ने मासूम सा अपना चेहरा मनु की और घुमा दिया...

"वो.. वो तो मैं अमित की बात पर हंस रहा था.. मैं तो किसी और को जानता भी नही..." मनु ने सफाई दी..

"तो जान'ना चाहते हो ना.. जान लेना.. मैं करवा दूँगी जान-पहचान; अब तो खुश हो?" वाणी के हर बोल के साथ उसका नया रंग झलक रहा था..

"तुम कहना क्या चाहती हो!" मनु खिन्न हो चला था...

" यही की जहाँ तुम खुश रह सको, वहीं रहो! मुझे कोई प्राब्लम नही है..पर तुमने मेरा हाथ क्यूँ पकड़ा था?" पता नही वाणी अपना बे-इंतहा प्यार मनु पर जताने के लिए कैसे कैसे तरीके आजमा रही थी..

"और अगर मैं कहूँ की मुझे तुम्हारे सिवाय कोई और हाथ पकड़'ना ही नही है तो?" कहते हुए मनु का हाथ वाणी की बाजू से फिसल कर उसकी कलाई के पास आकर ठहर गया.. वाणी के दिल पर बात सुनकर क्या बीती होगी, इसका अंदाज़ा उसके प्रत्युत्तर से लगाया जा सकता है..

" और अगर तुमने मुझे छ्चोड़ दिया तो? मैं तो मर ही जाउन्गि मनु!" कहते हुए वाणी ने अपने दूसरे हाथ से मनु का 'वो' हाथ कसकर पकड़ लिया...

"धात पगली.. तुम सोच भी नही सकती तुम कितनी प्यारी लगती हो मुझे.. मुझे क्या.. तुम तो सबको इतनी ही प्यारी लगती हो.. इसीलिए जब भी तुम मुझ पर गुस्सा हो जाती हो.. तो मैं डर जाता हूँ.. कहीं...?" मनु ने उसको अपनी वफ़ा पर विस्वास दिलाने की कोशिश की...

वाणी की आँखें अंधेरे में भी चमक उठी.. उसके चेहरे पर फिर से शरारती भाव आने में एक पल भी नही लगा...," पता है.. मैं कभी भी सच्ची में गुस्सा नही होती... तुम्हारे सामने जानबूझ कर नाटक करती हूँ.. गुस्सा होने का!" वाणी ने अपनी आँखें तरेरते हुए कहा...

"क्यूँ?" मनु ने शरारत और आस्चर्य की मिली जुली प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए उसके गालों पर चुटकी काट ली..

"उउउन्ह.. क्यूंकी मुझे मज़ा आता है हे हे.. जब भी मैं तुम पर गुस्सा होती हूँ.. तुम्हारी मोटी मोटी आँखें और फैल जाती हैं.. चेहरा बंदर जैसा हो जाता है.. और.. तब तुम मुझे बड़े प्यारे लगते हो.. हे हे हे!"

"अच्च्छा.. तुम्हे मैं बंदर दिखता हूँ.. चलो एक बार नैनीताल.. दिखता हूँ तुम्हे.."

"दिखा देना.. देख लूँगी.." वाणी ने बात अनायास ही कही थी.. पर देखने दिखाने की ये बात मनु को अनायास ही उसे बाथरूम में ले गयी.. जहाँ सौभाग्य से उसको 'वाणी' को देखने का स्वर्णिम अवसर प्राप्त हुआ था.. मनु के जज्बातों ने अंगड़ाई ली और वह शरारत पर उतर आया

"वाणी.. तुम्हे याद है वो बात.. मुझे तो ज्यों की त्यों याद है.. जैसे अभी भी तुम वैसे ही मेरे सामने खड़ी हो...

"कौनसी बात?" वाणी ने याद करने की कोशिश करते हुए पूछा...

"वही.. याद करो.... बात.." बोलते मनु की बात समझ में आते ही वाणी ने उसके मुँह पर अपना हाथ रखकर बीच में ही उसको रोक दिया," हूंम्म्म.. मेरा मज़ाक मत बनाओ!" और कहते ही वाणी ने शर्मकार दूसरी और मुँह कर लिया...

"अब बोलो, कौन है बंदर?" मनु ने शरारत से कहते हुए वाणी की कमर की बराबर में हाथ से हल्का सा स्पर्श किया.. और हाथ को वहीं पर जमा दिया.. उसकी चिकनी मखमली जांघों से थोड़ा सा उपर..

वाणी को झुरजुरी सी आ गयी.. मुँह दूसरी तरफ किए हुए ही उसने अपने हाथ से मनु का हाथ वहाँ से हटाने की कोशिश की.. पर मनु की पकड़ इतनी भी सख़्त नही थी की वाणी अगर दिल से कोशिश करती तो उसको वहाँ से हटा ना पाती.. हाथ नही हटा.. जाहिर सी बात है, वाणी की कोशिश कोशिश नही, महज झिझक थी...

कुछ देर तक अपनी उंगलियों से मनु के हाथ को सरकाने का बनावटी प्रयास करने के बाद वाणी ने अपनी उंगलियाँ वहीं पर मनु की उंगलियों में फँसा दी.. और दोनो की उंगलियों की पकड़ एक दूसरे पर कसने लगी....

मनु वाणी की सहमति जान कर थोड़ा उस तरफ सरक गया.. अब मनु की छाती का दायां हिस्सा वाणी की पीठ के बायें हिस्से से सटा हुआ था.. दोनो को ही एक दूसरे का शरीर तप्ता हुआ महसूस हो रहा था.. ये जवानी की गर्मी थी.. हाथ अब भी दोनो के एक दूसरे की उंगलियों में गुथे हुए थे...

"वाणी!" मनु ने सहसा उसके कान के पास उसको पुकारा...

"चुप!"

"क्या हुआ? फिर गुस्सा?" मनु ने फिर से उसके कानो में अपनी साँसों से गुदगुदी सी की...

"बोला ना चुप हो जाओ!" कहते हुए वाणी ने अपना भार मनु की छाती पर डाल दिया...

जाने कितनी ही देर वो यूँही बैठे रहे.. एक दूसरे से सटे हुए.. मनु से रहा ना गया.. उसकी मर्दानगी उसको ललकार्ने सी लगी.. अकड़ कर खड़ी हो गयी

"क्या सोच रही हो?" बात कहने के बहाने मनु ने वाणी के कानो से नीचे उसकी गर्दन से अपने होंठ छुआ दिए..

वाणी ने प्रत्युत्तर में अपनी सारे आवेगो को एक गहरी साँस के रूप में बाहर निकाल दिया.. उसको अपने शरीर में अकड़न सी महसूस होने लगी.. यहाँ तक की उसकी छातियो में भी कामुकता की बयार सी बहने लगी.. जो अब तेज़ी से उठने बैठने लगी थी..

"बोलो ना.. कुच्छ तो बोलो.." और इश्स बार मनु ने अपने होंठ, वहीं टीके रहने दिए.. वाणी की गर्दन पर..

असर कहाँ तक गया होगा.. आप समझ सकते हैं.. लेकिन इतना पक्का था कि वाणी ने अपनी जाँघ के उपर जाँघ चढ़ा ली..

"मनु!" एक लुंबी साँस छ्चोड़ते हुए वाणी बुदबुदाई..

"हां..?" मनु ने और कुच्छ ना कहा..

"तुम्हे.... तब कैसे लगा था..?" वाणी ने हिचकिचाते हुए पूचछा...

"कब?"

"चलो.. छ्चोड़ो.. अब कैसा लग रहा है?" वाणी बात को वर्तमान में ले आई...

"अजीब सा.. पर बहुत प्यारा.. मस्त!" कहते हुए मनु अपना हाथ सरका कर उसके पेट तक ले गया और वाणी को अपनी और खींच लिया.. उनके बीच बचा खुचा फासला भी ख़तम हो गया..

"मुझे भी.. आ!" मनु के अपनी और खींचे जाते हुए वाणी दोहरी सी होकर सिमट गयी..," मुझे गुदगुदी सी हो रही है..!"

वाणी ने बात कहने के लिए अपनी गर्दन घुमाई तो उसके गुलाबी पतले होन्ट अनायास ही मनु के होंठो से टकरा गये.. कुंवारे बदन थे.. दोनो सिहर उठे.. मनु के हाथ की सख्ती वाणी के पेट पर बढ़ती जा रही थी.. लगातार.. वाणी ने गुदज नितंब मनु की जांघों पर चढ़ बैठने को बेताब से लग रहे थे.. मनु नितंबों के बीच के खाईनुमा ख़ालीपन को अपनी जाँघ पर अब पूरी तरह से महसूस कर रहा था.. और नितंबों के मादक भराव को भी.. दोनो की साँसे उखाड़ने लगी थी...

"और क्या हो रहा है..? मनु ने कहते हुए अपना चेहरा वाणी के होंठो की तरफ उठा दिया.. ताकि इश्स बार वाणी जवाब दे तो उसके होंठो की मिठास को और भी गहराई

तक महसूस कर सके.. साथ ही उसने अपना हाथ भी थोड़ा उपर सरका दिया.. वाणी की कलात्मक गोलाइयाँ अब मनु के स्पर्श को तड़प रही थी.. बस कुच्छ इंच का ही फासला था...

"अया.. बोलो मत प्ल्स!" जैसे ही इश्स बार वाणी ने अपनी गर्दन घुमाई, मनु ने उसको और बोलने का मौका दिया ही नही.. उसके होंठ अब की बार तत्पर थे, वाणी के लबों का रसास्वादन करने को.. वाणी ने भी अब की बार अपने आप को वापस नही खींचा.. कुच्छ देर होंठ बाहर से ही एक दूसरे से सटे रहे.. फिर वाणी ने अपने होंठो को खोल मनु को रास्ता दे दिया.. मनु का नीचे वाला होंठ वाणी के होंठो के बीच फँस गया.. अजीब मिठास थी.. अजीब कशिश.. और अजीब नादानी... क्या जोड़ी थी..

वाणी ने मनु के होंठ को अपने होंठो के बीच यथासंभव कोमलता और सख्ती से लपेट लिया.. मनु का हाथ अपने आप ही वहाँ पहुँच गया, जहाँ वाणी के मादक उरोज कब से उसके द्वारा सहलाए जाने को बेताब थे... दोनो ही थरथरा उठे..

अब पिछे हटना ना-मुमकिन था...

अगर साथ वाली सीट पर बैठी प्रिया की हँसी ना छ्छूट गयी होती...

चौंक कर एकद्ूम दोनो एक दूसरे से अलग हो गये.. नवयौवन की बसंत पर असमय ही 'उस' नमकूल हँसी के पतझड़ का तुशारापट हो गया.. वाणी ने तो पलटकर देखा तक नही.. लज्जावाश दूसरी तरफ ही मुँह किए अपनी सीट के साथ कमर सटा कर बैठ गयी.. कुच्छ देर पहले ही हुए प्रेम-अनुभव की मिठास अब भी उसके रसीले होंटो पर मीठी मुस्कान के रूप में तेर रही थी... अंतहीन लज्जा को उनमें समेटे हुए....

मनु ने पलट कर देखा तो प्रिया ने शर्मकार अपना चेहरा दूसरी दिशा में घुमा लिया.. जिस ओर राज बैठा था!

"आबे, ये क्या था?" रोहन अचानक ही आसपास की घनी झाड़ियों से अपनी और कूद आए गिलहरी नुमा जानवर को देखकर उच्छल पड़ा.. जानवर के उच्छलने के अंदाज से यही प्रतीत हुआ की उसने उन्न पर हमला करने का प्रयास किया था... करीब 10 - 10 फीट की लंबी छलन्ग लगाता हुआ वो सड़क के दूसरी तरफ की झाड़ियों में खो गया....

दोनो 2 पल वहीं खड़े होकर उस अजीबोगरीब जानवर को आँखों से औझल होते देखते रहे.. और फिर से अपनी अंजान मंज़िल की और बढ़ चले...

"अफ.. कितना सन्नाटा है यहाँ? कहाँ ले आया यार...? यहाँ पर तो आदमी की जात भी नज़र नही आती... कितना डरावना सा लग रहा है सब कुच्छ.... यहाँ तुझे तेरी नीरू कहाँ से मिलेगी? ... देख मुझे तो लगता है कि सब तेरा वहाँ है.. क्यूँ बेवजह अपनी रात बर्बाद कर रहा है... और मेरी भी.." नितिन ने बोलते हुए रिवॉल्वेर निकाल कर अपने हाथ में ले ली..

"वहाँ नही है यार.. वो यहीं रहती है.. आसपास, देखना! कोशिश करेंगे तो सफलता ज़रूर मिलेगी.. वो अगर नही मिली तो मैं पागल हो जवँगा यार!" रोहन ने आगे चलते चलते ही बात कही...

नितिन बहुत अधिक चौकन्ना होकर चल रहा था.. चौकन्ना होना लाजिमी भी था.. जहाँ इश्स समय वो थे, उस जगह के आसपास कोई शहर या गाँव नही था.. दूर दूर तक कृत्रिम रोशनी का नामोनिशान तक नही था.. बस आधे चाँद और टिमटिमाते हुए तारों की हल्की फुल्की रोशनी ही थी जो उनको रास्ता दिखा रही थी.. रास्ता भी ऐसा जो ना होने के बराबर था.. कहीं उँचा, कहीं नीचा.. बीच बीच में गहरे गहरे गड्ढे.. इतने गहरे की ध्यान से ना चला जाए तो अचानक पूरा आदमी ही गायब हो जाए.. दोनो और करीब 4 - 4 फीट ऊँची झाड़ियाँ थी...

"अब रास्ता सॉफ होता तो गाड़ी या बाइक ही ले आते.. तुझे क्या लगता है.. यहाँ पर कोई इंसान रहता होगा.. और वो भी लड़की.. सच बताना, तुझे डर नही लग रहा, यहाँ का माहौल देख कर..." नितिन ने चलते चलते रोहन से सवाल किया...

"डर लग रहा है तभी तो तुम्हे लेकर आया हूँ.. नही तो मैं अकेले ही ना आ जाता.." रोहन ने जवाब दिया..और अचानक ही उच्छल पड़ा," नितिन देख.. आगे पक्की सड़क दिखाई दे रही है.. मैं ना कहता था.. हम ज़रूर कामयाब होंगे... आगे ज़रूर कोई बस्ती मिलेगी... देख लेना!"

"आबे बस्ती के बच्चे.. उस'से कोई ढंग का रास्ता भी तो पूच्छ सकता था तू.. यहाँ से क्यूँ लाया?" नितिन की आँखें भी आगे पिच्छले रास्ते के मुक़ाबले बेहतर सड़क देख कर चमक उठी....

"यार, क्या करूँ, जब यही एक रास्ता बताया उसने..." रोहन ने तेज़ी से चलना शुरू कर चुके नितिन के कदमों से कदम मिलते हुए कहा

"अजीब प्रेमिका है तेरी.. एक तो रात में मिलने की ज़िद करी और उपर से रास्ता ऐसा बताया.. चल देख.. लगता है हम पहुँचने ही वाले हैं.. उधर लाइट दिखाई दे रही है..." नितिन ने अपनी बाई तरफ इशारा करते हुए कहा....

दोनो बाई तरफ मुड़े ही थे की अचानक ठिठक गये..," यहाँ तो तालाब है..!" रोहन ने अपने कदम वापस खींचते हुए कहा....

"चल.. आगे से रास्ता होगा ज़रूर... !" नितिन ने रोहन से कहा और दोनो फिर से सीधे रास्ते पर चल पड़े....

आगे जाकर उनको एक पगडंडी सी बाई और जाती दिखाई दी.. दोनो ने आँखों ही आँखों में रास्ते पर सहमति जताई और उस और बढ़ चले...

"ओह तेरी मा की आँख.. यहाँ तो कीचड़ है..! देख कपड़ों का क्या हो गया... चल वापस चल.. ये रास्ता नही है.." मन ही मन नितिन उस लड़की को कोस रहा था जिसके प्यार में पागल रोहन अपने साथ साथ उसकी भी दुर्गति कर रहा था...

"यार, आधे रास्ते तो आ ही चुके हैं.. आगे चलकर तालाब में धो लेंगे पैर.. अब वो लाइट भी नज़दीक ही दिखाई दे रही है..." रोहन ने बेचारगी से नितिन को देखते हुए कहा...

"चल साले.. अगर लड़की नही मिली तो देख लेना फिर..." बड़बड़ाता हुआ नितिन फिर से रोहन के आगे आगे चलने लगा...

उसके बाद ज़्यादा देर उनको चलना नही पड़ा.. कुच्छ दूर और चलने पर वो एक सॉफ सुथरे रास्ते पर पहुँच गये.. पानी का 'वो' तालाब यहाँ तक भी फैला हुआ था.. दोनो ने वहाँ पानी में अपने पैर धोए और फिर से आगे बढ़ गये...

"यार, यहाँ गलियाँ तो दिखाई दे रही हैं.. पर घर कहाँ हैं.. ? क्या इश्स गाँव में वो एक ही घर है जहाँ लाइट जल रही है...?" नितिन ने हैरानी से रोहन की और देखा...

"मैने पूचछा नही यार.. क्या पता एक ही हो.. चल.. तू चलता रह!" रोहन ने खिसियाई हुई बिल्ली की तरह से बेतुका सा तर्क दिया और प्यार को पाने की उम्मीद में आगे बढ़ता रहा.. नितिन के साथ साथ..

बड़े ही विस्मयकारी अनुभव का सामना वो दोनो कर रहे थे.. काफ़ी देर तक चलने के बाद भी वो 'रोशनी' उनसे अभी भी उतना ही दूर लग रही थी.. उन्होने गलियाँ भी बदली, पर कुच्छ दूर चलते ही फिर से वो रोशनी ठीक उनके सामने आ जाती.. और फिर से उनको उसी रास्ते पर चलते रहने का अहसास होता...

"देख.. रोहन.. मुझे तो सब कुच्छ गड़बड़ लग रही है.. भला ऐसी जगह पर भी आजकल कोई घर बनता है.. 'कोई' लड़की सच में है ना...?" नितिन तक हार कर खड़ा हो गया...

"है ना भाई.. तू मेरा.. अरे.. देख बच्चा!" रोहन एक दम उच्छल पड़ा..

प्रिया की हँसी सुनकर राज भी जाग गया," क्या हुआ?"

"कुच्छ नही..." प्रिया झेंपटि हुई सी बोली...

"फिर भी.. हँसी क्यूँ? कुच्छ याद आ गया था क्या?" राज बैठकर सीधा हो गया और खिड़की के बाहर देखने की कोशिश करता हुआ बोला..

"हां.. वीरू और रिया खाना खाते हुए कैसे एक दूसरे की आँखों में देख रहे थे.. जब भी रिया वीरू की आँखों में देखती तो वो नज़रें झुका लेता था.. यही याद करके हँसी आ गयी थी.. कितना शर्मा रहा था.." प्रिया ने बात को घुमा दिया.. वो ये कैसे कहती की एक उसने वाणी और मनु को अंतरंग हालत में पकड़ लिया था..

"हुम्म.. शरमाती तो तुम भी बहुत हो.. नही?" राज ने उसको बातों ही बातों में च्छेदा..

"ष्ह.. चुप हो जाओ.." प्रिया ने तिरछि नज़र से बराबर वाली सीट की और डरते हुए झाँका..

"क्यूँ.. कोई जाग रहा है क्या..?"

"मुझे क्या पता.. पर तुम चुप करो प्ल्स..." प्रिया को डर था कहीं अब वाणी उनको ऐसी बातें करते देख कुच्छ और ना समझ ले..

"ठीक है.. हो जाउन्गा चुप.. एक शर्त है.." राज मौके का फयडा उठाकर उसको च्छेदने लगा..

"क्या है? कह तो रही हूँ.. चुप हो जाओ.. कोई सुन लेगा तो.."

"मैं भी तो कह रहा हूँ.. हो जाउन्गा चुप.. मुझे किस कर दो.. यहाँ पर.." राज ने अपनेहोंठो पर उंगली रखते हुए कहा..

प्रिया का चेहरा ये बात सुनकर लाल हो गया.. झेंप मिटाने के लिए वा अपनी कोहनी को चेहरे के आगे लगाकर आगे की और झुंक गयी.. ,"धात.. तुम्हे शर्म नही आती.."

"अच्च्छा.. वीरू को शर्म आती है तो वो शर्मिला.. और मैने दिल की बात कह दी तो मैं बेशर्म हो गया.. तुम लड़कियाँ भी ना.. तुम्हे समझना कितना मुश्किल है.. एक तरफ कहती हो की मुझसे प्यार है.. दूसरी तरफ मेरी इतनी छ्होटी सी बात भी मान नही सकती.." राज अब पूरी तरह नींद से जाग कर मस्ती के मूड में आ गया था..

"मुझे तुमसे बात नही करनी.. सो जाओ.. सो जाओ ना..!" प्रिया को उसकी बातों में आनंद आ रहा था.. पर इस मुई शरम को कहाँ छ्चोड़ कर आती...

"ओहो.. कितने प्यार से मुझे मेरे अरमानो का कतल करने को कह रही हो.. खुद मुझे नींद से जगाया और अब सोने को बोल रही हो.. उस दिन भी तुमने यही किया था.. मैं तुम्हे छ्चोड़ने वाला नही हूँ.. समझ लो.." राज ने प्रिया की जांघों पर रखा उसका बयान हाथ दबोच लिया.. वहीं.. जांघों पर राज की उंगलियों के जादू से उसके सारे शरीर में अजीब सी थिरकन शुरू हो गयी.. उसके मन में आया की राज का हाथ वहाँ से हटा दे.. पर अपने बेकाबू हो रहे दिल का क्या करती... सो उसने बाहर कोई हुलचल नही होने दी.. पर अंदर से वो मचल उठी..

"किस दिन..!" प्रिया ने राज की और चेहरा घुमा लिया.. वह अपने शरीर में हो रही गुदगुदी को मुस्कुराहट में तब्दील होने से रोकने की कोशिश कर रही थी.. पर रोक ना सकी..

"उसी दिन जब तुमने पत्थर फैंककर खुद मुझे घर बुलाया और हाथ लगाने पर नखरे करने लगी.. झूठ बोल कर भाग गयी कि मैं रिया हूँ.. अगर पहचान लेता तो उस दिन तुम्हे छ्चोड़ता नही मैं..." राज ने उसके हाथ को हल्का सा और दबा दिया...

"वो.. मैं डर गयी थी.. कहीं कोई आ ना जाए.." प्रिया ने सकुचते हुए अपना हाथ अंदर की तरफ खींचा.. पर राज का हाथ उसके साथ ही चला गया.. और गजब हो गया..

राज का हाथ अब दोनो जांघों के उपर रखा था.. बीचों बीच.. प्रिया को झुरजुरी सी आ गयी, जब उसकी 'चिड़िया' को अपने 'राज' के हाथ के इतना करीब रखा होने का अहसास हुआ..

राज उसके मन की उथल पुथल को महसूस करने लगा था.. उसके काँपते हुए हाथ की वजह से.. थोड़ी झिझक हुई.. पर अभी नही तो कभी नही के अंदाज में उसने उसका हाथ वहीं मजबूती से दबोच लिया..," पर अब किस बात का डर है.. अब तो मुझे मनमानी करने दो.."

प्रिया की साँसें उपर नीचे होने लगी.. उसको अपनी छातियो का वजन और बढ़ता हुआ महसूस हुआ और मन हल्का होने को बेचैन हो गया...," अयाया.. छ्चोड़ दो ना प्ल्स.. मेरा हाथ छ्चोड़ दो..!" प्रिया ने आनमने ढंग से बात कही...

" ना ना.. आज नही छ्ोड़ूँगा.. अपनी शर्त मनवाए बिना.." राज प्रिया के हाथ को वहीं दबोचे हुए था...

"क्कैसी शर्त..." प्रिया के होंठ इस बार खुलते ही काँपने लगे.. उसको नीचे लगातार तापमान बढ़ते हुए होने का अहसास हो रहा था.. जांघों के बीच गर्मी बढ़ती जा रही थी.. उसको अहसास हो रहा था जैसे उसका पेशाब निकालने वाला हो.. दूसरी तरह का..

"वही.. मुझे यहाँ किस करो और अपना हाथ च्छुड़वा लो.." राज ने फिर से अपने होंठो पर उंगली रख दी..

"नआई.. उहह.. मुंम्मय्ययी मर गयी" इश्स बार प्रिया को 440 वॉल्ट का करेंट लगा हो जैसे.. उसने अपना हाथ झटके के साथ च्छुदाने की कोशिश की थी.. कोशिश में तो वो कामयाब हो गयी.. पर प्रत्युत्तर में राज ने जैसे ही अपना दबाव डाला.. उसका हाथ प्रिया की जांघों के बीच घुस गया.. और प्रिया आनंद से दोहरी होकर छट-पटाने सी लगी.. पर बहुत धीरे..

"क्या हुआ?" राज ने घबराकर पूचछा..

"हाथ..!" प्रिया अधमरी सी फुसफुसाई..

"क्या हुआ.. कोहनी लग गयी क्या? राज अब भी समझ ना पाया..

"अपना हाथ.." कहकर प्रिया ने राज का हाथ खींच कर बाहर निकाला..," ये.."

"श.. सॉरी.. मैं समझा की..." कहकर राज झेंप गया.. इतनी आगे बढ़ने की तो वा सपने में भी नही सोच सकता था.. कम से कम अभी तो नही...

पर प्रिया को पहली बार आज महसूस हुआ था कि लड़की का वो अंग इश्स तरह के स्पर्श के प्रति कितना स्वेन्डनशील होता है.. राज की उंगलियों के वहाँ से जुदा होते ही 'वहाँ' अजीब सी छट-पटाहट सी शुरू हो गयी.. प्रिया को अंजाने में ही अपने आप पर बहुत गुस्सा आया.. और उसने इश्स इंतजार में अपना हाथ वापस अपनी जाँघ पर रख लिया कि राज उस हरकत को दोहराए.. पर पासा पलट गया था.. अब राज शर्मा रहा था की प्रिया उसके बारे में क्या सोचेगी..

"आ.. गुस्सा हो गये क्या?" मचलती हुई प्रिया ने खुद ही राज को टोक दिया..

"नही तो.. सॉरी.. मैने वो जानबूझ कर नही किया.." राज ने उस'से नज़रें मिलाते हुए कहा..

"चल ठीक है.. मैं तुम्हारी शर्त पूरी कर दूँगी.. पर मेरी भी एक शर्त है.." प्रिया को अब कुच्छ तो करना था.. अंदर के उस आधे अधूरे अहसास को पूरी तरह महसूस करने के लिए...

राज मन ही मन बाग बाग हो गया.. पर उपर से उसने ज़्यादा उत्साह नही दिखाया,"क्या?"

"मैं तुम्हे वहाँ किस कर दूँगी अगर मैं तुमसे 5 मिनिट तक अपना हाथ फिर से ना छुड़ा पायी तो.." प्रिया ने शरारत से आँखें मतकते हुए कहा और मुस्कुराने लगी..

उसके चेहरे की हँसी देख कर फिर से राज पुराने मूड में वापस आ गया.. ठीक है.. चाहे 10 मिनिट की शर्त लगा लो.."

"देख लो.. अगर हार गये तो फिर कभी भूल कर भी ऐसी शर्त मत लगाना.." प्रिया ने खुलेआम चलेंज कर दिया...

"ओके!" कहते हुए राज ने बिना देर किए उसका हाथ फिर से पकड़ लिया.. वहीं.. जाँघ के उपर ही.. प्रिया एक बार फिर उस 'आनंद' को पाने के लिए मचल उठी...

प्रिया ने एक दो बार सीधा उपर उठाकर हाथ च्छुदाने का नाटक किया.. पर भला राज कहाँ छ्चोड़ने वाला था.. धीरे धीरे प्रिया का हाथ उसकी दूसरी जाँघ की और बढ़ने लगा.. राज चाहता तो उसका हाथ वापस खींच सकता था.. पर उसने भी ऐसा किया नही.. बहती गंगा में हाथ कौन नही धो लेना चाहेगा..

हाथ फिर से जांघों के बीचों बीच आ गया.. प्रिया धीरे धीरे जांघों को खोलने लगी ताकि राज के हाथ को वो मंज़िल तक पहुँचा सके..

अपना हाथ नीचे जाता देख राज सकपका गया.. "कहीं फिर से" और उसकी पकड़ धीरे धीरे ढीली होने लगी...

"देख लो.. अगर छूट गया तो कभी मुझसे इश्स बारे में बात मत करना.." प्रिया ने उसकी आँखों में आँखें डालते हुए कहा.. फिर क्या था.. राज को तो खुला निमंत्रण मिल गया..

जॉर्जाबरदस्ती के इश्स प्यार भरे खेल में दोनो के चेहरे आमने सामने थे.. आँखें भी आमने सामने और होन्ट भी.. दोनो की साँसे तेज होती जा रही थी और दोनो एक दूसरे की साँसों में वासनात्मक गर्मी को महसूस कर सकते थे... राज को अहसास हुआ की प्रिया उस'से हाथ छुड़ाने की बजे उसका हाथ खींचने पर आमादा है.. अंधे को और चाहिए क्या? राज ने भी हाथ को उपर खींचना छ्चोड़कर उसके हवाले कर दिया.. पकड़े हुए..

जैसे ही प्रिया को राज का स्पर्श अपनी तितली के लाल दाने पर महसूस हुआ वो पागला सी गयी.. शर्त को अब दोनो भूल चुके थे.. दोनो जीत गये थे.. और दोनो ही हार गये थे.. सिसकती हुई प्रिया ने 2 इंच चेहरा आगे किया और तितली के होंठो के साथ ही चेहरे के होंठो को भी अद्भुत रास्पान हेतु खोल दिया..

राज को उसका निमंत्रण समझने में देर ना लगी.. प्रिया की आँखें बंद थी और वा अपनी कामुक हो चली आवाज़ पर काबू पाने की कोशिश में अंदर ही अंदर सिसक रही थी... राज ने अपने होंठो को आगे करके प्रिया की सिसकियाँ बंद कर दी.. और दोनो पहली बार यौवन के रस-सागर में गोते लगाने लगे...

राज का दूसरा हाथ.. बिना किसी से पूच्छे, बिना किसी को बताए प्रिया के उरजों तक पहुँच गया.. प्रिया के पास ऐतराज जताने का वक़्त ही कहाँ था.. वा तो पागल सी होकर राज के हाथ को रास्ता दिखाने में जुटी थी.. और अब उसकी एक उंगली से अपनी चिड़िया के साथ 'उपर-नीचे, उपर नीचे' खेल रही थी...

राज को लग रहा था की उसकी पॅंट का कल्याण होने वाला है.. पर जो होगा देखा जाएगा के अंदाज में वा उसके उरजों, उसके होंठो और उसकी नाज़ुक और अब तक बिल्कुल 'नादान' तितली को मसालने में लगा रहा.. उपर से ही.. अब वह 'अपने' को बाहर कैसे निकालता.. इतना करते हुए तो उसको भी शरम ही आ रही थी.. ये काम तो खुद प्रिया को करना चाहुए था, जिसको दरअसल पता भी नही था की 'इस' काम का सही हक़दार असल में वही है.. और ओरिजिनल भी...

आख़िर आते आते तो प्रिया भूल ही गयी थी की वो है कहाँ.. जब स्खलन शुरू हुआ तो वह सब कुच्छ भूल कर राज की छाती से चिपक गयी.. और लंबी लंबी साँसे लेने लगी.....

हम सच में पहुँच गये क्या?" आँखें मसालती हुई वाणी बस से उतरते हुए बोली.. राज और प्रिया की गुटरगूं चुपके चुपके देखने के बाद वाणी घंटे भर सो नही पाई थी... हालाँकि मनु और उसमें फिर से 'वैसा' कुच्छ करने की हिम्मत नही हुई.. पकड़े जाने के डर से.. बाकी का सफ़र एक दूसरे के हाथों में हाथ डाले हुए ही बीता.. जब तक वाणी नींद के आगोश में आकर मनु के पहलू में लुढ़क नही गयी.....

नीचे उतरने के बाद अंजलि बड़ी हसरातों से शमशेर की और देख रही थी.. पर शमशेर ने उस'पर ध्यान ही नही दिया...

"यही ठीक रहेगा.. नही..?" शमशेर ने विकी से मशविरा किया.... वासू भी उनके साथ ही खड़ा था...

अलका होटेल के बाहर लगे पीले रंग के बोर्ड पर सरसरी नज़र डाल विकी ने चारों और का मुआयना किया..," हां भाई.. यहाँ से लेक व्यू भी मस्त है.. चलो.. बात करते हैं..."

"हूंम्म.. चलो.. हम अभी आते हैं.." शमशेर ने कहा और वो दोनो होटेल के अंदर चले गये...

रिसेप्षन पर करीब 50-55 साल का बुड्ढ़ा बैठा अख़बार की खाक छान रहा था.. जैसे ही विकी और शमशेर काउंटर पर पहुँचे अपने चेहरे को नीचे किए हुए ही उसने चस्में के उपर से उन्हे घूरा.. पर बोला कुच्छ नही...

"रूम्स हैं क्या?" शमशेर काउंटर पर कोहनी टीका कर खड़ा हो गया...

"और मेरे पास है ही क्या?" बुड्ढे ने बेरूख़ा सा जवाब दिया..

"क्यूँ? बाकी सब कुच्छ बिक गया क्या?" विकी ने मसखरी की....

" जाओ.. रूम भी बेच दिए मैने.. मेरे पास कुच्छ नही है.. बड़े आए.." खिसियया हुआ बुड्ढ़ा बिफर पड़ा...

"नाराज़ क्यूँ होता हो अंकल.. इसने सिर्फ़ मज़ाक किया था.." शमशेर ने हाथ नीचे करके विकी को कोहनी मारी... "हम करीब 22 -22 लोग हैं..."

"कितने कमरे चाहियें..?" बुड्ढे ने ड्रॉयर से रिजिस्टर निकाल कर उनके सामने पटक दिया.. रेजिस्टर के पटक'ने से उठने वाली धूल होटेल की पॉप्युलॅरिटी का माजेरा कर रही थी...

शमशेर ने हिसाब लगाना शुरू किया.. वो खुद और दिशा; तू और स्नेहा; अंजलि और गौरी; वासू; वीरू और राज; रोहन और मानव; रोहित ; मनु और अमित; रिया और प्रिया; आरज़ू और सोनिया; शालिनी; सरिता; वाणी और मानसी; ड्राइवर... बस यही हैं ना?" शमशेर ने विकी से पूचछा....

"हाँ.. यही होंगे.. पर अड्जस्टमेंट कैसे करनी है?" विकी ने याद सा करने के बाद कहा...

"बाकी तो हो गयी.. वासू के लिए भी अलग कमरा ले लेंगे.. पर रोहित, शालिनी, सरिता, और ड्राइवर... इनका कैसे करें...?" शमशेर ने पूचछा...

"रोहित और शालिनी की पुरानी सेट्टिंग है.. टफ भाई ने जिकर किया था की इनका टूर पर ध्यान रखना... इनको अलग करके क्यूँ मार रहे हो शर्दि में.. बाकी उनसे पूच्छ लो. ... सरिता तो कहीं भी फिट होने वाली गोटी है.. ड्राइवर के पास ही छ्चोड़ दो..." विकी ने धीरे से कहा.. और हँसने लगा...

"पागल है क्या..? हमें उनको भी अलग अलग रूम देना पड़ेगा... कम से कम ड्राइवर को तो किसी के साथ रख ही नही सकते... सरिता को किन्ही दो लड़कियों के साथ अड्जस्ट करना पड़ेगा... अरे हां.. नेहा भी तो है..." शमशेर को अचानक याद आया..," और दिव्या भी है यार.. इन तीनो को इकट्ठा कर देते हैं.. एक रूम में.."

विकी ने कोई जवाब नही दिया तो शमशेर मॅनेजर से मुखातिब हुआ..," 13 कमरे खाली होंगे क्या?"

"मेरे पास 14 कमरे हैं.. मेरे वाले कमरे समेत.. पर उनमें से एक कमरा छ्होटा है.. उसमें सिर्फ़ एक ही रह सकता है.. कहो तो दिखाऊ?"... बुड्ढे मॅनेजर ने तपाक से कहा और फिर अख़बार पढ़ने में लग गया...

"तो क्या पूरा होटेल खाली पड़ा है?" विकी ने आसचर्या से कहा...

[color=#800080][size=large]"तुम्हे कमरे चाह
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Reply
11-26-2017, 02:05 PM,
RE: College Sex Stories गर्ल्स स्कूल
गर्ल्स स्कूल पार्ट --58

हेल्लो दोस्तों मैं यानिआप्का दोस्त राज शर्मा पार्ट 58 लेकर हाजिर हूँ अब आप कहानी का मजा लीजिये

सभी अपना अपना समान कारों में डाल कर 4-5 के ग्रूप्स में कमरों में बैठे थे.. दिशा शालिनी को लेकर बाहर चली गयी..

"एक बात पूचु शालिनी दी.. बुरा मत मान'ना.." दिशा ने हिचकते हुए कहा..

"कमाल करती हो.. पूच्छो ना!" शालिनी ने खुश होकर उसकी ओर देखा...

"आप... रोहित से प्यार करती हैं क्या?" दिशा ने उसकी आँखों में आँखें डाल कर पूचछा...

"तुमसे किसने कहा..?" शालिनी उसकी बात पर अवाक रह गयी..

"वो.. सीमा ने बताया था.. बताइए ना.. सच है क्या?" दिशा ने टटोलने की कोशिश की...

"हुम्म" शालिनी ने कहते हुए शर्मकार नज़रें चुरा ली...

"आप दोनो एक ही रूम में रह लोगे ना... वो... शमशेर पूच्छ रहे थे...."

"उनको भी पता है क्या?" शालिनी के चेहरे पर हवैइयाँ सी उड़ने लगी...

"तो क्या हुआ.. तुम चिंता मत करो.. बस बोलो आप रह लोगे ना?" दिशा ने मुस्कुरकर उसका हाथ पकड़ लिया...

"नही.. ये नही हो सकता.. मैं उसके साथ नही रहूंगी..." कुच्छ देर सोचने के बाद शालिनी ने स्पस्ट सा कह दिया...

"वैसे कोई प्राब्लम नही थी दीदी.. पर चलो.. मैं बता दूँगी उनको.. आओ!" कहकर दिशा शमशेर के पास जाने के लिए मूड गयी.... शालिनी वहीं खड़ी होकेर कुच्छ सोचते हुए उसको जाते देखती रही.. फिर अचानक बोली," दिशा! एक मिनिट!"

"हां दीदी!" दिशा उसके पास वापस आकर बोली....

"वो.. मैं कह रही थी की.. क्या रोहित से पूचछा था उन्होने?" शालिनी ने हिचकते हुए पूचछा...

"हां.. उसने ही तुमसे पूच्छने के लिए बोला था... इसीलिए पूच्छ रही थी...

"हुम्म.. पर ये कैसे हो सकता है.. कितना अजीब सा लगेगा हमें.. " चलते हुए शालिनी अचानक खड़ी हो गयी.. दिशा के कदम भी वहीं रुक गये...

"ठीक है दिशा.. अगर रूम्स की प्राब्लम है तो मैं रह लूँगी..." और कहते ही शालिनी वहाँ से नौ दो ग्यारह हो गयी... उसने एक पल के लिए भी वहाँ रुकना ना चाहा.. उसने मुड़कर भी नही देखा...

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"मैं.. अकेला?" वासू ने रूम्स शे-अर करने वालों की लिस्ट देखी और उसके अरमानो पर जैसे पानी फिर गया.. पर रात वाली बात अब नही थी.. नशा अभी भी होता तो शायद वो बग़ावत कर देता, इस फरमान के खिलाफ...

शमशेर और विकी भी रात वाली बात भूल चुके थे.. और उन्हे अब भी वासू के इकरार-ए-इश्क़ का इल्म नही हो पाया," क्या करें वासू जी.. मैं शादी शुदा हूँ और विकी भी शादी करने ही वाला है स्नेहा से.. आपको सिंगल रूम देना हमारी मजबूरी है.. लड़कों के साथ रहना आपको शोभा नही देगा..."

"हूंम्म.. चलो.. अकेला ही सही.. घूमने तो साथ ही चलोगे ना.. या वहाँ भी अकेला ही भेजोगे मुझे..." खिसियाए वासू ने परोक्ष व्यंग्य किया...

"कमाल करते हैं वासू जी आप भी.. सबको इकट्ठा होने को बोलो.. चलने की तैयारी करते हैं बस! आज थोड़ा बहुत घूम कर ही आएँगे.... फिर थकान उतारेंगे सफ़र की..." विकी ने मुस्कुराते हुए उसकी और हाथ बढ़ा दिया...

वासू के दिल पर क्या बीत रही थी.. ये तो वही जाने.. पर वा उठा और बिना कुच्छ बोले बाहर निकल गया......

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"वाणी को अपने साथ ही रख लें...?" स्नान करने के बाद यूँही बाहर आकर ड्रेसिंग टेबल के सामने खड़ी होकर अपना बदन पौंच्छने लगी दिशा ने बेड पर लेते शमशेर से पूचछा...

शमशेर इस कातिल बदन की मल्लिका को अपने सामने यूँ बिना कपड़ों के देखते ही सिसक उठा.. बिना देर किए वह अगले ही पल दिशा को पिछे से अपने आगोश में भरे हुए था," क्यूँ? यही कह दो ना की यहाँ से मुझे जिंदा वापस नही जाना.." शमशेर ने अपने हाथों में दिशा के उन्नत उरजों को समेट-ते हुए उसको अपने और करीब खींच किया... दिशा को शमशेर की बेकरारी अपने नितंबों के बीच बड़े ही ठोस अंदाज में महसूस हो रही थी, खिलखिलती हुई वह बोली," ऐसा क्या कह दिया मैने?"

"जैसे तुम्हे तो कुच्छ पता ही नही..." कहते हुए शमशेर ने दिशा को अपनी और घुमा लिया और होंठो से सुधारस का पान करने लगा.. कुच्छ पल के लिए तो दिशा भी कमतूर होकर उसमें सामने की कोशिश की करने लगी.. पर जल्द ही संभालते हुए उसने शमशेर को अपने तन-सुख से वंचित सा कर दिया..," आप भी ना.. कभी तो समय देख लिया करो.. हटो भी.. तैयार होने दो.. मैं तो यूँही मज़ाक कर रही थी.. वो तो मानसी के पास रहेगी ना..." दिशा अपने गीले बालों को झटक कर उनमें कंघी करने लगी....

"ओह तेरी.. हम नीरू को गिन'ना तो भूल ही गये.. अब उसको कहाँ अड्जस्ट करेंगे..." शमशेर ने अचानक याद करते हुए अपने माथे पर हाथ मारा...

"कुच्छ नही होता.. तकरीबन सभी सहेलियाँ हैं आपस में.. अदल बदल कर रह लेंगी.. वैसे भी तो सोने के लिए ही तो अलग होना है बस.. वरना तो सबको साथ ही रहना है... तीन लड़कियाँ इन बेड्स पर आराम से सो सकती हैं.. अब मुझे तंग करना बंद करो और बच्चों को समझा दो.. साथ ही रहना है बाहर जाकर.." दिशा पहन'ने के लिए बॅग में से अपनी ड्रेस निकलती हुई बोली...

"कब तक बचोगी मेरे कहर से..."रात को देखूँगा तुम्हे.. " और मुस्कुराता हुआ शमशेर उसके गालों का चुंबन लेकर बाहर निकल गया....

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"मैं यहीं रहूँगा सिर.. वीरेंदर के पास ही.. वैसे भी मुझे नींद आ रही है.." सब इकट्ठे हुए तो राज ने अपने चलने में असमर्थता जाता दी...

"कोई बात नही.. आज वैसे भी आसपास तक ही घूम कर आएँगे.. अगर किसी और को भी आराम करना हो तो वा यहाँ रह सकता है..." शमशेर ने बच्चों से कहा...

हाथ उपर करने वालों में सबसे पहला नंबर. प्रिया का था.. राज के बिना वो भी क्या करती बाहर जाकर... धीरे धीरे रिया ने भी अपना हाथ उठा दिया... वाणी और मनु की नज़रें मिली और गजब हो गया...

"हम भी नही जा रहे!" दोनो ने एकसाथ बोला.. सभी ने उनकी और चौंक कर देखा.. एक साथ बोलना तो समझ में आता था.. पर 'हम'.. सबको ऐसा ही लगा जैसे उन्होने पहले ही प्लॅनिंग कर ली हो...

शमशेर ने नज़र भरकर दोनो की और गौर से देखा और फिर अपना ध्यान उनपर से हटने का दिखावा करने लगा....," ठीक है.. जिसको नही चलना वो अपने कमरों में जाओ.. मैं बाकी से बात कर लूँ...."

प्रिया, रिया और राज अपने अपने कमरों में चले गये...

"आ चल ना.. क्या करेगी यहाँ.. घूम कर आते हैं.. थोड़ी देर की ही तो बात है..." कुच्छ कुच्छ रात को ही समझ चुकी मान'सी अब तो सब कुच्छ ही जान गयी थी...

"नही.. मुझे नींद आ रही है.. आज तो जी भरकर सो-उंगी.. ठंडी में कितनी मीठी नींद आएगी.. तू जा..." वाणी ने झेन्प्ते हुए कहा और गर्दन नीची करके अपने कमरे की और निकल गयी...

बेचारे मनु ने भी खिसक लेने में ही अपनी भलाई समझी.. अमित ने भी एक पल रुकने की सोची.. पर वो गौरी के रुकने का एलान करने का इंतजार ही करता रह गया..

होटेल में अब 6 बच्चे ही रह गये थे.. वीरू, राज, मनु, रिया प्रिया और वाणी.. वाणी और मनु अपने अपने कमरों में अकेले लेते थे जबकि प्रिया, रिया के साथ और राज वीरू के साथ था... रात की खुमारी अब तक प्रिया के बदन से उतरी नही थी.. और कुच्छ मस्ती करने के लिए नही मिला तो प्रिया ने रिया को ही छेड़ना शुरू कर दिया," रिया.. रात भर वीरू के साथ बैठ कर आई हो.. तुम्हे छेड़ा तो नही ना उसने?"

"चल हट.. तू बड़ी बेशरम हो गयी है आजकल.. राज को समझना पड़ेगा.. उसी का असर लगता है ये..." रिया ने शरारत भारी आवाज़ में कहा...

"इसमें बेशर्म होने की क्या बात है? तुझसे ही तो पूच्छ रही हूँ.. वैसे खाना खाते हुए तुम दोनो बड़े प्यारे लग रहे थे.. सच में..." प्रिया ने उसको उकसाते हुए बोला...

"हुंग.. बेकार में खाना खिलाया मोटू को.. खाना खाते ही सो गया.. बात तक नही की..." कहते हुए रिया अपने चेहरे पर प्यार भरा गुस्सा ले आई...

"क्यूँ? ऐसी क्या बात करनी थी तुझको..?" प्रिया ने प्यार से उसके गाल पकड़ कर खींच दिए..," एक ही दिन में सब कुच्छ थोड़े ही हो जाता है... पहले तो छेड़ छाड़ ही होती है..."

"कुच्छ होने की बात मैं कब कर रही हूँ.... आ.. आज तो तू बड़ी वैसी बातें कर रही है...तू भी तो रात भर राज के साथ ही थी.. तुम्हारा कुच्छ हो गया क्या?" रिया ने उल्टा उसको ही निशाने पर ले लिया....

"नही... और हुआ होगा भी तो मैं तुझे क्यूँ बताउ?" प्रिया की इश्स बात ने रिया के कान खड़े कर दिए...

"मुझे नही बताएगी तो किसको बताएगी.. चल.. बता ना... कुच्छ हुआ क्या?" रिया उत्सुकता से उसके सामने बैठ गयी...

"तू किसी को बोलेगी तो नही ना.." प्रिया ने चहकते हुए उसको कहा...

कुच्छ ना कुच्छ होने का इशारा मिलते ही रिया की आँखें चमक उठी..," मैं पागल हूँ क्या? मैं क्यूँ बताउन्गि किसी को.. एक मिनिट रुक.. मैं दरवाजा बंद कर दूं.." रिया झटके के साथ उठी और लपक कर दरवाजे की चितखनी लगा दी... और वापस आकर गोद में तकिया रख कर प्रिया के सामने बैठ गयी," चल बता!"

"ऐसा कुच्छ खास नही है पागल... तू तो ऐसे ही उच्छल रही है.." प्रिया ने अपनी ज़ुबान पर काबू करने की कोशिश की...

"तुम्हे मेरी कसम प्रिया.. जो कुच्छ भी हुआ है.. सब सच्ची साची बताना...... बोल भी दे अब.. भाव क्यूँ खा रही है?" रिया पूरी बात जान'ने के लिए मचल उठी..

"देख ले.. तुझ पर भरोसा है.. इसीलिए बता रही हूँ.." प्रिया को बताने में हिचक हो रही थी....

"बोल ना.. अब इधर उधर क्यूँ घुमा रही है बात को..?" रिया सुन'ने के लिए अधीर होती जा रही थी....

"वो.. राज ने मुझे किस करने के लिए बोला था.." प्रिया ने शर्मा कर नज़रें झुका ली..

"ये ले.. इतनी छ्होटी सी बात के लिए इतने नखरे दिखा रही थी.." रिया को खोदा पहाड़ और निकली चुहियाँ वाली बात लगी...

"वहाँ पर.." प्रिया ने उसी अंदाज में अपने होंठो पर उंगली रख ली.. जिस अंदाज में राज ने अपने होंठो पर रखी थी....

"हाए राम! होंठो पर.." रिया उच्छल पड़ी..," फिर? तूने की..?"

"क्या?"

"लिपकिसस!" और क्या?" रिया ने तकिया उठाकर अपनी छतियो से चिपका लिया..

"तू सुन तो ले अब.. मैं मना करती रही.. और वो ज़िद पर अदा रहा.. जाने क्या क्या उलाहने देने लगा.. फिर अचानक उसने मेरा हाथ पकड़ लिया.. हाथ यहाँ रखा था.." प्रिया ने अपनी जाँघ पर हाथ रख कर उसको दिखाया...

"फिर?" रिया की ललक बढ़ती जा रही थी.. पूरी बात जान'ने की..

"फिर क्या? मैने अपना हाथ खींचा तो बेशर्म साथ ही अपना हाथ भी खिसका लाया.. यहाँ.. मेरी तो जान ही निकल गयी होती..." प्रिया ने उस पल को याद किया और मचल सी उठी...

"फिर क्या हुआ.. बताती रह ना.. चुप क्यूँ हो गयी...?"

"फिर उसने मेरे हाथ को यहीं दबा लिया.. मेरी साँसे रुकने को हो गयी.. जैसे ही मैने अपना हाथ छुड़ाया.. उसका हाथ मेरी जांघों के बीच घुस गया.."

"हाए राम.. तुझे तो बड़ी शरम आई होगी.. फिर क्या हुआ?" रिया ने उसको बीच में ही रोक कर अपनी प्रतिक्रिया दी...

"शरम की तो पूच्छ मत... पर उसने तभी हाथ निकल लिया.. सॉरी बोलकर...!" प्रिया की हालत बात कहने के हिसाब से बनती बिगड़ती जा रही थी...

"रिया को लगा किसी ने उसके 'वहाँ' से हाथ निकल लिया हो.. प्रिया की हर बात का असर वो अपने शरीर पर होता महसूस कर रही थी.. राज के हाथ निकालने की बात सुनते ही उसने छातियो पर दबा रखा तकिया अपनी गोद में रखा और अपना हाथ 'वहीं फँसा कर प्रिया को आए मज़े को महसूस करने की कोशिश करने लगी...," फिर कुच्छ नही हुआ?"

"हुआ ना!" यहाँ से प्रिया ने कहानी थोड़ी बदल दी.. अब वा रिया को यह कैसे बताती की वह खुद ही राज का हाथ अपनी चिड़िया तक ले जाने को मचल उठी थी...," राज थोड़ी देर बाद फिर से लिपकिसस की ज़िद करने लगा.. मैने सोचा, कर देती हून.. नही तो ये पीचछा छ्चोड़ने वाला नही है..."

"फिर.. कर दी तूने...?" रिया का चेहरा भी लाल होता जा रहा था...

"तू सुनती रह.. बीच में मत बोल... मैने अपने होन्ट बंद करके उसके होंठो को बस एक बार टच करने के लिए ही गयी थी की उसने मुझे वहीं दबोच लिया.. ज़बरदस्ती मेरे उपर वाले होन्ट को अपने होंठो में दबा लिया.. और अपने आप ही उसका नीचे वाला होन्ट.. मेरे होंठो में आ गया.. मैं पागल सी हो गयी.. बता नही सकती की कैसा लग रहा था.."

"अच्च्छा तो लग रहा होगा ना..?" रिया अपनी चिड़िया को उंगली से कुरेदने लगी थी...

"बता तो रही हूँ मैं पागल सी हो गयी थी.. इतना मज़ा आया था की मैं बता ही नही सकती... अचानक वो अपने हाथ को धीरे धीरे मेरी जांघों के उपर से सहलाते हुए फिर से अंदर ले गया.. जाने क्या जादू था.. उसके हाथ में.. मैं उसको रोक ही नही पाई... मेरा तो दिल, दिमाग़, आँखें सब कुच्छ काम करना छ्चोड़ गया था... उसकी उंगलियाँ उपर से ही 'उसके' उपर चलने लगी... मैं उसको एक बार भी रोक नही पाई... अचानक मैं अंदर तक काँप गयी और पूरे शरीर में झुरजुरी सी आ गयी... मुझे लगा की अगर उसकी छाती से नही लिपटी तो मैं मर जाउन्गि.. और फिर मैने उसको और उसने मुझको कसकर भींच लिया... अब भी याद करती हूँ तो मेरा रोम रोम सिसक उठता है..." प्रिया ने अपना राज 'रिया' के सामने खोल कर अपनी बात को विराम दिया...

रिया काफ़ी देर तक चुपचाप बैठी हुई पता नही किन ख़यालों में खोई रही.. फिर अचानक बोली," मज़ा तो उसको भी आया होगा.. नही?"

"और नही तो क्या? शुरुआत तो उसी ने की थी..." प्रिया ने कहा...

"नही.. मेरा मतलब है की अगर कोई लड़की किसी के साथ ऐसा करने लग जाए तो उसको गुस्सा तो नही आएगा ना... मज़ा तो सभी को आता होगा..." रिया के दिमाग़ में कुच्छ चल रहा था...

" हां.. मज़ा तो सबको ही आता होगा.. भगवान ने सभी को एक जैसा बनाया होगा..."

"प्रिया..!"

"हूंम्म.." प्रिया बात पूरी करके आँखें बंद करके बिस्तेर पर लेट गयी थी...

"अगर तू चाहे तो राज को बेशक यहाँ बुला ले.. मैं बाहर चली जाउन्गि...!" रिया ने प्रिया के सामने एक प्रपोज़ल रखा...

"मैं क्या करूँगी.. उसको बुलाकर...!" हालाँकि उस वक़्त आँखें बंद किए प्रिया यही दुआ कर रही थी की एक बार और उनका आमना सामना हो जाए.. अकेले में..! पर बेहन के सामने कैसे स्वीकरती...

"कुच्छ भी करना.. तुम बालिग हो.. एक दूसरे से प्यार भी करते हो.. बातें करना या कबड्डी खेलना.. कौन रोक रहा है..?" रिया हँसने लगी.. पर हँसी में मैलापन था.. वासना का... जो उसस्के सिर चढ़कर बोल रही थी...

"धात.. बेशर्म.. हां.. बातें करने को तो दिल कर रहा है.. पर उसको बुलाउ कैसे? वीरू अकेला रह जाएगा... है ना?" दोनो के मॅन तेज़ी से इस योजना को मूर्त रूप देने में जुट गये थे...

"एक काम हो सकता है..!" प्रिया ने अचानक कहा...

"क्या?"

"देख ले.. तुझे थोड़ी हिम्मत दिखानी पड़ेगी..."

"बोल ना.. क्या करूँ..?" रिया ने उत्सुकतावश पूछा...

"तू उनके कमरे में जाकर राज को कह दे.. की तुझे बाहर बुला रहे हैं.. मेरा नाम मत लेना..."

"फिर?"

"फिर क्या? बाहर में उसको अपने आप संभाल लूँगी... तू थोड़ी देर वीरू के पास बैठ जाना...!"

"ठीक है.. मैं जाती हूँ.." रिया और अब तक कहना ही क्या चाह रही थी.. बस शरम के मारे बात उसके मुँह से निकल ही नही रही थी... वह बिना देर किए उठी और राज और वीरू के कमरे की और चली गयी...

दरवाजा राज ने ही खोला.. रिया को देखते ही वो खिल उठा," प्रिया कहाँ है रिया?"

रिया ने दरवाजे से अंदर झाँकते हुए कहा..," ये मोटू क्या कर रहा है..?"

"सो रहा है.. क्यूँ?"

"बस ऐसे ही.. वो.. तुम्हे प्रिया बुला रही थी.. कुच्छ काम होगा.." रिया ने अंजान बनते हुए कहा...

"ठीक है.. मैं आता हूँ.. चलो!" राज ने कहा...

"वो.. तुमसे एक बात करनी थी..." रिया ने इधर उधर आँखों को नचाते हुए कहा...

"बोलो.. !"

"मुझे वीरू से कुच्छ बात करनी है.. मैं यहीं रह जाउ तब तक..."

"हां.. हां.. मुझे क्या दिक्कत है... पर जगाने से पहले सोच लेना इसको.. लेने के देने भी पड़ सकते हैं..." राज हंसते हुए बोला...

"वो मैं देख लूँगी.. तुम जाओ.. मैं यहीं रुकती हूं..." रिया अभी तक बाहर ही खड़ी थी...

"राज की भी बान्छे खिल गयी....," ठीक है.. मैं जा रहा हूँ.. पर क्या काम है उसको..?" राज अंजान बनते हुए बोला...

"मुझसे क्यूँ पूच्छ रहे हो.. जाते ही अपने आप ही ना बता देगी..." रिया शरारत से मुस्कुराने लगी तो राज झेंप गया...

"नही.. मुझे लगा हो सकता है तुम्हे भी पता हो.." राज ने कहा और बाहर निकल गया...

राज के जाते ही रिया अंदर घुसी और दरवाजे को लॉक कर दिया... वीरू गरम कंबल में दूबका सो रहा था....

रिया करीब 15 मिनिट तक वीरू को जगाने की सोचती रही... उसके मॅन में खलबली मची हुई थी.. बस एक बार राज और प्रिया जैसा कुच्छ उनमें भी हो जाए.. उसके बाद तो वो उसको अपने आप काबू में कर लेगी.. पर शुरुआत कैसे करे.. यही बड़ा सवाल था...

कुर्सी पर बैठी हुई रिया काफ़ी देर तक वीरू को जगाने का बहाना सोचती रही.. अचानक उसके दिमाग़ में ख़याल आया.. जगाने की ज़रूरत ही क्या है.. जागेगा तो अपने आप जाग जाएगा.. आख़िर ठंड तो उसको भी लग रही है ना.....

सोचते हुए रिया ने खुद को हिम्मत सी दी और अपनी गरम जॅकेट निकाल कर अलमारी में च्छूपा दी..

वीरू बेड के बीचों बीच लेटा सो रहा था... रिया बिस्तेर पर चढ़ि और वीरू के पास बैठकर कंबल में पैर घुसा दिए... इतना भर करते ही उसकी धड़कने बढ़ गयी थी.. पर मंज़िल तो अभी बहुत दूर थी...

"वीरू!" रिया ने हुल्के से आवाज़ लगाई...

पर वीरू शायद गहरी नींद में था.. उसकी तरफ से कोई प्रतिक्रिया नही हुई...

"वीरू!" रिया ने इश्स बार थोड़ा तेज कहा तो वीरू ने नींद में ही अपनी करवट बदल ली... अब वीरू का चेहरा रिया की तरफ था.. वीरू ने घुटना मोड़ कर आगे रखा तो रिया का घुटना वीरू की जांघों के नीचे आ गया...

और रिया ने अपने आपको मुश्किल से उच्छलने से रोका.. उसके बदन में अचानक सरसराहट दौड़ गयी... वीरू की जांघें रिया के घुटनो को सीधा स्पर्श कर रही थी.. मतलब सॉफ था.. वीरू सिर्फ़ अंडरवेर में था...

इतना आभास होते ही रिया की हालत खराब हो गयी.. कुच्छ ही देर में उसको ये भी समझ आ गया की उसके घुटनो के पास महसूस हो रही जाँघ के अलावा 'दूसरी चीज़ क्या है.. और रिया पागल सी हो गयी.. वह इतनी हड़बड़ा गयी की यही निस्चय नही कर पा रही थी की अपनी टाँगों को वहाँ से निकले या नही... बड़ी मुश्किल से वह सामान्य हुई थी कि वीरू ने नींद में ही एक और गजब ढा दिया...

हुल्की सी हुंकार भरते हुए वीरू ने अपने हाथ को आगे लाते हुए रिया की जांघों से होता हुआ आगे रख दिया... नारी की जांघें तो नारी की ही होती है ना.. वीरू का अचेत मस्टिस्क भी उनका स्पर्श पाते ही झटका सा खा गया और उसने अपने मुँह से कंबल हटा कर देखा.. रिया को ऐसा लगा मानो चोरी करती पकड़ी गयी हो.. साँस उपेर की उपेर और नीचे की नीचे रह गयी उसकी.. आँखें फ़ाडे वीरू के चेहरे की और देखती रही.. वीरू भी लगभग उसको ऐसे ही देख रहा था.. उसने झट से अपना हाथ और अपनी जाँघ उस'से दूर की और पूचछा," तुम? तुम यहाँ कैसे? राज कहाँ है?"

कुच्छ पल तो रिया को कुच्छ सूझा ही नही.. फिर संभालते हुई सी बोली," ववो.. बाहर गया है.. किसी ने बुलाया था उसको..."

"पर तुम यहाँ क्या कर रही हो..?" हालाँकि वीरू का अंदाज अत्यंत नरम और सिर्फ़ हैरानी भरा था.. फिर भी रिया जवाब देते हुए अटक रही थी...," ववो.. मुझे सर्दी लग रही थी.. इसीलिए... पर मैने सिर्फ़ पैर अंदर किए थे... और कुच्छ नही किया.."

वीरू उसके अंदाज पर मुश्कुराए बिना ना रह सका.. दूसरी और रिया की जांघों की अद्भुत गर्माहट अब तक उसके हाथ को महसूस हो रही थी," अरे में ये नही पूच्छ रहा.. तुम कब आई.. मुझे जगा लेती..!"

वीरू की बात सुनकर रिया के कलेजे को अजीब सी ठंडक मिली...," मैने आवाज़ लगाई तो थी.. पर तुम जागे ही नही.. मैने सोचा.. सोने दूँ.. फिर यहाँ इसीलिए रह गयी की तुम्हे किसी चीज़ की ज़रूरत हो तो उठना ना पड़े..."

"श.. थॅंक्स.. तुम बहुत अच्छि हो रिया.. सच में.." कहते हुए वीरू ने उसकी नाक पकड़ कर खींच ली...

"ऊओई.. और मैं तुम्हे छेड़ूँगी तो...?" रिया ने मचलते हुए कहा.. वीरू द्वारा उसको इस तरह तंग किया जाना एक मीठा सा अहसास दे गया....

"थोड़ा सा सो लूँ.. जोरों की नींद आ रही है.. फिर जी भर कर छेड़ लेना.." मुस्कुराते हुए वीरू ने कहा और फिर से कंबल में गोता खा गया... पर अब की बार रिया के लिए काफ़ी जगह छ्चोड़ता हुआ...

अब रिया से सब्र कहाँ होता...? रिया ने एक तरफ होते हुए वीरू के उपर से कंबल खींच लिया.. सारा का सारा.. वीरू सहम सा गया.. रिया के सामने उसको खाली अंडरवेर में पड़े होने पर शरम आ गयी और वो खिज सा उठा..," ये क्या कर रही हो.. कंबल दो मुझे.."

"नही देती.. नंगे!" वीरू के स्वाभाव में अभी भी नर्मी बनी रहने के कारण ही उसमें वीरू को नंगा कहने का साहस आ सका था...

"अच्च्छा.. मैं नंगा हूँ.. ! ठीक है.. रहने दो.. मेरा कंबल दो और भागो यहाँ से.." वीरू शर्मा सा गया था....हिचकिचाहट में उसने रिया के इर्द गिर्द लिपटा हुआ कंबल पकड़ कर ज़ोर से खींच लिया.. और कंबल में लिपटी रिया उसके साथ ही वीरू की छाती पर आ गिरी.. रिया की छातिया दबने से उसकी सिसकी निकल गयी.. एक पल के लिए तो वीरू का भी बुरा हाल हो गया.. पर उसने खुद को संभाल लिया," सॉरी रिया.. मैने जानबूझ कर ऐसा नही किया.. बस ऐसे ही.. सॉरी.."

वीरू सॉरी पर सॉरी बोलता जा रहा था और यहाँ रिया के मॅन में कुच्छ अलग ही तरह का पुलाव पक रहा था," पहले राज ने भी प्रिया को 'सॉरी' ही बोला था...

"क्या मतलब" वीरू ने पालती मारकर कंबल जांघों पर डाल लिया और बाकी रिया के पास ही रहने दिया...

"कुच्छ नही.. !" रिया के तन बदन में उथल पुथल मची हुई थी.. ," मुझे बुरा नही लगा.. बहुत अच्च्छा लगा.. तुम्हारी छाती से लिपट कर..." प्रिया के पास से पहले ही गरम होकर आई रिया ने बेबाक तरीके से ये बात कहकर वीरू को अचरज में डाल दिया," एक बार और लग जाने दो ना.. अपने सीने से!" रिया की आवाज़ में अजीब सी प्यास थी...

वीरू एकटक उसकी आँखों में देखता रहा.. वा भी निरंतर उसकी आँखों में देख रही थी.. जहाँ एक बरस से वो इस दिन के सपने देखती आ रही थी.. आज मिले मौके को शर्मकार गँवाना नही चाहती थी.. वैसे भी उसको यकीन था.. वीरू शायद ही कभी पहल करेगा....

"ऐसा क्या?" वीरू ने अपनी बात भी पूरी नही की और रिया को पकड़ कर अपनी बाहों में खींच लिया... कल रात से ही शायद वो भी तड़प ही रहा था..

वीरू के आगोश में इश्स तरह अचानक आ जाने पर रिया का पूरा बदन खिल सा गया.. या यूँ कहें की खुल सा गया.. वीरू के सीने से चिपकी उसकी छातियो में कसाव अचानक बढ़ने लगा.. नितंबों में और उनके आसपास अजीब सी थिरकन होने लगी.. पेट में गुदगुदी सी महसूस करती हुई रिया ने वीरू के कानो के पास होन्ट ले जाते हुए फुसफुसाया," आइ लव यू वीरू!"

इन्न शब्दों ने मानो वीरू के बढ़ते हॉंसलों को और पंख लगा दिए.. झट से वीरू ने उसका चेहरा अपने हाथों में दबोचा और उसके होंठो को इतने प्यारे शब्दो के उच्चारण के लिए धन्यवाद के रूप में अपने होंठो का तोहफा दे दिया.. वीरू तो वीरू, खुद रिया को आज पहली बार अहसास हुआ की वो कितनी गरम है.. उत्तेजना के आकाश में विचरण कर रही कामना की डोरे से बँधी रिया का वो रूप देखते ही बनता था.. झट से उसने अपनी टाँगों को वीरू की कमर के आसपास बाँधा और उसकी गोद में बैठ गयी... दोनो साँप के जोड़े की तरह एक दूसरे से लिपटे हुए एक दूसरे को चूस रहे थे.. वीरू का लिंग उत्तेजना में फंफनता हुआ सलवार के उपर से ही रिया को एक दम सही जगह पर चुभने लगा.. कसमसाती हुई रिया ने मदहोशी में ही उसके लिंग को अंडरवेर के उपर से ही दबोचा और उसकी दिशा बदल दी.. शायद चुभन उस'से सहन नही हो रही थी...

वीरू ने अपने दोनो हाथ रिया की कमर पर जमा दिए और होंठो से रास्पान करते हुए ही उसको अपने अंदर समाहित करने की कोशिश करने लगा... अचानक वही हुआ जो पहली बार लड़की को अक्सर बहुत जल्दी हो जाता है.. सिर्फ़ होंठो ने ही उसके सारे बदन की प्यास और तड़प ख़तम कर दी और योनि में से रस उगलते समय उसने वीरू को जितना हो सकता था.. सख्ती से पकड़ लिया...

कुच्छ देर तक अजीब ढंग से लंबी लंबी साँसे लेने के बाद जब वो सामान्य हुई तो वीरू की छाती को कसकर अपने सीने पर रगड़ती हुई बोली," मज़ा आया?"

"घंटा!" उत्तेजना की आग में झुलस चुके वीरू के मुँह से उस समय यही निकला..," अब रुकने के लिए मत बोलना.. वरना मुझसे सहन नही होगा...

"क्या?.. क्या करोगे अब..?" रिया ने तृप्त हो चुकी आँखों से वीरू को प्यार से देखते हुए पूचछा..

"बताता हूँ.. दरवाजा लॉक कर दो...!"

"वो तो मैने पहले ही कर दिया था..." रिया ने मुस्कुराते हुए कहा...

"अच्च्छा.. इसका मतलब प्लान बना कर आई थी..." वीरू ने कहते हुए उसकी बाहें पकड़ी और बिस्तेर पर नीचे सीधा गिरा लिया... वीरू की दीवानगी के वो पल देखकर रिया को खुद पर नाज़ होने लगा और वो खिल खिलाकर हँसने लगी...

पर इस समय वीरू का ध्यान सिर्फ़ उसके मादक मांसल बदन पर था.. एक ही झटके में उसने रिया का कमीज़ और समीज़ दोनो उपर उठा दिया.. संतरों के आकर की दूधियाँ रंग की रिया की छातियाँ पलक झपकते ही अनावृत हो गयी.. रिया को शरम आ रही थी, पर बड़ी मिन्नतों से मिले यार को उसने आज खुली छ्छूट दे दी थी.. खुलकर खेलने के लिए... जैसे ही वीरू ने रिया के गुलाबी किशमिश के आकर के दानों को अपने मुँह में लेकर दाँतों से हल्का सा काटा.. रिया भी अपने दाँत भीच कर सिसक उठी.. उसकी अधखुली आँखों के सामने वीरू रिया के यौवन को इश्स तरह पी रहा था मानो बरसों से इनका प्यासा हो.. और आज मिला ये मौका पहली और आख़िरी बार हो.. वीरू ने उसके अंग अंग को चूमते चाट'ते हुए कब सलवार घुटनो से नीचे सरका कर निकाल दी.. रिया को अहसास तक नही हो पाया... अहसास तब हुआ जब वीरू का अत्यंत ठोस और मोटा लिंग उसके योनिद्वार से टकराकर फुफ्कारा..

"नही.. ये मत करो प्ल्स...!" रिया गिड़गिडाई..," बहुत दर्द होगा..." कहकर रिया अपने नितंबों को इधर उधर हिलाने लगी....

"मैने पहले ही कहा था.. अब भगवान के लिए 2 मिनिट चुप हो जाओ.." मिन्नत सी करते हुए वीरू ने अचानक उसकी टाँगों को उपर उठाया और संभालने का मौका मिलने से पहले ही अपने लिंग का सूपड़ा उसकी चिकनी योनि मे 'फ़च्च्चाक' की आवाज़ के साथ उतार दिया..

रिया को एक पल तो ऐसा लगा कि आज वो गयी.. दर्द इतना ज़्यादा हुआ था की उसकी साँस उसके हलक में ही अटक गयी.. पर वीरू को रोकना अब नामुमकिन था.. रिया की गर्दन और छातियो को चूमते चाट'ते उसने जल्द ही रिया की तड़प को हुल्‍के हुल्‍के तेज होती जा रही सिसकियों में बदल दिया... इसके साथ ही वीरू ने धीरे धीरे करके अपने शरीर का सारा दबाव अपने लिंग पर डालना शुरू कर दिया और लिंग अब तक अपना मुँह थोड़ा और खोल चुकी उसकी 2 बार चिकनी हो चुकी योनि में उतरता चला गया.. आनंद की अनुभूति मिलते ही रिया ने वीरू को अपने सीने से चिपका कर अपने नितंब उपर उठाकर हिलाने शुरू कर दिए... अब तक रिया की सिसकियाँ सुन सुन कर वीरू का हौंसला बुलंदियों तक जा पहुँचा था.. और उसने धक्कों की गति बहुत तेज कर दी... अब रिया उसका पूरा सहयोग कर रही थी .. अचानक वीरेंदर को लगा की अब रुकना मुश्किल है तो उसने रिया की कमर में हाथ डाल कर और तेज़ी से धक्के लगाने शुरू कर दिए... करीब 10 मिनिट ही हुए होंगे की वीरू को अपने लिंग से रस तेज़ झटकों के साथ निकलते हुए रिया के गर्भस्या को सींचता हुआ महसूस हुआ... वीरया की फुहार से धन्य सी हो गयी योनि ने भी प्रत्युत्तर में ढेर सारा रस उगल दिया... दोनो हाँफने लगे थे.. प्यार के इश्स खेल में मशगूल वीरू को अब जाकर अपने दर्द का अहसास हुआ और अपनी टाँग को सीधा करते हुए वो एक तरफ लुढ़क गया.... पर रिया को शायद अब एक पल की भी दूरी मंजूर नही थी.. वह तुरंत पलट कर उसकी छाती पर अपनी छातिया टीका कर लेट गयी.. और आँखें बंद कर ली.... वीरू प्यार से रिया के बालों में हाथ फिराने लगा....
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